मंगलवार, 23 जून 2020

                                                         



इस पोस्ट में हम नामदेव महाराज के जीवन परिचय के बारेमे जानेंगे।

नाम - नामदेव दामाशेठ रेलेकर
जन्म - 26 अक्टूबर, 1270
पिता का नाम - दामाशेठ
माता का नाम - गोणाई (गोणा बाई) था।
नामदेवजी का विवाह - कल्याण निवासी राजाई (राजा बाई) के साथ हुआ था
चार पुत्र - नारायण,विट्ठल,महादेव,गोविन्द
पुत्री - लिम्बाबाई.
नामदेव जी की बड़ी बहन का नाम - आऊबाई
नामदेवजी के नानाजी - गोमाजी
नामदेवजी के नानीजी - उमाबाई

संत श्री नामदेव महाराज जीवन परिचय - Biography of Namdev in Hindi Jivani


संत शिरोमणि श्री नामदेवजी का जन्म "पंढरपुर", मराठवाड़ा, महाराष्ट्र (भारत) में 26 अक्टूबर, 1270 ,कार्तिक शुक्ल एकादशी संवत् १३२७, रविवार को सूर्योदय के समय हुआ था. संत शिरोमणि श्री नामदेव जी का जन्म "शिम्पी" ( जिसे राजस्थान में "छीपा" भी कहते है) परिवार में हुआ था। नामदेव का जन्म महाराष्ट्र के सातारा जिले के कराड के पास नरसी वामनी ग्राम या मराठवाडा के परभणी में हुआ था। जबकि कुछ लोगो का मानना है की उनका जन्म महाराष्ट्र के पंढरपुर में हुआ, उनके पिता भगवान विट्ठल के भक्त थे। पंढरपुर में भगवान कृष्णा को विट्ठल के रूप में पूजा जाता है। नामदेव के पिता का नाम दामाशेठ और माता का नाम गोणाई (गोणा बाई) था। नामदेव जी का परिवार भगवान विट्ठल का परम भक्त था।

नामदेवजी का विवाह कल्याण निवासी राजाई (राजा बाई) के साथ हुआ था और इनके चार पुत्र व पुत्रवधु यथा "नारायण - लाड़ाबाई", "विट्ठल - गोडाबाई", "महादेव - येसाबाई" , व "गोविन्द - साखराबाई" तथा एक पुत्री थी जिनका नाम लिम्बाबाई था. श्री नामदेव जी की बड़ी बहन का नाम आऊबाई था. उनके एक पौत्र का नाम मुकुन्द व उनकी दासी का नाम "संत जनाबाई" था, जो संत नामदेवजी के जन्म के पहले से ही दामाशेठ के घर पर ही रहती थी.
संत शिरोमणि श्री नामदेवजी के नानाजी का नाम गोमाजी और नानीजी का नाम उमाबाई था. संत नामदेवजी ने विसोबा खेचर को गुरु के रूप में स्वीकार किया था।

sant shree namdev maharaj ने भारत के बहुत से भागो की यात्रा कर अपनी कविताओ को लोगो तक पहुचाया है। मुश्किल समय में उन्होंने महाराष्ट्र के लोगो को एकता के सूत्र में बांधने का भी काम किया है।

कहा जाता है की पंजाब के गुरदासपुर जिले के घुमन ग्राम में उन्होंने 20 साल से भी ज्यादा समय व्यतीत किया था। पंजाब में सिक्ख समुदाय के लोग उन्हें नामदेव बाबा के नाम से जानते थे। संत नामदेव में हिंदी भाषा में तक़रीबन 125 अभंगो की रचना की है। जिनमे से 61 अभंग को गुरु ग्रंथ साहिब (सिक्ख शास्त्र) में नामदेवजी की मुखबानी के नाम से शामिल किया गया है।

पंजाब के शब्द कीर्तन और महाराष्ट्र के वारकरी कीर्तन में हमें बहुत से समानताये भी दिखाई देती है। पंजाब के घुमन में उनका शहीद स्मारक भी बनवाया गया है। उनकी याद में सिक्खों द्वारा राजस्थान में उनका मंदिर भी बनवाया गया है।

50 साल की उम्र में नामदेव महाराज पंढरपुर में आकर बस चुके थे, जहाँ उनके आस-पास उनके भक्त होते थे। उनके अभंग काफी प्रसिद्ध बन चुके थे और लोग दूर-दूर से उनके कीर्तन सुनने के लिए आते थे। नामदेव के तक़रीबन 2500 अभंगो को नामदेव वाची गाथा में शामिल किया गया है। साथ ही इस किताब में लंबी आत्मकथात्मक कविता तीर्थावली को भी शामिल किया गया है, जिसमे नामदेव और संत ज्ञानेश्वर की यात्रा के बारे में बताया गया है।

जुलाई, 1350 में 80 साल की उम्र में पंढरपुर में भगवान की शरण के निचे उनकी मृत्यु हो गयी। पंढरपुर के मंदिर में संत नामदेव को एक विशेष दर्जा दिया जाता है। हर साल लाखो भक्त पंढरपुर आकार विट्ठल भगवान और संत नामदेव के दर्शन करते है।

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श्री संत नामदेव महाराज पुण्यतिथि - shree sant namdev  maharaj ki punyatithi  kab manai jati he


आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी के दिन महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत नामदेव की पुण्यतिथि मनाई जाती है। इस दिन भगवान नामदेव ने जीवित अवस्था में समाधि ली थी। तभी से आज के दिन को पुण्यतिथि के रूप में मनाते है । समाजजन एकत्र होकर कार्यक्रम आयोजित करते है। पुरुष और महिलाओं द्वारा भजनर्कीतन किया जाता है।

निकाली जाती है दिंडी यात्रा


संत श्री महाराज की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर पूजा अर्चना की जाती हे । कार्यक्रम का समापन भंडारे के बाद भगवान नामदेव की दिंडी यात्रा निकालकर कियाजाता हे ।नगर मेें घुमाई जाने वाली दिंडी यात्रा में समाज के सभी लोगभजन भगवान नामदेव के भजन कीर्तन के साथ के जयघोष लगाते हुए निकलते है।

story of sant namdev maharaj


एक दिन उनके पिता बाहर गांव की यात्रा पर गए थे, तब उनकी माता ने नामदेव को दूध दिया और कहा कि वे इसे भगवान विठोबा को भोग में चढा दें। तब नामदेव सीधे मंदिर में गए और मूर्ति के आगे दूध रखकर कहा, ‘लो इसे पी लो।’ उस मंदिर में उपस्थित लोगों ने उनसे कहा- यह मूर्ति है, दूध कैसे पिएगी?

परंतु पांच वर्ष के बालक नामदेव नहीं जानते थे कि विठ्ठल की मूर्ति दूध नहीं पीती, मूर्ति को तो बस भावनात्मक भोग लगवाया जाता है। तब उनकी बाल लीला समझ कर मंदिर में उपस्थित सब अपने-अपने घर चले गए। जब मंदिर में कोई नहीं था तब नामदेव निरंतर रोए जा रहे थे और कह रहे थे, ‘विठोबा यह दूध पी लो नहीं तो मैं यहीं, इसी मंदिर में रो रोकर प्राण दे दूंगा।’

तब बालक का भोला भाव देखकर विठोबा पिघल गए। तब वे जीवित व्यक्ति के रूप में प्रकट हुए और स्वयं दूध पीकर नामदेव को भी पिलाया। तब से बालक नामदेव को विठ्ठल नाम की धुन लग गई और वे दिनरात विठ्ठल नाम की रट लगाए रहते थे।

उनका सारा जीवन मधुर भक्ति-भाव से ओतप्रोत था। विट्ठल-भक्ति भक्त नामदेव जी को विरासत में मिली।

उनका संपूर्ण जीवन मानव कल्याण के लिए समर्पित रहा। मूर्ति पूजा, कर्मकांड, जातपात के विषय में उनके स्पष्ट विचारों के कारण हिन्दी के विद्वानों ने उन्हें कबीर जी का आध्यात्मिक अग्रज माना है। संत नामदेव जी ने पंजाबी में पद्य रचना भी की। भक्त नामदेव जी की बाणी में सरलता है। वह ह्रदय को बांधे रखती है। उनके प्रभु भक्ति भरे भावों एवं विचारों का प्रभाव पंजाब के लोगों पर आज भी है।

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