शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

आधार कार्ड की पूरी जानकारी




Aadhar card information in hindi

यूआईडीएआई ने 2009 में आधार कार्ड कार्यक्रम शुरू किया था। अब आधार कार्ड भारत के लगभग प्रत्येक नागरिक का सबसे अधिक और उपयोगी पहचान बन गया है। हालांकि, कई कार्य प्रक्रिया और सरकारी योजनाओं में आधार कार्ड अनिवार्य है। आधार कार्ड सेवा हर किसी के लिए नि: शुल्क है इसका उपयोग भारत के विभिन्न स्थानों पर एक पहचान प्रमाण के रूप में भी किया जा रहा है।

आधार कार्ड भारत सरकार द्वारा भारत के नागरिकों को जारी किया जाने वाला पहचान पत्र है। इसमें 12 अंकों की एक विशिष्ट संख्या छपी होती है जिसे भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (भा.वि.प.प्रा.) जारी करता है। यह संख्या, भारत में कहीं भी, व्यक्ति की पहचान और पते का प्रमाण होगा। भारतीय डाक द्वारा प्राप्त और यू.आई.डी.ए.आई. की वेबसाइट से डाउनलोड किया गया ई-आधार दोनों ही समान रूप से मान्य हैं। कोई भी व्यक्ति आधार के लिए नामांकन करवा सकता है बशर्ते वह भारत का निवासी हो और यू.आई.डी.ए.आई. द्वारा निर्धारित सत्यापन प्रक्रिया को पूरा करता हो, चाहे उसकी उम्र और लिंग (जेण्डर) कुछ भी हो। प्रत्येक व्यक्ति केवल एक बार नामांकन करवा सकता है। नामांकन निःशुल्क है। आधार कार्ड एक पहचान पत्र मात्र है तथा यह नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं है।

आधार दुनिया की सबसे बड़ी बॉयोमीट्रिक आईडी प्रणाली है। विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री पॉल रोमर ने आधार को "दुनिया में सबसे परिष्कृत आईडी कार्यक्रम" के रूप में वर्णित किया। निवास का सबूत माना जाता है और नागरिकता का सबूत नहीं है, आधार स्वयं भारत में निवास के लिए कोई अधिकार नहीं देता है। जून 2017 में गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि आधार नेपाल और भूटान यात्रा करने वाले भारतीयों के लिए वैध पहचान दस्तावेज नहीं है। तुलना के बावजूद, भारत की आधार परियोजना संयुक्त राज्य अमेरिका के सोशल सिक्योरिटी नंबर की तरह कुछ नहीं है क्योंकि इसमें अधिक उपयोग और कम सुरक्षा है।

आधार कार्ड द्वारा व्यक्ति को क्या सुविधा मिलती है?-


What facility does a person get through Aadhaar Card? in hindi

यह सभी भारतीयों को एक दूसरे से भिन्न पहचान जारी करता है। आधार कार्ड बनवाने में बॉयोमेट्रिक और जनसांख्यिकीय डेटा का प्रयोग होने से हर भारतीय को एक अनूठी पहचान उपलब्ध कराता है। कोई भी दस्तावेज न होने पर भी यह प्राप्त किया जा सकता है। एक व्यक्ति के पास केवल एक आधार संख्या हो सकती है।
नामांकन विवरण

भारत में कोई भी व्यक्ति आधार कार्ड के लिए नामांकन कर सकता है। व्यक्ति का लिंग एवं आयु यहाँ पर कोई महत्व नहीं रखता है। हालांकि उसे भारत का निवासी होना जरूरी है, और यूआईडीएआई द्वारा निर्धारित कुछ अन्य मानदंडों को भी पूरा करता हो। प्रत्येक व्यक्ति केवल एक बार नामांकन कर सकता है, और यह सुविधा एकदम मुफ्त प्रदान की जाती है। आधार संख्या अद्वितीय होती हैं और जब तक व्यक्ति जीवित रहता है, तब तक यह मान्य होती है।

आधार कार्ड कैसे उपयोगी है?


How is Aadhaar card useful in hindi

आधार नंबर की मदद से मोबाइल फोन कनेक्शन, रसोई गैस कनेक्शन, और बैंकिंग जैसी उपयोगी सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं। प्रारंभिक चरणों में यह संख्या केवल सरकार द्वारा संचालित सेवाओं को लागू करती है। मगर ये उम्मीद की जा सकती है कि भविष्य में अन्य समान सेवाओं एवं गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा संचालित सभी सेवायें भी इसके दायरे में आ जाएंगी।

आधार कार्ड के लाभ

आधार संख्या प्रत्येक व्यक्ति की जीवनभर की पहचान है।
आधार संख्या से आपको बैंकिंग, मोबाईल फोन कनेक्शन और सरकारी व गैर-सरकारी सेवाओं की सुविधाएं प्राप्त करने में सुविधा होगी।
किफायती तरीके व सरालता से ऑनलाइन विधि से सत्यापन योग्य।
सरकारी एवं निजी डाटाबेस में से डुप्लिेकेट एवं नकली पहचान को बड़ी संख्या में समाप्त करने में अनूठा एव ठोस प्रयास।
एक क्रम-रहित (रैण्डम) उत्पन्न संख्या जो किसी भी जाति, पंथ, मजहब एवं भौगोलिक क्षेत्र आदि के वर्गीकरण पर आधारित नहीं है।











































क्रम संख्याआधार निम्नलिखित हैआधार निम्नलिखित नहीं है
आधार एक 12 अंकों की प्रत्येक भारतीय की एक विशिष्ट पहचान है(बच्चों सहित) मात्र एक अन्य कार्ड।
भारत के प्रत्येक निवासी की पहचान हैप्रत्येक परिवार के लिए केवल एक आधार कार्ड काफी है।
डेमोग्राफिक और बायोमेट्रिक के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति की विशिष्ट पहचान सिद्ध करता है।जति, धर्म और भाषा के आधार पर सूचना एकत्र नहीं करता।
यह एक स्वैच्छिक सेवा है जिसका प्रत्येक निवासी फायदा उठा सकता है चाहे वर्तमान में उसके पास कोई भी दस्तावेज हो।प्रत्येक भारतीय निवासी के लिए अनिवार्य है जिसके पास पहचान का दस्तावेज हो।
प्रत्येक व्यक्ति को केवल एक ही विशिष्ट पहचान आधार नम्बर दिया जाएगा।एक व्यक्ति मल्टीपल पहचान आधार नम्बर प्राप्त कर सकता है।
आधार वैश्विक इन्फ्रास्ट्रक्चर पहचान प्रदान करेगा जो कि राशन कार्ड, पासपोर्ट आदि जैसी पहचान आधारित एप्लीकेशन द्वारा भी प्रयोग में लाया जा सकता है।आधार अन्य पहचान पत्रों का स्थान लेगा।
यू.आई.डी.ए.आई., किसी भी तरह के पहचान प्रमाणीकरण से संबंधित प्रश्नों का हां/न में उत्तर देगा।यू.आई.डी.ए.आई. की सूचना पब्लिक और प्राइवेट एजेंसियां ले सकेंगी।

आवश्यकता और उपयोग


Aadhar card requirement and usage in hindi

आधार कार्ड अब सभी चीजों के लिए जरूरी होता जा रहा है। पहचान के लिए हर जगह आधार कार्ड मांगा जाता हैं। आधार कार्ड के महत्व को बढाते हुए भारत सरकार ने बड़े फैसले लिए हैं जिसमें आपके पास आधार कार्ड नहीं है तो वह काम होना मुश्किल होगा। इस कार्ड को कोई और इस्तमाल नहीं कर सकता है, जबकि राशनकार्ड समेत कई और दूसरे प्रमाण पत्र के साथ कई तरह कि गड़बड़ियाँ हुई है और होती रहती है।

  • पासपोर्ट जारी करने के लिए आधार को अनिवार्य कर दिया गया है।

  • जनधन खाता खोलने के लिये

  • एलपीजी की सबसीडी पाने के लिये

  • ट्रेन टिकट में छूट पाने के लिए

  • परीक्षाओं में बैठने के लिये (जैसे आईआईटी जेईई के लिये)

  • बच्चों को नर्सरी कक्षा में प्रवेश दिलाने के लिये

  • डिजिटल जीवन प्रमाणपत्र (लाइफ सर्टिफिकेट) के लिए आधार जरूरी

  • बिना आधार कार्ड के नहीं मिलेगा प्रविडेंट फंड

  • डिजिटल लॉकर के लिए आधार जरूरी

  • सम्पत्ति के रजिस्ट्रेशन के लिए भी आधार कार्ड जरूरी कर दिया गया है।

  • छात्रों को दी जाने वाली छात्रवृत्ति भी आधार कार्ड के जरिए ही उनके बैंक में जमा करवाई जाएगी।

  • सिम कार्ड खरीदने के लिये

  • आयकर रिटर्न


आधार कार्ड अन्य पहचान पत्रों से भिन्न क्यों है ?


Why Aadhaar Card is different from other identity cards in hindi

आधार कार्ड 12 अंको वाला और अन्य सभी प्रमाण पत्रों और कार्डों से भिन्न एक पहचान पत्र है। कोई भी भारतीय नागरिक शिशु से वृद्ध तक इस अद्वतीय कार्ड को एक बार प्राप्त कर सकता है। यह सभी भारतीयों को एक दूसरे से भिन्न पहचान जारी करता है।

आधार कार्ड बनवाने में बॉयोमेट्रिक और जनसांख्यिकीय डेटा का प्रयोग होने से हर भारतीय को एक अनूठी पहचान उपलब्ध कराता है। कोई भी दस्तावेज न होने पर भी यह प्राप्त किया जा सकता है। एक व्यक्ति के पास केवल एक आधार संख्या हो सकती है।

आधार कार्ड प्रशासनिक सेवाओं में पहचान पत्र के रूप में उपयोग किया जा सकता है। जैसे पासपोर्ट, राशनकार्ड या किसी अन्य अनुप्रयोग में उपयोग किया जा सकता है यदि आपको आधार कार्ड के बारे में अधिक जानकारी चाहिये तो आप यूआईडीएआई से सम्पर्क कर सकते हैं।

आधार कार्ड अपडेट कैसे करे

आधार कार्ड बनाने के लिए क्या प्रूफ चाहिए?


What proof is required to make an Aadhar card in hindi

  • पासपोर्ट

  • पैन कार्ड

  • राशन / सार्वजनिक वितरण प्रणाली के फोटो कार्ड

  • वोटर ID.

  • ड्राइविंग लाइसेंस

  • सरकारी फोटो ID कार्ड / PSU द्वारा जारी किए गए सेवा फोटो पहचान पत्र

  • NREGS जॉब कार्ड

  • मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थान द्वारा जारी फोटो पहचान पत्रआधार कार्ड अपडेट कैसे करे


आधार कार्ड ग्राहक सेवा नंबर- टोल फ्री


Aadhar card customer service number

UIDAI लोगों के लिए टोल-फ्री नंबर प्रदान किया है। कोई भी व्यक्ति जो अपनी सवाल का उत्तर चाहता है, शिकायत दर्ज करन चाहता है या सुझाव देना चाहता है वो टोल-फ्री नंबरों 1947 या 1800 3001947 पर कॉल कर सकता है| ये सुविधा साल के सभी 365 दिनों में 24×7 घंटा उपलब्ध है| ये नंबर UIDAI द्वारा संचालित हैं। इन नंबरों के अलावा, संगठन के अधिकांश क्षेत्रीय कार्यालयों में शिकायत निवारण यूनिट हैं।

यूआईडीएआई मुख्यालय-UIDAI Headquarters


यूआईडीएआई का मुख्यालय नई दिल्ली में है। लोग अपने सवालों के जवाब पाने के लिए सीधे यूआईडीएआई को लिख सकते हैं:

भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण
भारत सरकार
तीसरी मंजिल, टॉवर II, जीवन भारती बिल्डिंग,
कनॉट सर्कस, नई दिल्ली – 110001
फोन: 011-23466899

क्षेत्रीय कॉन्टेक नंबर-Regional Contact Number


यूआईडीएआई ने अपने कार्यों को मैनेज और निगरानी के लिए कई क्षेत्रीय आधार केंद्र स्थापित किए हैं। ये केंद्र पूरे भारत में फैले हैं| इनमें से अधिकांश केंद्रों में शिकायत निवारण यूनिट है, जहां लोग कॉल कर आधार कार्ड सम्बंधित अपनी परेशानियों को बता सकते हैं| इन केंद्रों की जानकारी इस प्रकार है:













































क्षेत्रीय केंद्रटेलीफोन नंबरफैक्स-मेलपता
चंडीगढ़0172-27119470172-2711717grievancecell.rochd@uidai.net.inएससीओ 139-141, तीसरी और चौथी मंजिल, सेक्टर 17-सी, चंडीगढ़ -160017
नई दिल्ली011-23481126011-23481110ग्राउंड फ्लोर, प्रगति मैदान मेट्रो स्टेशन, नई दिल्ली -110001
लखनऊ0522-2304979(एनरोलमेंट),
0522-2304978 (SSUP)
uidai.lucknow@uidai.net.inUIDAI क्षेत्रीय कार्यालय, 03 वीं मंजिल,स्टेट कंस्ट्रक्शन एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कारपोरेशन लिमिटेड बिल्डिंग, TC -46 / V, विभूति खंड, गोमती नगर, लखनऊ – 226 010
मुम्बई1947help@uidai.gov.inUIDAI क्षेत्रीय कार्यालय, 7 वीं मंजिल, MTNL एक्सचेंज बिल्डिंग, GD. सोमानी मार्ग, कफ परेड, मुंबई – 400 005
रांची0651-6450145ro.helpdesk@uidai.net.inUIDAI क्षेत्रीय कार्यालय, पहली मंजिल, RIADA केंद्रीय कार्यालय भवन नामकुम औद्योगिक क्षेत्र, STPI लोवाडीह के पास, रांची 834 010

आधार कार्ड अपडेट कैसे करे


शिकायत निवारण-Grievance redressal


यूआईडीएआई ने आधार कार्ड धारकों की शिकायते और समस्याओं को सुलझाने के लिए एक सिस्टम बनाया है| अब ऐसे कई माध्यम हैं जिनके द्वारा कार्डधारक शिकायत दर्ज कर सकते हैं, इनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:

टोल-फ्री नंबर के माध्यम से – लोग 1947 पर कॉल कर सकते हैं और अपनी शिकायतों को फोन के माध्यम से दर्ज कर सकते हैं। इसके अलावा, वे क्षेत्रीय केंद्रों में कॉल कर सकते हैं और अपनी समस्याओं को हल कर सकते हैं।

पोस्ट द्वारा – लोग अपने मुद्दों को पोस्ट के द्वारा भी बता सकते हैं| वे किसी भी क्षेत्रीय केंद्र या यूआईडीएआई मुख्यालय को पत्र भेज सकते हैं।

ई-मेल द्वारा – लोग help@uidai.gov.in पर ई-मेल कर भी अपनी शिकायतें दर्ज कर सकते हैं|

रेजिडेंट पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन शिकायत दर्ज करना -आवेदक ऑनलाइन भी शिकायत दर्ज कर सकते हैं| आवेदक पर मौजूद फॉर्म भर सकता है और शिकायत ऑनलाइन दर्ज कर सकता है| समस्या को जल्द से जल्द सुलझाया जाएगा| आवेदक को फॉर्म भरते से समय कुछ जानकारी देनी होगी जैसे, एनरोलमेंट आईडी, निजी जानकारी, लोकेशन, शिकायत और इसके बाद फॉर्म जमा कर दें| आपकी समस्या को लेकर क्या कार्रवाई हुई है ये आपको ई-मेल और मोबाइल नंबर पर बता दिए जाएंगें| आप इस तरह की समस्याओं को लेकर शिकायत दर्ज कर सकते हैं:

आधार कार्ड ना बनना
संचालन और एनरोलमेंट एजेंसी
लोग इस पोर्टल पर जाकर अपनी शिकायत का स्टेटस/स्तिथि जान सकते हैं| उनको बस अपनी कंप्लेंट आईडी देनी होगी और सेक्योरिटी कोड डालकर सबमिट बटन पर क्लिक करना होगा।

आधार कार्ड अपडेट कैसे करे

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

SAP ( सिस्टम, एप्लीकेशन और उत्पाद) क्या है




What is the course of SAP
सैप एक बहुत बढ़िया कोर्स है जिसे आप अपने ग्रेजुएशन या इंजिनीरिंग Course Complete होने के बाद कर सकते है इसमें आप अपनी रूचि के हिसाब से कोई भी कोर्स कर सकते और उसमे आगे जा सकते है। यह कोर्स करने के बाद आपकी जॉब अच्छी जगह लग सकती है और इसमें सैलरी भी बहुत अच्छी होती है .

SAP का इस्तेमाल माइक्रोसॉफ्ट और आईबीएम जैसी अग्रणी कंपनियों द्वारा ई–बिजनेस एप्लीकेशन, वेब इंटरफेस, सप्लाई चेन मैनेजमेंट, कस्टमर रिलेशन मैनेजमेंट और जरूरी टूल के साथ अपने प्रॉडक्ट ऑफरिंग में जोड़ रहा है।

SAP का पूरा नाम होता है। – SYSTEMS APPLICATION AND PRODUCTS

एसएपी का पूरा नाम, सिस्टम, एप्लीकेशन और उत्पाद है। SAP, ERP (enterprise resource planning) softwareहै, इसमें कई मॉड्यूल हैं ,जैसे कि बिक्री और वितरण मॉड्यूल, मानव संसाधन मॉड्यूल, योजना मॉड्यूल, सामग्री मॉड्यूल शामिल हैं। SAP, कंपनी द्वारा उपयोग किया जाता है और कर्मियों और व्यवसायिक संचालन के प्रबंधन के लिए सभी आकारों के उद्यमों द्वारा उपयोग किया जाता है।और एंटरप्राइज़ के सभी प्रदर्शन को बेहतर बनाता है।

SAP Course Information


अगर आप सैप कोर्स करने जा रहें है तो आपको इसकी कुछ बेसिक जानकारी के बारे में पता होना चाहिए

SAP Courses


-Human Resource Management (SAP HRM)

-Human Resource (HR)

-Production Planning (SAP PP)

-Material Management (SAP MM)

-Financial Supply Chain Management (SAP FSCM)

-Sales And Distribution (SAP SD)

-Project System (SAP PS)

-Financial Accounting And Controlling (SAP FICO)

SAP Courses Institutes


-Incomp Software Technologies, Hyderabad

-Ecocline Edutech Services, Mumbai

-We Excel Edutech Pvt. Ltd., Chandigarh

-Sappallclass, Thane Mumbai

-Sapware Technologies, Bangalore

एसएपी कोर्स के लिए योग्यता और पात्रता -Qualifications and Eligibility for SAP course


उम्मीदवार इंजीनियरिंग, बीकॉम, बीएससी, एमसीए या मास्टर डिग्री में स्नातक होना चाहिए।अगर किसी उम्मीदवार को उत्पादन, खरीद या अन्य जैसे संबंधित क्षेत्रों में कोई अनुभव है।, तो उम्मीदवार को प्रशिक्षण में एसएपी मॉड्यूल के लिए एक अतिरिक्त लाभ होगा।

एसएपी कोर्स के लिए कितनी फीस है?-How many fees for SAP Course


एसएपी कोर्स बहुत महंगा है लेकिन यह आपके कैरियर के लिए बहुत ही मूल्यवान है। और S.A.P पाठ्यक्रम फीस भिन्न हो सकती है। और यह संस्थान पर निर्भर करती है। एसएपी कोर्स की फीस 35,000 से 2.5 लाख के बीच भिन्न हो सकती है।


भारतीय छात्रों को नीदरलैंड में पढ़ने के लिए मिल रही स्कॉलरशिप

भारतीय छात्रों को नीदरलैंड में पढ़ने का मौका



Indian students getting scholarship to study in Netherlands in hindi

भारत के प्रतिभाशाली छात्रों को विदेश में पढ़ने का सुनहरा अवसर है। उनको ऑरेंज ट्यूलिप स्कॉलरशिप इंडिया 2020-21 मिल रही है। इस स्कॉलरशिप के तहत छात्रों को ट्युइशन फीस नहीं देनी पड़ेगी।

नीदरलैंड एजुकेशन सपोर्ट ऑफिस (नेसो) इंडिया ने ऑरेंज ट्यूलिप स्कॉलरशिप इंडिया 2020-21 के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक कई सारे उच्चतर शैक्षिक संस्थान, मल्टिनैशनल्स और सरकारी संस्थान इस प्रोग्राम का हिस्सा हैं। बताया जा रहा है कि इसके तहत छात्रों-छात्राओं को कई तरह के कोर्स ऑफर किए जाते हैं। जिसमे छात्र की पूरी ट्युइशन फीस कवर की जाएगी।

ऑरेंज ट्यूलिप स्कॉलरशिप के लिए कुछ जरूरी नियम-


Some Important Rules for Orange Tulip Scholarship in hindi


1-छात्र को भारत का नागरिक होना चाहिए

2-नीदरलैंड में पढ़ या काम नहीं कर रहा हो

3-नीदरलैंड की किसी यूनिवर्सिटी में ऐडमिशन लिया हो या फिर दाखिले की प्रक्रिया में शामिल हो

4-पहले कैंडिडेट को नीदरलैंड की किसी यूनिवर्सिटी और कोर्स का चुनाव करना होगा

5-कैंडिडेट्स को उन यूनिवर्सिटी में से किसी एक को चुनना होगा जिसे इस स्कीम के तहत कवर किया गया है

6-फिर उस यूनिवर्सिटी में आवेदन की प्रक्रिया शुरू करें

7-यूनिवर्सिटी की ओर से कन्फर्मेशन के बाद स्कॉलरशिप के लिए आवेदन की प्रक्रिया शुरू करें

8-ऐप्लिकेशन फॉर्म डाउनलोड करें और जरूरी डीटेल्स को भरें

9-आवश्यक दस्तावेजों के साथ ऐप्लिकेशन फॉर्म को ots@nesoindia.org पर भेजें।

कुछ जरूरी कागजात-Some important papers


1-भरा हुए ऐप्लिकेशन फॉर्म

2-चुनी हुई यूनिवर्सिटी में दाखिले का प्रमाण

कुछ अन्य आवश्यकताएं-Some other requirements


1-सभी दस्तावेज सॉफ्ट कॉपी के तौर पर भेजना होगा

2-अटैचमेंट साइज 20 एमबी से ज्यादा नहीं होना चाहिए

3-अधूरे आवेदन को रद्द कर दिया जाएगा

4-आवेदन वर्ड या पीडीएफ फॉर्मेट में होना चाहिए

5-हर फाइल का इंग्लिश में स्पष्ट नाम होना चाहिए

आवेदन की तारीख-Application date


15 जनवरी, 2020: University of Amsterdam (Economics & Business)

1 फरवरी, 2020: Vrije University Of Amsterdam

1 मार्च, 2020: Radboud University, Rotterdam School of Management, Groningen University (Graduate School of Medical Sciences)

1 अप्रैल, 2020: Han University Of Applied Science, Maastricht School of Management, Maastrict University (Faculty of Health Medicine Life science & Faculty of Science & Engineering), University Of Groningen (Faculty Of Arts), Wittenborg University Of Applied Science, Tilburg University, The Hague University of Applied Sciences, Saxion University Of Applied Science, Institute of Housing and Urban Development, University of Amsterdam Business School-MIF, Hanze University of Applied Sciences (MBA & Masters in International Business), Rotterdam Business School, Institute of Social Studies (ISS), Fontys University of Applied Sciences, Amsterdam University of Arts (DAS Theater Masters)

1 मई, 2020: Twente University, Tias Business School


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बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

शेर और चूहा




1 .Lion and Mouse Hindi Story –

बहुत पुराने समय की बात है एक चूहा मस्ती करता हुआ अपने बिल की ओर लौट रहा था कि रास्ते में उसकी नज़र शेर की गुफा पर पड़ी उसने देखा की शेर अपनी गुफा में गहरी नींद में सोया हुआ है। अचानक उसके दिमाग में कुछ खुरापात सूझी और वह शेर के ऊपर जा चढ़ा। चूहा यह अच्छी तरह जान चुका था कि शेर बहुत ही गहरी नींद में सोया हुआ है इसलिए उसने इस बात का फायदा उठाते हुए जोर-जोर से उछल कूद करना शुरू कर दिया।

चूहे की उछल-कूद के कारण शेर की नींद खुल गई। शेर ने अपनी आँखे खोलकर देखा कि एक नन्हा चूहा उसके ऊपर कभी इधर तो कभी उधर घूम रहा है तो कभी जोर-जोर से कूद रहा है। यह सब देखकर शेर को बड़ा गुस्सा आया उसने झट से चूहे को अपने नुकीले पंजो में जकड़ लिया। चूहा शेर को गुस्से मे देखकर बहुत डर गया। उसे लगा आज तो वह जरुर मारा जाएगा।

उसने शेर से विनती की,” शेर महाराज ! मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई है। कृप्या करके आप मुझे माफ कर दो। मुझे मत मारो ,अगर आप मुझे जाने देंगे तो मैं आपका एहसान कभी नहीं भूलूँगा और जीवन में मुझे कभी मौका मिला तो मैं आपके इस उपकार को अवश्य चूका दूँगा। चूहे की बात सुनकर शेर को हँसी आ गई। शेर बोला, “ तुम इतने छोटे होकर भला मेरे लिए क्या कर पाओगे ?” चूहे को इस तरह याचना करते हुए देखकर उसे चूहे पर दया आ गई और उसने चूहे को छोड़ दिया। चूहा, शेर को धन्यवाद कर वहाँ से चला गया।
काफी समय बीत गया कि एक दिन शेर अपने शिकार की तलाश मे घूम रहा था। घूमते-घूमते वह खुद ही शिकारी के जाल मे फंस गया। शेर ने जाल से निकलने की बहुत कोशिश की लेकिन वह जाल से बाहर नहीं निकल पाया। हारकर शेर मदद के लिए जोर-जोर से दहाड़ने लगा। संयोगवश चूहे ने उसकी दहाड़ सुन लीऔर उसने वहाँ जाकर देखा तो शेर जाल में बुरी तरह जकड़ा हुआ था। उसने शेर को जाल मे फंसे हुए देखा तो वह शेर की मदद के लिए तुरंत शेर के पास जा पहुंचा और जाल को काटना शुरू कर दिया। उसने अपने नुकीले दांतो से जल्दी ही जाल को काट दिया। चूहे की मदद के कारण शेर जाल से बाहर निकल आया और उसने चूहे को धन्यवाद दिया। उस दिन शेर को समझ आ गया कि किसी भी प्राणी को छोटे या बड़े कद से नहीं आंकना चाहिए और अगर हम किसी की मदद करेंगे तो हमें उसका फल अवश्य ही मिलेगा।

2 .Sher Aur Chuha Kahani :

एक दिन की बात है. एक शेर अपनी गुफा में सो रहा था. तभी कहीं से एक चूहा वहाँ आ गया और शेर पर चढ़कर उछल-कूद मचाने लगा. शेर की नींद टूट गई. उसने चूहे को अपने पंजे में दबोच लिया. चूहा डर गया और क्षमा मांगते हुए बोला, “वनराज! मुझे छोड़ दो. मैं वचन देता हूँ कि किसी दिन मैं ज़रूर आपके काम आऊंगा.”

शेर ने सोचा कि ये छोटा सा चूहा मेरे क्या काम आएगा. लेकिन फिर भी उसने उसे छोड़ दिया.

एक दिन शेर शिकारी ने बिछाए जाल में फंस गया. बहुत प्रयास करने के बाद भी वह जाल से निकल नहीं पाया. वह सहायता के लिए दहाड़ने लगा. उसकी दहाड़ सुनकर वही चूहा आया और जाल काटकर उसे बाहर निकाला. उस दिन शेर को समझ आया कि हर किसी में कोई न कोई गुण अवश्य होता है, जिसके दम पर वह दूसरों का मददगार साबित हो सकता है.

सीख (Moral Of The Story) :


1. किसी भी प्राणी की काबिलियत उसके बाहरी स्वरुप से नहीं आंकनी चाहिए और छोटे-बड़े का भेदभाव नहीं करना चाहिए.

2 . किया गया उपकार कभी भी व्यर्थ नहीं जाता, उसका मोल अवश्य किसी न किसी रूप में प्राप्त होता है.

3.कभी किसी को हीनभावना से नहीं देखना चाहिए.

ईश्वर ने इस दुनिया में सभी तरह के प्राणी बनाये है कोई बहुत ही छोटा तो कोई बहुत ही विशाल और सभी में कुछ न कुछ अलग खासियत जरुर होती है जिसकी उपयोगिता समय पर ही पता चलती है। इसलिए हमें हमेशा ही किसी को भी कमजोर या खुद से कम नहीं समझना चाहिए


बंदर और टोपीवाला Story For Kids In Hindi

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

10वीं पास के लिए निकली हजारों वैकेंसी



Sarkari Naukri 2020: 

10वीं पास के लिए निकली हजारों वैकेंसी, रेलवे,इंडियन ऑयल ने 10वीं पास के लिए 500 पदों पर वैकेंसी निकाली हैं. वहीं, इंडिया पोस्ट में 2021 पदों पर भर्ती होनी है. इसके अलावा रेलवे में 570 पदों पर भर्ती की जाएगी.

सरकारी नौकरी (Sarkari Naukri) की तलाश कर रहे युवाओं के लिए हजारों वैकेंसी निकली हैं. जो लोग 10वीं पास हैं और सरकारी नौकरी की तलाश में हैं उनके लिए इंडियन ऑयल (Indian Oil), इंडिया पोस्ट (India Post) और रेलवे (Railway) में बंपर भर्तियां हैं. इंडियन ऑयल ने 10वीं पास के लिए 500 पदों पर वैकेंसी निकाली हैं. वहीं, इंडिया पोस्ट में 2021 पदों पर भर्ती होनी है. इसके अलावा रेलवे में 570 पदों पर भर्ती की जाएगी. इन सभी भर्तियों की जानकारी नीचे दी गई है.

इंडियन ऑयल में 500 पदों पर वैकेंसी


Sarkari Naukri 2020 in hindi

इंडियन ऑयल मार्केटिंग डिवीजन, वेस्टर्न रीजन ने अप्रेंटिस के टेक्निकल और नॉन-टेक्निकल पदों पर भर्ती निकाली हैं. भर्ती कुल 500 पदों पर की जाएगी. इन पदों पर आवेदन की प्रक्रिया 22 फरवरी से सुरू होगी. इच्छुक और योग्य उम्मीदवार 20 मार्च तक iocl.com पर जाकर आवेदन कर सकेंगे.

इंडिया पोस्ट में 2021 पदों पर होनी है भर्ती


Sarkari Naukri 2020 in hindi

इंडिया पोस्ट ने ग्रामीण डाक सेवक के पदों पर वैकेंसी निकाली हैं. ये भर्ती पश्चिम बंगाल रीजन के लिए निकली है. पश्चिम बंगाल रीजन में GDS के 2021 पदों पर भर्ती होनी है. इन पदों पर आवेदन की प्रक्रिया शुरू हो गई है. आवेदन करने की आखिरी तारीख 18 मार्च 2020 है. इच्छुक और योग्य उम्मीदवार www.appost.in पर जाकर आवेदन कर सकते हैं. ऑफिशियल नोटिफिकेशन भी इसी वेबसाइट से देखा जा सकता है.

रेलवे में 570 पदों पर होगी भर्ती


पश्चिम मध्य रेल भोपाल मंडल में 570 पदों पर भर्ती की जाएगी. इन पदों पर आवेदन की प्रक्रिया चल रही है. आवेदन करने की आखिरी तारीख 15 मार्च 2020 है. योग्य उम्मीदवार mponline.gov.in पर जाकर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं. ये वैकेंसी 10वीं पास वालों के लिए है. उम्मीदवार के पास संबंधित ट्रेड में आईटीआई सर्टिफिकेट होना चाहिए.


पंजाब भर्ती 2020: 324 मैनेजर एवं टेक्निकल असिस्टेंट जानिए यहा

सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

श्री हनुमान चालीसा



Hanuman Chalisa

हिन्दू धर्म में हनुमान जी को वीरता, भक्ति और साहस का परिचायक माना जाता है। शिवजी के रुद्रावतार माने जाने वाले हनुमान जी को बजरंग बली, पवनपुत्र, मारुती नंदन, केसरी आदि नामों से भी जाना जाता है।

हनुमान जी को प्रतिदिन याद करने और उनके मंत्र जाप करने से मनुष्य के सभी भय दूर होते हैं। हनुमान जी की साधना में तुलसीदास रचित "हनुमान चालीसा" (Hanuman Chalisa) को बेहद प्रभावशाली माना जाता है।

इतिहास


Hanuman Chalisa in hindi

एक बार बादशाह अकबर ने तुलसीदास जी को अपने दरबार में बुलाया और उनसे कहा कि मुझे भगवान श्रीराम से मिलवाओ। तब तुलसीदास जी ने कहा कि भगवान श्री राम सिर्फ अपने भक्तों को ही दर्शन देते हैं। यह सुनते ही अकबर ने तुलसीदास जी को कारागार में कैद करवा दिया।

कारावास में तुलसीदास जी ने अवधी भाषा में हनुमान चालीसा लिखी। कहते हैं जैसे ही हनुमान चालीसा लिखने का कार्य पूर्ण हुआ वैसे ही पूरी फतेहपुर सीकरी को बंदरों ने घेरकर उस पर धावा बोल लिया। बादशाह अकबर की फौज भी बंदरों का आतंक रोकने में नाकामयाब रही।

तब अकबर ने किसी मंत्री की सलाह को मानकर तुलसीदास जी को कारागार से मुक्त कर दिया।

कहते हैं जैसे ही तुलसीदास जी को कारागार से मुक्त किया गया उसी समय बंदर सारा इलाका छोड़कर चले गए।

Hanuman Chalisa in hindi

दोहा


श्रीगुरु चरण सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार॥

चौपाई


जय हनुमान ज्ञान गुन सागर
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥१॥
हिंदी अर्थ- श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों, स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।

राम दूत अतुलित बल धामा
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥२॥
हिंदी अर्थ- हे पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नहीं है।

महावीर विक्रम बजरंगी
कुमति निवार सुमति के संगी॥३॥
हिंदी अर्थ- हे महावीर बजरंग बली!आप विशेष पराक्रम वाले है। आप खराब बुद्धि को दूर करते है, और अच्छी बुद्धि वालों के साथी, सहायक है।

कंचन बरन बिराज सुबेसा
कानन कुंडल कुँचित केसा॥४॥
हिंदी अर्थ- आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजे
काँधे मूँज जनेऊ साजे॥५॥
हिंदी अर्थ- आपके हाथ में बज्र और ध्वजा है और कन्धे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।

शंकर सुवन केसरी नंदन
तेज प्रताप महा जगवंदन॥६॥
हिंदी अर्थ- शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर में वन्दना होती है।

विद्यावान गुनी अति चातुर
राम काज करिबे को आतुर॥७॥
हिंदी अर्थ- आप प्रकान्ड विद्या निधान है, गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर श्री राम के काज करने के लिए आतुर रहते है।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया
राम लखन सीता मन बसिया॥८॥
हिंदी अर्थ- आप श्री राम चरित सुनने में आनन्द रस लेते है। श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय में बसे रहते है।

सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥९॥
हिंदी अर्थ- आपने अपना बहुत छोटा रूप धारण करके सीता जी को दिखलाया और भयंकर रूप करके लंका को जलाया।

भीम रूप धरि असुर सँहारे
रामचंद्र के काज सँवारे॥१०॥
हिंदी अर्थ- आपने विकराल रूप धारण करके राक्षसों को मारा और श्री रामचन्द्र जी के उद्देश्यों को सफल कराया।

लाय संजीवन लखन जियाए
श्रीरघुबीर हरषि उर लाए॥११॥
हिंदी अर्थ- आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी को जिलाया जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥१२॥
हिंदी अर्थ- श्री रामचन्द्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा कि तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।

सहस बदन तुम्हरो जस गावै
अस कहि श्रीपति कंठ लगावै॥१३॥
हिंदी अर्थ- श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से लगा लिया की तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा
नारद सारद सहित अहीसा॥१४॥
हिंदी अर्थ- श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी, सरस्वती जी , शेषनाग जी सब आपका गुण गान करते है।

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते
कवि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥१५॥
हिंदी अर्थ- यमराज, कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥१६॥
हिंदी अर्थ- आपने सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।

तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना
लंकेश्वर भये सब जग जाना॥१७॥
हिंदी अर्थ- आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू
लिल्यो ताहि मधुर फ़ल जानू॥१८॥
हिंदी अर्थ- जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है कि उस पर पहुंचने के लिए हजार युग लगे। हजार युग योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझकर निगल लिया।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं
जलधि लाँघि गए अचरज नाहीं॥१९॥
हिंदी अर्थ- आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुंह में रखकर समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।

दुर्गम काज जगत के जेते
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०॥
हिंदी अर्थ- संसार में जितने भी कठिन से कठिन काम हो, वो आपकी कृपा से सहज हो जाते है।

राम दुआरे तुम रखवारे
होत ना आज्ञा बिनु पैसारे॥२१॥
हिंदी अर्थ- श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप रखवाले है, जिसमें आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नहीं मिलता
अर्थात् आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।

सब सुख लहैं तुम्हारी सरना
तुम रक्षक काहु को डरना॥२२॥
हिंदी अर्थ- जो भी आपकी शरण में आते है, उस सभी को आनन्द प्राप्त होता है, और जब आप रक्षक है, तो फिर किसी का डर नहीं रहता।

आपन तेज सम्हारो आपै
तीनों लोक हाँक तै कापै॥२३॥
हिंदी अर्थ- आपके सिवाय आपके वेग को कोई नहीं रोक सकता, आपकी गर्जना से तीनों लोक कांप जाते है।

भूत पिशाच निकट नहिं आवै
महावीर जब नाम सुनावै॥२४॥
हिंदी अर्थ- जहां महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है, वहां भूत, पिशाच पास भी नहीं फटक सकते।

नासै रोग हरे सब पीरा
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥२५॥
हिंदी अर्थ- वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से सब रोग चले जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है।

संकट तै हनुमान छुडावै
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥२६॥
हिंदी अर्थ- हे हनुमान जी! विचार करने में, कर्म करने में और बोलने में, जिनका ध्यान आपमें रहता है, उनको सब संकटों से आप छुड़ाते है।

सब पर राम तपस्वी राजा
तिन के काज सकल तुम साजा॥२७॥
हिंदी अर्थ- तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ है, उनके सब कार्यों को आपने सहज में कर दिया।

और मनोरथ जो कोई लावै
सोई अमित जीवन फल पावै॥२८॥
हिंदी अर्थ- जिस पर आपकी कृपा हो, वह कोई भी अभिलाषा करें तो उसे ऐसा फल मिलता है जिसकी जीवन में कोई सीमा नहीं होती।

चारों जुग परताप तुम्हारा
है परसिद्ध जगत उजियारा॥२९॥
हिंदी अर्थ- चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग में आपका यश फैला हुआ है, जगत में आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।

साधु संत के तुम रखवारे
असुर निकंदन राम दुलारे॥३०॥
हिंदी अर्थ- हे श्री राम के दुलारे! आप सज्जनों की रक्षा करते है और दुष्टों का नाश करते है।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता
अस बर दीन जानकी माता॥३१॥
हिंदी अर्थ- आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है, जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते।

राम रसायन तुम्हरे पासा
सदा रहो रघुपति के दासा॥३२॥
हिंदी अर्थ- आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण में रहते है, जिससे आपके पास (असाध्य रोगों के नाश के लिए) राम नाम औषधि है।

तुम्हरे भजन राम को पावै
जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३॥
हिंदी अर्थ- आपका भजन करने से श्री राम जी प्राप्त होते है और जन्म जन्मांतर के दुख दूर होते है।

अंतकाल रघुवरपुर जाई
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥३४॥
हिंदी अर्थ- अंत समय श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते है और यदि फिर भी जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्री राम भक्त कहलाएंगे।

और देवता चित्त ना धरई
हनुमत सेई सर्व सुख करई॥३५॥
हिंदी अर्थ- हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते है, फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नहीं रहती।

संकट कटै मिटै सब पीरा
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥३६॥
हिंदी अर्थ- हे वीर हनुमान जी! जो आपका सुमिरन करता रहता है, उसके सब संकट कट जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है।

जै जै जै हनुमान गोसाई
कृपा करहु गुरु देव की नाई॥३७॥
हिंदी अर्थ- हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझ पर कृपालु श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए।

जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहिं बंदि महा सुख होई॥३८॥
हिंदी अर्थ- जो कोई इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा वह सब बंधनों से छूट जाएगा और उसे परमानन्द मिलेगा।

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥३९॥
हिंदी अर्थ- भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया, इसलिए वे साक्षी है, कि जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।

तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥४०॥
हिंदी अर्थ- हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम का दास है। इसलिए आप उसके हृदय में निवास कीजिए।

दोहा


पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
हिंदी अर्थ- हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनंद मंगलों के स्वरूप हैं। हे देवराज! आप श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय में निवास कीजिए।

सियावर रामचंद्र जी की जय जय जय शरणम् जय जय हरि ओम

हनुमान चालीसा का लाभ (Benefits of Hanuman Chalisa)


हनुमान जी को प्रतिदिन याद करने और उनके मंत्र जाप करने से मनुष्य के सभी भय दूर होते हैं। शनि साढ़ेसाती या महादशा से पीड़ित जातकों के लिए हनुमान चालीसा का पाठ करना लाभदायक माना जाता है। साथ ही जिन लोगों की कुंडली में मांगलिक दोष हो उनके लिए भी हनुमान चालीसा का पाठ लाभदायक समझा जाता है।


गायत्री मंत्र अर्थ सहित व्याख्या जानिए यहा

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

गायत्री मंत्र अर्थ सहित व्याख्या




Gayatri Mantra with Meaning in Hindi


शास्त्रों में गायत्री की महिमा के पवित्र वर्णन मिलते हैं। गायत्री मंत्र तीनों देव, बृह्मा, विष्णु और महेश का सार है। गीता में भगवान् ने स्वयं कहा है ‘गायत्री छन्दसामहम्’ अर्थात् गायत्री मंत्र मैं स्वयं ही हूं।

गायत्री मंत्र को हिन्दू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण  मंत्र माना जाता है.

यह मंत्र हमें ज्ञान प्रदान करता है| इस मंत्र का मतलब है - हे प्रभु, क्रिपा करके हमारी बुद्धि को उजाला प्रदान कीजिये और हमें धर्म का सही रास्ता दिखाईये. यह मंत्र सूर्य देवता के लिये प्रार्थना रूप से भी माना जाता है.

मंत्र


ॐ भूर्भुवः स्वः

तत्सवितुर्वरेण्यं

भर्गो देवस्यः धीमहि

धियो यो नः प्रचोदयात्

गायत्री मंत्र के प्रत्येक शब्द की व्याख्या (Gayatri Mantra Meaning by words in Hindi)


ॐ = प्रणव (परब्रह्मा का अभिवाच्य शब्द)

भूर = मनुष्य को प्राण प्रदाण करने वाला

भुवः = दुख़ों का नाश करने वाला(अंतरिक्ष लोक)

स्वः = सुख़ प्रदाण करने वाला(स्वर्गलोक)

तत = वह ( परमात्मा अथवा ब्रह्म)

सवितुर = सूर्य की भांति उज्जवल(ईश्वर अथवा सृष्टि कर्ता)

वरेण- ्यं = सबसे उत्तम (पूजनीय)

भर्गो- = कर्मों का उद्धार करने वाला (अज्ञान तथा पाप निवारक)

देवस्य- = प्रभु (ज्ञान स्वरुप भगवान का)

धीमहि- = आत्म चिंतन के योग्य (ध्यान)

धियो = बुद्धि

यो = जो

नः = हमारी

प्रचो- दयात् = हमें शक्ति दें (प्रार्थना)(प्रकाशित करें)

अर्थ: 


हम ईश्वर की महिमा का ध्यान करते हैं, जिसने इस संसार को उत्पन्न किया है, जो पूजनीय है, जो ज्ञान का भंडार है, जो पापों तथा अज्ञान की दूर करने वाला हैं- वह हमें प्रकाश दिखाए और हमें सत्य पथ पर ले जाए।

श्री गिरिजात्मज मंदिर, लेण्याद्री




lenyadri girijatmaj ganpati Temple

गिरिजात्मज मंदिर भगवान गणेश के अष्टविनायको में छठा मंदिर है, जो महाराष्ट्र जिले के पुणे के लेण्याद्री में बना हुआ है। लेण्याद्री एक प्रकार की पर्वत श्रंखला है, जिसे गणेश पहाड़ी भी कहा जाता है।

लेण्याद्री में 30 बुद्धिस्ट गुफाए बनी हुई है। गिरिजात्मज मंदिर, अष्टविनायको में से एकमात्र ऐसा मंदिर है जो पर्वतो पर बना हुआ है, जो 30 गुफाओ में से सांतवी गुफा पर बना हुआ है। भगवान गणेश के आठो मंदिरों को लोग पवित्र मानकर पूजते है।

लेण्याद्री असल में कुकड़ी नदी के उत्तर-पश्चिम तट पर बना हुआ है। यहाँ भगवान गणेश को गिरिजात्मज के रूप में पूजा जाता है। गिरिजा वास्तव में देवी पार्वती और अटमाज (पुत्र) का ही एक नाम है। गणेश पुराण में इस जगह को जिर्णपुर और लेखन पर्बत कहा गया है।
किंवदंतियाँ:

गणपति शास्त्र के अनुसार गणेश मयूरेश्वर के रूप में अवतरित हुए थे, जिनकी छः बांहे और सफ़ेद रंग था। उनका वाहन मोर था। उनका जन्म शिव और पार्वती की संतान के रूप में त्रेतायुग में राक्षस सिंधु को मारने के उद्देश्य से हुआ।

एक बार पार्वती ने ध्यान कर रहे अपने पति शिवजी से कुछ पूछा। लेकिन भगवान शिव ने कहा की वे “पुरे ब्रह्माण्ड के समर्थक – गणेश” का ध्यान लगा रहे है और इसके बाद पार्वती ने भी गणेश मंत्र का उच्चार कर ध्यान लगाने की शुरुवात की। एक पुत्र की इच्छा में पार्वती भी भगवान गणेश की तपस्या में लीन हो गयी।
लगभग 12 साल तक लेण्याद्री पर उन्होंने तपस्या की थी। उनकी तपस्या से खुश होकर गणेशजी खुश हुए और उन्होंने उनके पुत्र के रूप में जन्म लिया।

गिरजात्मज का अर्थ है गिरिजा यानी माता पार्वती के पुत्र गणेश। कहा जाता है की हिन्दू माह भाद्रपद के पखवाड़े की चौथी चन्द्र रात को पार्वती ने भगवान गणेश की मिट्टी की प्रतिमा की पूजा की थी और उसी में से भगवान गणेश प्रकट हुए थे।

इसीलिए कहा जाता है की देवी पार्वती ने लेण्याद्री पर भगवान गणेश को जन्म दिया। राक्षसी राजा सिंधु जो जानता था की उसकी मौत गणेश के हांथो होनी थी, वह बार-बार दुसरे राक्षस जैसे क्रूर, बालासुर, व्योमासुर, क्षेम्मा, कुशाल और इत्यादि राक्षसों को उन्होंने भगवान गणेश को मारने के लिए भेजा। लेकिन भगवान गणेश को पछाड़ने की बजाए भगवान गणेश ने खुद उनका विनाश कर दिया।

भगवान गणेश को मयूरेश्वर की उपाधि भी दी जाती है। बाद में मयूरेश्वर ने ही राक्षसी दैत्य सिंधु की हत्या की थी, इसीलिए इस मंदिर को भगवान गणेश के अष्टविनायको में सबसे महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक माना जाता है।

मंदिर तथा मूर्ति


मंदिर में स्थापित मूर्ति का मुख उत्तर की ओर है। उसकी सूँड़ बायीं ओर है और इसकी पूजा मंदिर के पिछले हिस्से से करते हैं, क्योंकि मंदिर का मुँह दक्षिण दिशा की ओर है। मंदिर की मूर्ति बाकी मूर्तियों के समान नक़्क़ाशीदार नहीं है, इसलिये कूच अलग दिखाई देती है। इस मूर्ति की पूजा कोई भी कर सकता है। मंदिर की बनावट कुछ ऐसी है कि वह पूरे दिन सूर्य के प्रकाश से प्रदीप्त रहता है। माना जाता है माता पार्वती ने गणेशजी को पाने के लिये यहाँ तपस्या की थी। 'गिरीजा' (पार्वती) का 'आत्मज' (पुत्र) गिरिजात्मज। यह मंदिर बौद्धिक गुफ़ाओं में से आठवीं गुफ़ा में स्थित है। इन गुफ़ाओं को 'गणेश लेणी' भी कहा जाता है। मंदिर एक ही चट्टान से बनाया गया है, जिसमें सीढ़ियों की संख्या 307 है। इस मंदिर में एक बड़ा कक्ष भी है, जो बिना किसी स्तंभ आधार के खड़ा हुआ है। यह कक्ष 53 फुट लम्बा और 51 फुट चौड़ा है। इसकी ऊँचाई 7 फुट है।

उत्सव:


• माघ शुद्ध चतुर्थी – जनवरी और फरवरी
• गणेश चतुर्थी और भाद्रपद शुद्ध चतुर्थी – अगस्त और सितम्बर
• विजयादशमी – अक्टूबर

विशेषता:


गिरिजात्मज मंदिर के मुख्य देवता भगवान गिरिजात्मज (गणेशजी) है, जिन्हें देवी गिरिजा का पुत्र भी कहा जाता है। गुफा में बने भगवान गणेश के इस मंदिर में हमें भगवान गणेश की मूर्ति को गुफा की काली दीवारों पर उकेरा गया है।

मंदिर तक पहुचने के लिए हमें 283 सीढियां चढ़नी पड़ती है। मंदिर में भगवान गणेश की प्रतिमाए और साथ ही भगवान गणेश के बालपन, युद्ध और उनके विवाह के चित्र भी बने हुए है।


List of Ashtavinayak Temples


1. मयूरेश्वर (मोरेश्वर) गणपति, मोरगाँव

2.सिद्धिविनायक मंदिर, सिद्धटेक

3. बल्लालेश्वर गणपति मंदिर, पाली 

4. वरदविनायक मंदिर ,महड

5, चिंतामणि गणपति मंदिर ,थेउर

6. श्री गिरिजात्मज गणेश मंदिर, लेण्याद्री

7. विघ्नेश्वर मंदिर, ओझर

8. रांजणगाव श्री महागणपती

सिद्धिविनायक गणपति मंदिर, Mumbai (अष्टविनायकों से अलग होते हुए भी सिद्धिविनायक गणपति मंदिर, Mumbai महत्ता किसी सिद्ध-पीठ से कम नहीं।)

चिंचवड के मोरया गोसावी गणपति

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

महाशिवरात्रि कथाए



MahaShivratri Kathaye in hindi

1: समुद्र मंथन


महाशिवरात्रि कथा: समुद्र मंथन अमर अमृत का उत्पादन करने के लिए निश्चित था, लेकिन इसके साथ ही हलाहल नामक विष भी पैदा हुआ था। हलाहल विष में ब्रह्मांड को नष्ट करने की क्षमता थी और इसलिए केवल भगवान शिव इसे नष्ट कर सकते थे। भगवान शिव ने हलाहल नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था। जहर इतना शक्तिशाली था कि भगवान शिव बहुत दर्द से पीड़ित हो उठे थे और उनका गला बहुत नीला हो गया था। इस कारण से भगवान शिव 'नीलकंठ' के नाम से प्रसिद्ध हैं। उपचार के लिए, चिकित्सकों ने देवताओं को भगवान शिव को रात भर जागते रहने की सलाह दी। इस प्रकार, भगवान भगवान शिव के चिंतन में एक सतर्कता रखी। शिव का आनंद लेने और जागने के लिए, देवताओं ने अलग-अलग नृत्य और संगीत बजाने। जैसे सुबह हुई, उनकी भक्ति से प्रसन्न भगवान शिव ने उन सभी को आशीर्वाद दिया।शिवरात्रि इस घटना का उत्सव है, जिससे शिव ने दुनिया को बचाया। तब से इस दिन, भक्त उपवास करते है।

महाशिवरात्रि का महत्व

-जानें क्‍या है महामृत्युंजय मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र से क्या लाभ होता है

MahaShivratri Kathaye in hindi

2: शिकारी कथा


महाशिवरात्रि कथा: एक बार पार्वती जी ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?' उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- 'एक बार चित्रभानु नामक एक शिकारी था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।'

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो विल्वपत्रों से ढका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई।

कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।' शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूं। हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं।

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल-वृक्षपर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृगविनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।' उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया। भगवान शिव की अनुकंपा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि  वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया। देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प-वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए'।

महाशिवरात्रि का महत्व

-जानें क्‍या है महामृत्युंजय मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र से क्या लाभ होता है

जानिए महाशिवरात्रि कथाए

 

महामृत्युंजय मंत्र



महामृत्युंजय मंत्र एक ऐसा मंत्र है जिसका जप करने से मनुष्य मौत पर भी विजय प्राप्त कर सकता है. शास्त्रों में अलग-अलग कार्यों के लिए अलग-अलग संख्याओं में मंत्र के जप का विधान है.

महामृत्युञ्जय मन्त्र या महामृत्युंजय मंत्र ("मृत्यु को जीतने वाला महान मंत्र") जिसे त्रयंबकम मंत्र भी कहा जाता है, यजुर्वेद के रूद्र अध्याय में, भगवान शिव की स्तुति हेतु की गयी एक वन्दना है। इस मन्त्र में शिव को 'मृत्यु को जीतने वाला' बताया गया है।
महामृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद का एक श्लोक है.शिव को मृत्युंजय के रूप में समर्पित ये महान मंत्र ऋग्वेद में पाया जाता है.स्वयं या परिवार में किसी अन्य व्यक्ति के अस्वस्थ होने पर महामृत्युंजय मंत्र जप करने से मनुष्य मौत पर भी विजय प्राप्त कर सकता है.

महाशिवरात्रि का महत्व

जानिए महाशिवरात्रि कथाए

किस समस्या में इस मंत्र का कितने बार करें जाप...


- भय से छुटकारा पाने के लिए 1100 मंत्र का जप किया जाता है.

-रोगों से मुक्ति के लिए 11000 मंत्रों का जप किया जाता है.

-पुत्र की प्राप्ति के लिए, उन्नति के लिए, अकाल मृत्यु से बचने के लिए सवा लाख की संख्या में मंत्र जप करना अनिवार्य है.

- यदि साधक पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यह साधना करें, तो वांछित फल की प्राप्ति की प्रबल संभावना रहती है.

इस मंत्र का करें जाप


ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌॥

संपूर्ण महामृत्युंजय मंत्र


ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः
ॐ त्र्यम्‍बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्‍धनान्
मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात्
ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !!

मंत्र का अर्थ


हम त्रिनेत्र को पूजते हैं,
जो सुगंधित हैं, हमारा पोषण करते हैं,
जिस तरह फल, शाखा के बंधन से मुक्त हो जाता है,
वैसे ही हम भी मृत्यु और नश्वरता से मुक्त हो जाएं।

महाशिवरात्रि का महत्व

-जानें क्‍या है महामृत्युंजय मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र से क्या लाभ होता है

जानिए महाशिवरात्रि कथाए

महाशिवरात्रि


महाशिवरात्रि का महत्व


MahaShivaratri in hindi

पुराणों में महाशिवरात्रि (MahaShivaratri in hindi) का सर्वाधिक महत्‍व बताया गया है. हिन्‍दू मान्‍यताओं में साल में आने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है.

महाशिवरात्रि (MahaShivaratri in hindi) हिन्‍दुओं का प्रमुख त्‍योहार है. आदि देव महादेव के भक्‍त साल भर इस दिन की प्रतीक्षा करते हैं. मान्‍यता है कि महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, बेर और भांग चढ़ाने से भक्‍त की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और उसे महादेव की विशेष कृपा मिलती है. वैसे तो हर महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन शिवरात्रि (Shivratri) आती है,

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि का प्रारंभ इसी दिन से हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग (जो महादेव का विशालकाय स्वरूप है) के उदय से हुआ। इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ हुआ था। साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है| भारत सहित पूरी दुनिया में महाशिवरात्रि का पावन पर्व बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है|

क्‍यों मनाई जाती है महाशिवरात्रि?


MahaShivaratri in hindi

एक पौराणिक मान्‍यता के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन ही शिव जी पहली बार प्रकट हुए थे. मान्‍यता है कि शिव जी अग्नि ज्‍योर्तिलिंग के रूप में प्रकट हु थे, जिसका न आदि था और न ही अंत. कहते हैं कि इस शिवलिंग के बारे में जानने के लिए सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा ने हंस का रूप धारण किया और उसके ऊपरी भाग तक जाने की कोशिश करने लगे, लेकिन उन्‍हें सफलता नहीं मिली. वहीं, सृष्टि के पालनहार विष्‍णु ने भी वराह रूप धारण कर उस शिवलिंग का आधार ढूंढना शुरू किया लेकिन वो भी असफल रहे.

- एक अन्‍य पौराणिक मान्‍यता के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन ही विभन्नि 64 जगहों पर शिवलिंग उत्‍पन्न हुए थे. हालांकि 64 में से केवल 12 ज्‍योर्तिलिंगों के बारे में जानकारी उपलब्‍ध. इन्‍हें 12 ज्‍योर्तिलिंग के नाम से जाना जाता है.

- महाशिवरात्रि की रात को ही भगवान शिव शंकर और माता शक्ति का विवाह संपन्न हुआ था.

अनुष्ठान


गेंदे के फूलों की अनेक प्रकार की मालायें जो शिव को चढ़ाई जाती हैं।
इस अवसर पर भगवान शिव का अभिषेक अनेकों प्रकार से किया जाता है। जलाभिषेक : जल से और दुग्‍धाभिषेक : दूध से। बहुत जल्दी सुबह-सुबह भगवान शिव के मंदिरों पर भक्तों, जवान और बूढ़ों का ताँता लग जाता है वे सभी पारंपरिक शिवलिंग पूजा करने के लिए जाते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं। भक्त सूर्योदय के समय पवित्र स्थानों पर स्नान करते हैं जैसे गंगा, या (खजुराहो के शिव सागर में) या किसी अन्य पवित्र जल स्रोत में। यह शुद्धि के अनुष्ठान हैं, जो सभी हिंदू त्योहारों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पवित्र स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहने जाते हैं, भक्त शिवलिंग स्नान करने के लिए मंदिर में पानी का बर्तन ले जाते हैं महिलाओं और पुरुषों दोनों सूर्य, विष्णु और शिव की प्रार्थना करते हैं मंदिरों में घंटी और "शंकर जी की जय" ध्वनि गूंजती है। भक्त शिवलिंग की तीन या सात बार परिक्रमा करते हैं और फिर शिवलिंग पर पानी या दूध भी डालते हैं।

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जानिए महाशिवरात्रि कथाए

शिव पुराण के अनुसार, महाशिवरात्रि पूजा में छह वस्तुओं को अवश्य शामिल करना चाहिए:


MahaShivaratri in hindi

शिव लिंग का पानी, दूध और शहद के साथ अभिषेक। बेर या बेल के पत्ते जो आत्मा की शुद्धि का प्रतिनिधित्व करते हैं;

सिंदूर का पेस्ट स्नान के बाद शिव लिंग को लगाया जाता है। यह पुण्य का प्रतिनिधित्व करता है;

फल, जो दीर्घायु और इच्छाओं की संतुष्टि को दर्शाते हैं;

जलती धूप, धन, उपज (अनाज); दीपक जो ज्ञान की प्राप्ति के लिए अनुकूल है; और पान के पत्ते जो सांसारिक सुखों के साथ संतोष अंकन करते हैं।

महाशिवरात्रि के दिन ये नहीं करना चाहिए


MahaShivaratri in hindi

-शिवजी की पूजा में हल्दी से पूजा करना अच्छा नहीं माना जाता है इसलिए

भूलकर भी शिवरात्रि पर शिवलिंग पर हल्दी नहीं चढ़ानी चाहिए।

-अगर आप चाहते है कि इस शिवरात्रि को भगवान शिव आपके ऊपर विशेष कृपा बरसाएं तो सुबह ही शिवलिंग पर जल चढ़ाएं। पूजा के लिए सुबह का समय उपयुक्त होता है। शिवरात्रि के दिन देर से उठना अशुभ माना जाता है।

-शिवजी की पूजा में शास्त्रों द्वारा बताए गए बर्तनों का उपयोग करना चाहिए। पूजा में भूलकर भी लोहे,स्टील और प्लास्टिक के बर्तन का उपयोग नहीं करना चाहिए।

-शिवरात्रि के दिन पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध नहीं बनाना चाहिए। इस दिन शांत और शुद्ध मन से शिव-पार्वती की पूजा करना चाहिए।

-शिवरात्रि के दिन कभी भी किसी को कठोर शब्द नहीं कहने चाहिए अन्यथा आपकी पूजा स्वीकार्य नहीं होगी। शिवरात्रि पर इस बात का विशेषतौर पर ध्यान रखना चाहिए घर में किसी सदस्य से या फिर बाहर झगड़ा नहीं करना चाहिए।

-भगवान शिव की पूजा में भूलकर भी टूटे हुए चावल नहीं चढ़ाया जाना चाहिए।अक्षत का मतलब होता है अटूट चावल, यह पूर्णता का प्रतीक है। इसलिए शिव जी को अक्षत चढ़ाते समय यह देख लें कि चावल टूटे हुए तो नहीं है।

-शिवरात्रि के दिन भगवान शिव को यदि प्रसन्न करना चाहते हैं तो इस दिन काले रंग के कपड़े ना पहनें।

महाशिवरात्रि का महत्व

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जानिए महाशिवरात्रि कथाए

 

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

प्रदक्षिणा में छिपा इतिहास




यह परिक्रमा केवल पारंपरिक आधार पर ही नहीं की जाती बल्कि इसे करने के और भी कारण हैं। कारण जानने से पहले जरूरी है परिक्रमा करने के लाभ जानना लेकिन इससे भी अति आवश्यक है परिक्रमा करने के पीछे का इतिहास। हिन्दू धार्मिक इतिहास में दी गए एक कथा हमें परिक्रमा करने का कारण भी बताती है।

माता पार्वती का आदेश
एक बार भगवान शंकर की अर्धांगिनी माता पार्वती द्वारा अपने पुत्रों कार्तिकेय तथा गणेश को सांसारिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए पृथ्वी का एक चक्कर लगाकर उनके पास वापस लौटने का आदेश दिया गया। जो भी पुत्र इस परिक्रमा को पूर्ण कर माता के पास सबसे पहले पहुंचता वही इस दौड़ का विजेता होता तथा उनकी नजर में सर्वश्रेष्ठ कहलाता।

कार्तिकेय और गणेश
यह सुन कार्तिकेय अपनी सुंदर सवारी मोर पर सवार हुए तथा पृथ्वी का चक्कर लगाने के लिए निकल पड़े। उन्हें यह भ्रमण समाप्त करने में युग लग गए लेकिन दूसरी ओर गणेश द्वारा माता की आज्ञा को पूरा करने का तरीका काफी अलग था जिसे देख सभी हैरान रह गए।

भगवान गणेश ने की परिक्रमा
गणेश ने अपने दोनों हाथ जोड़े तथा माता पार्वती के चक्कर लगाना शुरू कर दिया। जब कार्तिकेय पृथ्वी का चक्कर लगाकर वापस लौटे और गणेश को अपने सामने पाया तो वह हैरान हो गए। उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि कैसे गणेश उनसे पहले दौड़ का समापन कर सकते हैं।

माता पार्वती ही हैं संसार
बाद में प्रभु गणेश से जब पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उनका संसार तो स्वयं उनकी माता हैं, इसलिए उन्हें ज्ञान प्राप्ति के लिए विश्व का चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं है। इस पौराणिक कथा में भगवान गणेश की सूझबूझ ना केवल मनुष्य को परिक्रमा पूर्ण करने का महत्व समझाती है, बल्कि यह भी बताती है कि हमारे माता-पिता, जो कि ईश्वर के समान हैं उनकी परिक्रमा करने से ही हमें संसार का ज्ञान प्राप्त होता है।

इनकी भी होती है परिक्रमा
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार केवल भगवान ही नहीं बल्कि और भी कई वस्तुओं की परिक्रमा की जाती है। ईश्वर के अलावा अग्नि, पेड़ तथा पौधों की परिक्रमा भी की जाती है। सबसे पवित्र माने जाने वाले तुलसी के पौधे की परिक्रमा करना हिन्दू धर्म में काफी प्रसिद्ध है।
मूर्ति, पेड़, पौधे
इसके अलावा पीपल के पेड़ और अग्नि की परिक्रमा भी की जाती है। अग्नि की परिक्रमा हिन्दू विवाह की एक अहम रीति है जिसमें भावी पति तथा पत्नी द्वारा विवाह संस्कार के दौरान एक-दूसरे से पावन रिश्ता जोड़ने के लिए हवन कुंड में जलती हुई अग्नि के सात फेरे लिए जाते हैं। फेरों में पति तथा पत्नी द्वारा जीवन भर साथ निभाने के वचन भी लिए जाते हैं।

परिक्रमा कयों करते है और परिक्रमा करने का लाभ


 

 

Cut+Copy+Paste लैरी टेस्लर का जन्म न्यू यॉर्क में हुआ था. उन्होंने स्टैनफोर्ड युनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई की थी. 1973 में उन्होंने Xerox Palo Alto Research Center (PARC) ज्वाइन किया.  टेस्लर ने PARC में टिम मॉट के साथ मिल कर जिप्सी टेक्स्ट एडिटर तैयार किया. इसी जिप्सी टेक्स्ट एडिटर में उन्होंने टेक्स्ट को कॉपी और मूव करने के लिए मोडलेस मेथड तैयार किया. यहां से ही कट, कॉपी और पेस्ट टर्म का इजाद हुआ.

Cut+Copy+Paste ये एक ऐसा टर्म है जिसके बिना शायद ही आप कंप्यूटर या सोशल मीडिया पर जरूरी काम कर सकते हैं. कट, कॉपी पेस्ट को जिन्होंने इन्वेंट किया वो शायद स्टीव जॉब्स जितने पॉपुलर तो न हो सके, लेकिन उनका योगदान अहम है.

लैरी टेस्लर ने PARC में ही कट, कॉपी और पेस्ट डेवेलप किया. हालांकि बाद में ये कट, कॉपी और पेस्ट का कॉन्सेप्ट कंप्यूटर के इंटरफेस और टेक्स्ट एडिटर्स के लिए आ गया. जिस PARC कंपनी नें लैरी काम करते थे उसे ही शुरुआती ग्राफिकल यूजर इंटरफेस और माउस नेविगेशन का क्रेडिट जाता है. गौरतलब है कि ऐपल के को-फाउंडर स्टीव जॉब्स ने भी PARC के इस रिसर्च को ऐपल प्रोडक्ट्स को बेहतर करने के लिए इस्तेमाल किया था. बताया जाता है कि जब स्टीव जॉब्स Xerox आए थे तो उसी टीम में लैरी टेस्लर भी वहां मौजूद थे

 

74 साल की उम्र में हुआ निधन
कट, कॉपी और पेस्ट यूजर इंटरफेस को लैरी टेस्लर ने तैयार किया था. 74 साल की उम्र में लैरी का निधन हो गया है. उनका जन्म न्यू यॉर्क में हुआ था. इन्होंने अपनी पढ़ाई स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस में पूरी की थी. इसके बाद उन्होंने साल 1973 में Xerox Palo Alto Research Center (PARC) ज्वाइन किया. इसके बाद स्टीव जॉब्स का ऑफर मिलने के बाद उन्होंने 17 साल तक एप्पल में काम किया और चीफ साइंटिस्ट के पद तक पहुंचे.

परिक्रमा कयों करते है और परिक्रमा करने का लाभ



परिक्रमा या प्रदक्षिणा


परिक्रमा या संस्कृत में प्रदक्षिणा, प्रभु की उपासना करने के लिए की जाती है। अकसर लोग मंदिरों, मस्जिदों तथा गुरुद्वारों में एक विशेष स्थल जहां भगवान की मूरत या फिर कोई पूज्य वस्तु रखी जाती है, उस स्थान के आसपास चक्राकार दिशा में परिक्रमा करते हैं।

हिन्दू धर्म में परिक्रमा का बड़ा महत्त्व है। परिक्रमा से अभिप्राय है कि सामान्य स्थान या किसी व्यक्ति के चारों ओर उसकी बाहिनी तरफ से घूमना। इसको 'प्रदक्षिणा करना' भी कहते हैं, जो षोडशोपचार पूजा का एक अंग है। प्रदक्षिणा की प्रथा अतिप्राचीन है। वैदिक काल से ही इससे व्यक्ति, देवमूर्ति, पवित्र स्थानों को प्रभावित करने या सम्मान प्रदर्शन का कार्य समझा जाता रहा है। दुनिया के सभी धर्मों में परिक्रमा का प्रचलन हिन्दू धर्म की देन है।भगवान गणेश और कार्तिकेय ने भी परिक्रमा की थी। यह प्रचलन वहीं से शुरू हुआ है।

सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं और सभी ग्रहों को साथ लेकर यह सूर्य महासूर्य की परिक्रमा कर रहा है। संपूर्ण ब्रह्माण में चक्र और परिक्रमा का बड़ा महत्व है। भारतीय धर्मों (हिन्दू, जैन, बौद्ध आदि) में पवित्र स्थलों के चारो ओर श्रद्धाभाव से चलना 'परिक्रमा' या 'प्रदक्षिणा' कहलाता है।

तीर्थ यात्रा के लिए शास्त्रीय निर्देश यह है कि उसे पद यात्रा के रूप में ही किया जाए। यह परंपरा कई जगह निभती दिखाई देती है। पहले धर्म परायण व्यक्ति छोटी-बड़ी मंडलियां बनाकर तीर्थ यात्रा पर निकलते थे। यात्रा के मार्ग और पड़ाव निश्चित थे। मार्ग में जो गांव, बस्तियां, झोंपड़े नगले पुरबे आदि मिलते थे, उनमें रुकते, ठहरते, किसी उपयुक्त स्थान पर रात्रि विश्राम करते थे। जहां रुकना वहां धर्म चर्चा करना-लोगों को कथा सुनाना, यह क्रम प्रातः से सायंकाल तक चलता था। रात्रि पड़ाव में भी कथा कीर्तन, सत्संग का क्रम बनता था। अक्सर यह यात्राएं नवंबर माह के मध्य में प्रारंभ होती है।

जानिए प्रदक्षिणा में छिपा इतिहास


परिक्रमा मार्ग और दिशा :


'प्रगतं दक्षिणमिति प्रदक्षिणं' के अनुसार अपने दक्षिण भाग की ओर गति करना प्रदक्षिणा कहलाता है। प्रदक्षिणा में व्यक्ति का दाहिना अंग देवता की ओर होता है। इसे परिक्रमा के नाम से प्राय: जाना जाता है। 'शब्दकल्पद्रुम' में कहा गया है कि देवता को उद्देश्य करके दक्षिणावर्त भ्रमण करना ही प्रदक्षिणा है।

प्रदक्षिणा का प्राथमिक कारण सूर्यदेव की दैनिक चाल से संबंधित है। जिस तरह से सूर्य प्रात: पूर्व में निकलता है, दक्षिण के मार्ग से चलकर पश्चिम में अस्त हो जाता है, उसी प्रकार वैदिक विचारकों के अनुसार अपने धार्मिक कृत्यों को बाधा विध्नविहीन भाव से सम्पादनार्थ प्रदक्षिणा करने का विधान किया गया। शतपथ ब्राह्मण में प्रदक्षिणा मंत्र स्वरूप कहा भी गया है, सूर्य के समान यह हमारा पवित्र कार्य पूर्ण हो।

दार्शनिक महत्व


इसका एक दार्शनिक महत्व यह भी है कि संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रत्येक ग्रह-नक्ष‍त्र किसी न किसी तारे की परिक्रमा कर रहा है। यह परिक्रमा ही जीवन का सत्य है। व्यक्ति का संपूर्ण जीवन ही एक चक्र है। इस चक्र को समझने के लिए ही परिक्रमा जैसे प्रतीक को निर्मित किया गया। भगवान में ही सारी सृष्टि समाई है, उनसे ही सब उत्पन्न हुए हैं, हम उनकी परिक्रमा लगाकर यह मान सकते हैं कि हमने सारी सृष्टि की परिक्रमा कर ली है।

परिक्रमा करने के लाभ


भगवान से विभिन्न फल पाने के लिए या फिर अपने मन को शांति देने के लिए हम उनसे प्रार्थना करते हैं। इसी तरह से भगवान की परिक्रमा करते हुए भी हमें अनेक लाभ मिलते हैं। कहते हैं मंदिर या पूजा स्थल पर प्रार्थना करने के बाद उस जगह का वातावरण काफी सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है।

परिक्रमा का वैज्ञानिक लाभ


जो भी व्यक्ति उस स्थान पर उस समय मौजूद होता है उसे इस ऊर्जा की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि ठीक गणेश भगवान की तरह ही मंदिर में भक्त भी भगवान की मूर्ति की परिक्रमा करता है और उनसे सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करता है। यह ऊर्जा हमें जीवन में आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करती है। इस तरह ना केवल आध्यात्मिक वरन् मनुष्य के शरीर को भी वैज्ञानिक रूप से लाभ देती है परिक्रमा।

जानिए प्रदक्षिणा में छिपा इतिहास


ये हैं प्रमुख परिक्रमाएं:-


1.देवमंदिर और मूर्ति परिक्रमा:- जैसे देव मंदिर में जगन्नाथ पुरी परिक्रमा, रामेश्वरम, तिरुवन्नमल, तिरुवनन्तपुरम परिक्रमा और देवमूर्ति में शिव, दुर्गा, गणेश, विष्णु, हनुमान, कार्तिकेय आदि देवमूर्तियों की परिक्रमा करना।

2.नदी परिक्रमा:- जैसे नर्मदा, गंगा, सरयु, क्षिप्रा, गोदावरी, कावेरी परिक्रमा आदि।

3 .पर्वत परिक्रमा:- जैसे गोवर्धन परिक्रमा, गिरनार, कामदगिरि, तिरुमलै परिक्रमा आदि।

4 .वृक्ष परिक्रमा:- जैसे पीपल और बरगद की परिक्रमा करना।

5 .तीर्थ परिक्रमा:- जैसे चौरासी कोस परिक्रमा, अयोध्या, उज्जैन या प्रयाग पंचकोशी यात्रा, राजिम परिक्रमा आदि।

6 .चार धाम परिक्रमा:- जैसे छोटा चार धाम परिक्रमा या बड़ा चार धाम यात्रा।

7 . भरत खण्ड परिक्रमा:- अर्थात संपूर्ण भारत की परिक्रमा करना। परिवाज्रक संत और साधु ये यात्राएं करते हैं। इस यात्रा के पहले क्रम में सिंधु की यात्रा, दूसरे में गंगा की यात्रा, तीसरे में ब्रह्मपु‍त्र की यात्रा, चौथे में नर्मदा, पांचवें में महानदी, छठे में गोदावरी, सातवें में कावेरा, आठवें में कृष्णा और अंत में कन्याकुमारी में इस यात्रा का अंत होता है। हालांकि प्रत्येक साधु समाज में इस यात्रा का अलग अलग विधान और नियम है।

8 . विवाह परिक्रम:- मनु स्मृति में विवाह के समक्ष वधू को अग्नि के चारों ओर तीन बार प्रदक्षिणा करने का विधान बतलाया गया है जबकि दोनों मिलकर 7 बार प्रदक्षिणा करते हैं तो विवाह संपन्न माना जाता है।

किस देव की कितनी बार परिक्रमा?


1.भगवान शिव की आधी परिक्रमा की जाती है।

2.माता दुर्गा की एक परिक्रमा की जाती है।

3.हनुमानजी और गणेशजी की तीन परिक्रमा की जाती है।

4.भगवान विष्णु की चार परिक्रमा की जाती है।

5.सूर्यदेव की चार परिक्रमा की जाती है।

6. पीपल वृक्ष की 108 परिक्रमाएं करना चाहिए।

7. जिन देवताओं की प्रदक्षिणा का विधान नही प्राप्त होता है, उनकी तीन प्रदक्षिणा की जा सकती है।

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अष्टविनायक




भगवान गणपति के प्रसिद्ध आठ मंदिर “अष्टविनायक” – Ashtavinayak

अष्टविनायक का मतलब है आठ गणपति। अष्टविनायक यह भगवान गणपति के प्रसिद्ध आठ मंदिर हैं जो महाराष्ट्र में हैं। पश्चिमी महाराष्ट्र और कोंकण के इन मंदिरों का स्वतंत्र इतिहास है। चूंकि इन सभी मंदिरों में पेशवाओं की शरण थी, इसलिए पेशवा के समय उन्हें महत्व मिले। अष्टविनायक का विवरण मुदगल पुराण में भी पाया जाता है।

महाराष्ट्र के हर गांव में श्री गणेश के एक या दो मंदिर पाए जाते हैं। उन मंदिरों से हजारों भक्तों ने गणपति के हर रूप का अनुभव किया है। ऐसा होने के बावजूद महाराष्ट्र में विशेष ‘आठ’ जगह के गणेश मंदिर, मूर्तियों का विशेष महत्व है।

इन आठ मंदिरों को ‘अष्टविनायक’ कहा जाता है। विनायक गणपति के कई नामों में से एक है; यही कारण है कि ये इन आठ मंदिरों के समूह मतलब अष्टविनायक हैं। महाराष्ट्र के मंदिर न केवल महाराष्ट्र में बल्कि पूरे भारत में भी जाने जाते है।

गणपति शिक्षा का देवता है, वो सुखकर्ता दुखहर्ता और सभी का रक्षणकर्ता हैं, ऐसी गणेश भक्तों की भावना है।

आठ मंदिरों की तीर्थ यात्रा-List of Ashtavinayak Temples


गणपति के सभी आठ मंदिर उनके विभिन्न रूपों, बाधाओं को दूर करने वाले से लेकर उन्नति और विद्या प्राप्ति के मार्गप्रदर्शक रूप तक का वर्णन करते हैं। प्रत्येक मंदिर अलग है, जबकि प्रत्येक मंदिर में अलौकिक समानता है।

1. मयूरेश्वर (मोरेश्वर) गणपति, मोरगाँव

2.सिद्धिविनायक मंदिर, सिद्धटेक

3. बल्लालेश्वर गणपति मंदिर, पाली 

4. वरदविनायक मंदिर ,महड

5, चिंतामणि गणपति मंदिर ,थेउर

6. श्री गिरिजात्मज गणेश मंदिर, लेण्याद्री

7. विघ्नेश्वर मंदिर, ओझर

8. रांजणगाव श्री महागणपती

सिद्धिविनायक गणपति मंदिर, Mumbai (अष्टविनायकों से अलग होते हुए भी सिद्धिविनायक गणपति मंदिर, Mumbai महत्ता किसी सिद्ध-पीठ से कम नहीं।)

चिंचवड के मोरया गोसावी गणपति

रांजनगांव श्री महागणपती




Mahaganpati Temple Ranjangaon

रांजनगांव गणपति भगवान गणेश के अष्टविनायको में से एक है। इस मंदिर में स्थापित भगवान गणेश की मूर्ति को “खोल्लम” परिवार ने भेट स्वरुप दिया और मंदिर का उद्घाटन भी किया। पुणे के स्थानिक लोगो के बीच यह मंदिर काफी प्रसिद्ध है।
आपको इस बात को जानकर हैरानी होंगी की मंदिर के भगवान गणेश की मूर्ति को “महोत्कट” कहा जाता है और ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योकि मूर्ति की 10 सूंढ़ और 20 हाँथ है।

इतिहास:


खोल्लम परिवार रांजनगांव में बसा हुआ स्वर्णकारो का एक परिवार था। एतिहासिक रहस्योंद्घाटन के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 9 वी से 10 वी शताब्दी में किया गया।

माधवराव पेशवा ने मंदिर के निचले भाग में भगवान गणेश की मूर्ति रखने के लिए एक कमरे का निर्माण भी करवाया था। इसके बाद इंदौर के सरदार किबे से मंदिर की अवस्था में सुधार किया था।

मंदिर का नगरखाना भी प्रवेश द्वार पर बना हुआ है। मुख्य मंदिर ऐसा लगता है जैसे इसका निर्माण पेशवा के समय में किया गया। पूर्व मुखी मंदिर का एक विशाल और सुंदर प्रवेश द्वार है।

किंवदंतियाँ:


किंवदंतियों के अनुसार त्रिपुरासुर नामक असुर स्वर्ग और पृथ्वी में मानव समाज को क्षति पंहुचा रहा था। सभी देवताओ की दलीलों को सुनकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें जल्द ही इस बात का एहसास हो गया था की वे उस असुर को पराजित नही कर सकते।

इसके बाद नारद मुनि की राय मानकर शिवजी ने गणेश को याद किया और एक ही तीर से असुर और त्रिपुरा के किले को ध्वस्त कर दिया। त्रिपुरा असुर को ध्वस्त करने वाले शिवजी पास ही भीमाशंकर में प्रतिष्ठापित हो गए।

दक्षिण भारत की किंवदंतियों के अनुसार गणेश ने भगवान शिव रथ की धुरा को तोडा था, जबकि उस समय शिवजी असुर त्रिपुरासुर से युद्ध कर रहे थे। अंत में असुर को पराजित कर भगवान शिव ने वही भगवान गणेश के मंदिर को प्रतिष्ठापित किया था।

पुणे-नगर हाईवे से जाते समय पुणे-कोरेगांव का रास्ता पकडे और शिक्रापुर से जाते समय रांजनगांव शिरूर से 21 किलोमीटर पहले आता है। पुणे से यह 50 किलोमीटर दूर है।

 

लोकेशन मैप रांजणगांव महागणपति



List of Ashtavinayak Temples


1. मयूरेश्वर (मोरेश्वर) गणपति, मोरगाँव

2.सिद्धिविनायक मंदिर, सिद्धटेक

3. बल्लालेश्वर गणपति मंदिर, पाली 

4. वरदविनायक मंदिर ,महड

5, चिंतामणि गणपति मंदिर ,थेउर

6. श्री गिरिजात्मज गणेश मंदिर, लेण्याद्री

7. विघ्नेश्वर मंदिर, ओझर

8. रांजणगाव श्री महागणपती

सिद्धिविनायक गणपति मंदिर, Mumbai (अष्टविनायकों से अलग होते हुए भी सिद्धिविनायक गणपति मंदिर, Mumbai महत्ता किसी सिद्ध-पीठ से कम नहीं।)

चिंचवड के मोरया गोसावी गणपति

विघ्नेश्वर गणपति मंदिर, ओझर




Vigneshwara Ozar Ganpati

विग्नेश्वर मंदिर उर्फ़ विघ्नहर गणपति मंदिर भगवान गणेश को समर्पित एक हिन्दू मंदिर है। भगवान गणेश गजमुखी और बुद्धि के देवता है। यह मंदिर भारत के महाराष्ट्र में बने भगवान गणेश के अष्टविनायको में से एक है। यहाँ भगवान गणेश के विघ्नेश्वर रूप की पूजा की जाती है।
इतिहास:

पेशवा बाजीराव प्रथम के भाई और मिलिट्री कमांडर चिमाजी अप्पा ने मंदिर की अवस्था में सुधार किया और पुर्तगालीयो से वसई किले को जीतने के बाद मंदिर के शिखर को स्वर्ण से सजाया था।

1967 में भगवान गणेश के भक्त अप्पा शास्त्री जोशी ने भी मंदिर की अवस्था में सुधार किया था।

धार्मिक महत्त्व:


भगवान गणेश के अष्टविनायको में ओज़र का गणेश मंदिर सांतवे स्थान पर आता है, कई बार श्रद्धालु पांचवे स्थान पर ही इस मंदिर के दर्शन कर के लिए आते है।

मुद्गल पुराण, स्कंद पुराण और तमिल विनायक पुराण के अनुसार : राजा अभिनन्दन ने एक बलिदान दिया, जिसमे उन्होंने देवराज इंद्र को कुछ भी प्रस्तुत नही किया। व्यथित होकर इंद्र ने काल (समय/मृत्यु) को उनके बलिदान को ख़त्म करने का आदेश दे दिया।

इसके बाद काल ने असुर विघ्नसुर का रूप लिया, जो बलिदान की प्रक्रिया में बाधा बनकर खड़ा हुआ। इसी के साथ उसने ब्रह्माण्ड का भी नाश करना शुरू किया, बलिदान में बाधा बनने के साथ-साथ वह दूसरो को भी क्षति पंहुचा रहा था।

फिर संतो ने परेशान होकर मदद के लिए भगवान शिव और ब्रह्मा को प्रार्थना की, जिन्होंने संतो को भगवान गणेश की पूजा करने के लिए कहा।

सन्यासियों की प्रार्थना सुनकर भगवान गणेश से असुर राजा से युद्ध की शुरुवात की, जिसमे असुर को जल्द ही इस बात का एहसास हो चूका था की वह गणेश को पराजित नही कर सकता और इसीलिए उसने किसी को हानि न पहुचाने का वादा किया। तभी से भगवान गणेश को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है।

पराजय के बाद विघ्नसुर ने भगवान गणेश को अपना नाम धारण करने की प्रार्थना भी की और कहा जाता है की तभी से इस मंदिर को विघ्नेश्वर मंदिर कहा जाता है। मंदिर में हमें विघ्नेश्वर के रूप में भगवान गणेश की प्रतिमा देखने मिलती है।

उत्सव:


मंदिर में भगवान गणेश से जुड़े सभी उत्सव मनाए जाते है। जिनमे मुख्य रूप से गणेश चतुर्थी और गणेश जयंती शामिल है। इसके साथ-साथ मंदिर में कार्तिक पूर्णिमा को 5 दिनों तक चलने वाले एक उत्सव का भी आयोजन किया जाता है।

List of Ashtavinayak Temples


1. मयूरेश्वर (मोरेश्वर) गणपति, मोरगाँव

2.सिद्धिविनायक मंदिर, सिद्धटेक

3. बल्लालेश्वर गणपति मंदिर, पाली 

4. वरदविनायक मंदिर ,महड

5, चिंतामणि गणपति मंदिर ,थेउर

6. श्री गिरिजात्मज गणेश मंदिर, लेण्याद्री

7. विघ्नेश्वर मंदिर, ओझर

8. रांजणगाव श्री महागणपती

सिद्धिविनायक गणपति मंदिर, Mumbai (अष्टविनायकों से अलग होते हुए भी सिद्धिविनायक गणपति मंदिर, Mumbai महत्ता किसी सिद्ध-पीठ से कम नहीं।)

चिंचवड के मोरया गोसावी गणपति

बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

अष्टविनायक मंत्र



महाराष्ट्र की संस्कृति में गणपति का विशेष स्थान है। भारत के सबसे प्रसिद्ध गणेश मंदिर महाराष्ट्र में स्थित हैं। जिस प्रकार भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का विशेष महत्व है वैसे ही गणपति उपासना के लिए महाराष्ट्र के अष्टविनायक यानि आठ विशेष मंदिरों का विशेष महत्व है।

Ashtavinayak Mantra in hindi

स्वस्ति श्रीगणनायकं गजमुखं मोरेश्वरं सिद्धिदम् ॥१॥
बल्लाळं मुरुडे विनायकमहं चिन्तामणिं थेवरे ॥२॥
लेण्याद्रौ गिरिजात्मजं सुवरदं विघ्नेश्वरं ओझरे ॥३॥
ग्रामे रांजणनामके गणपतिं कुर्यात् सदा मङ्गलम् ॥४॥

Svasti Shrii-Ganna-Naayakam Gaja-Mukham Moreshvaram Siddhidam ॥1॥
Ballaallam Murudde Vinaayakam-Aham Cintaamannim Thevare ॥2॥
Lennyaadrau Girija[a-A]atmajam Suvaradam Vighneshvaram Ojhare ॥3॥
Graame Raamjanna-Naamake Gannapatim Kuryaat Sadaa Manggalam ॥4॥

Meaning:


Ashtavinayak Mantra in hindi

(May Well-Being come to those who remember Sri Vinayaka)
1: May Swasti (Well-Being) come to those who remember Sri Gananayaka (Leader of the Ganas or Celestial attendants), Who has the Auspicious Face of an Elephant; Who abides as Moreshwara (Mayureshwar), and Who abides as Siddhida (Giver of Siddhis) (Siddhi Vinayak),

2: Who abides as Sri Ballala (Ballaleshwar), Who abides as Vinayaka (Remover of Obstacles) at Muruda (Varad Vinayak) and Who abides as Chintamani (Chintamani, a Wish-Fulfilling Gem) at Thevara (Chintamani Vinayak),

3: Who abides as Girijatmaja (Son of Devi Girija or Parvati) at Lenyadri (Girijatmak), and Who abides as Vigneshwara at Ojhara (Vigneshwar) where He is the giver of abundant Boons,

4: Who abides as Ganapati in the village named Raanjana (Ranjangaon) (Mahaganapati); May He always bestow His Auspicious Grace on us.


अष्टविनायक मंत्र

List of Ashtavinayak Temples


1. मयूरेश्वर (मोरेश्वर) गणपति, मोरगाँव

2.सिद्धिविनायक मंदिर, सिद्धटेक

3. बल्लालेश्वर गणपति मंदिर, पाली 

4. वरदविनायक मंदिर ,महड

5, चिंतामणि गणपति मंदिर ,थेउर

6. श्री गिरिजात्मज गणेश मंदिर, लेण्याद्री

7. विघ्नेश्वर मंदिर, ओझर

8. रांजणगाव श्री महागणपती

सिद्धिविनायक गणपति मंदिर, Mumbai (अष्टविनायकों से अलग होते हुए भी सिद्धिविनायक गणपति मंदिर, Mumbai महत्ता किसी सिद्ध-पीठ से कम नहीं।)

चिंचवड के मोरया गोसावी गणपति

सिद्धिविनायक मंदिर, सिद्धटेक




सिद्धटेक में भीमा नदी के तट पर बसा Siddhivinayak Temple – सिद्धिविनायक मंदिर अष्टविनायको में से एक है। अष्टविनायको में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, पारंपरिक रूप से जिस मूर्ति की सूंढ़ दाहिनी तरफ होती है, उसे सिद्धि-विनायक कहा जाता है।

धार्मिक महत्त्व:


भगवान गणेश के अष्टविनायक मंदिरों में प्रथम मंदिर मोरगांव के बाद सिद्धटेक का नंबर आता है। लेकिन श्रद्धालु अक्सर मोरगांव और थेउर के दर्शन कर बाद सिद्धिविनायक मंदिर के दर्शन करते है।

यहाँ पर बने भगवान गणेश की मूर्ति की सूंढ़ दाईं तरफ मुड़ी हुई है और इसी वजह से भगवान गणेश की इस मूर्ति को काफी शक्तिशाली माना जाता है, लेकिन भगवान गणेश की इस मूर्ति को खुश करना काफी मुश्किल है।

भगवान गणेश के अष्टविनायको में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहाँ भगवान गणेश के मूर्ति की सूंढ़ दाईं तरफ मुड़ी हुई है। पारंपरिक रूप से जिस मूर्ति की सूंढ़ दाहिनी तरफ होती है, उसे सिद्धि-विनायक कहा जाता है। इस मंदिर परिसर को जागृतक्षेत्र भी कहा जाता है, जहाँ के देवता को काफी शक्तिशाली माना जाता है।

मुद्गल पुराण में भी इस मंदिर का उल्लेख किया गया है। ब्रहमांड के रचयिता ब्रह्मा की उत्पत्ति कमल से हुई, जिसकी उत्पत्ति भगवान विष्णु की नाभि से हुई और भगवान विष्णु योगीन्द्र पर सो रहे थे।

इसके बाद जब ब्रह्मा ने ब्रह्माण्ड के निर्माण की शुरुवात की तब विष्णु के कानो के मैल से दो असुर मधु और किताभा की उत्पत्ति हुई।

इसके बाद दोनों असुरो ने ब्रह्मा की प्रक्रिया में बाधा डाली। इस घटना ने भगवान विष्णु को जागने पर मजबूर कर दिया। विष्णु ने भी युद्ध की शुरुवात कर दी, लेकिन वे उन्हें पराजित नही कर पा रहे थे। इसके बाद उन्होंने भगवान शिव से इसका कारण पूछा।

शिवजी ने विष्णु को बताया की शुभ कार्य से पहले पूजे जाने वाले शुरुवात के देवता – गणेश को वे आव्हान करना भूल गये और इसीलिए वे असुरो को पराजित नही कर पा रहे है।

इसके बाद भगवान विष्णु सिद्धटेक में ही तपस्या करने लगे और “ॐ श्री गणेशाय नमः” मंत्र का जाप कर उन्होंने भगवान गणेश को खुश कर दिया। मंत्रोच्चार से खुश होकर भगवान गणेश ने भी खुश होकर विष्णु को बहुत सी सिद्धियाँ प्रदान की और युद्ध में लौटकर असुरो का अंत किया। यहाँ विष्णु ने सिद्धियाँ हासिल की उसी जगह को आज सिद्धटेक के नाम से जाना जाता है।

इतिहास:


वास्तविक मंदिर का निर्माण विष्णु ने किया था, जबकि समय-समय पर इसे नष्ट भी किया गया था। कहा जाता है की बाद में चरवाहों ने सिद्धिविनायक मंदिर की खोज की थी। चरवाहे रोजाना मंदिर के मुख्य देवता की पूजा-अर्चना करते थे।

वर्तमान मंदिर का निर्माण 18 वी शताब्दी में इंदौर की दार्शनिक रानी अहिल्याबाई होलकर ने करवाया था और इसके साथ-साथ उन्होंने बहुत से हिन्दू मंदिरों की अवस्था में भी सुधार किया।

पेशवा शासको के अधिकारी सरदार हरिपंत फडके ने नगरखाने और मार्ग का निर्माण करवाया। मंदिर के बाहरी सभा मंडप का निर्माण बड़ोदा के जमींदार मिरल ने करवाया था। 1939 में टूटे हुए इस मंदिर का पुनर्निर्माण 1970 में किया गया।

फ़िलहाल यह मंदिर चिंचवड देवस्थान ट्रस्ट के शासन प्रबंध में है, जो मोरगांव और थेउर अष्टविनायक मंदिर पर भी नियंत्रण कर रहे है।

स्थान:


यह मंदिर महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के कर्जा तालुका के सिद्धटेक में भीमा नदी के तट पर स्थित है। मंदिर का सबसे करीबी स्टेशन दौंड (19 किलोमीटर) है।

यह मंदिर पुणे जिले के शिरपुर गाँव से भी जुड़ा हुआ है, जहाँ नदी के दक्षिणी तट पर हम जहाज की सहायता से भी जा सकते है। यहाँ पहुचने के लिए एक रास्ता है जो दौड़-कस्ती-पाडगांव, शिरूर-श्रीगोंडा-सिद्धटेक, कर्जत-रसहीन-सिद्धटेक से होकर गुजरता है, जो 48 किलोमीटर लंबा है।

यह मंदिर छोटी पहाड़ी पर बना हुआ जो और साथ ही चारो तरफ से बाबुल के पेड़ो से घिरा हुआ है और सिद्धटेक गाँव से 1 किलोमीटर दूर स्थित है।

देवता को संतुष्ट करने के लिए श्रद्धालु छोटी पहाड़ी की सांत प्रदक्षिणा लगाते थे। वहा कोई पक्की सड़क ना होने के बावजूद लोग भगवान को खुश करने के लिए पत्थरो से भरी कच्ची सड़को पर प्रदक्षिणा लगाते है।

उत्सव:


मंदिर में तीन मुख्य उत्सव मनाए जाते है। गणेश प्रकटोत्सव, जो गणेश चतुर्थी के समय मनाया जाता है। यह उत्सव हिन्दू माह भाद्रपद के पहले दिन से सांतवे दिन तक मनाया जाता है, जिनमें से चौथे दिन गणेश चतुर्थी आती है।

इस उत्सव पर मेले का भी आयोजन किया जाता है। इसके बाद भगवान गणेश के जन्मदिन को समर्पित माघोत्सव (गणेश जयंती) समाया जाता है, जो हिंदी माघ महीने के चौथे दिन मनाया जाता है।

इस उत्सव को महीने के पहले से आंठवे दिन तक मनाया जाता है। इस उत्सवो के समय भगवान गणेश की पालखी भी निकाली जाती है।

सोमवती अमावस्या और विजयादशमी के दिन यहाँ मेले का भी आयोजन किया जाता है।

अष्टविनायक मंत्र

List of Ashtavinayak Temples


1. मयूरेश्वर (मोरेश्वर) गणपति, मोरगाँव

2.सिद्धिविनायक मंदिर, सिद्धटेक

3. बल्लालेश्वर गणपति मंदिर, पाली 

4. वरदविनायक मंदिर ,महड

5, चिंतामणि गणपति मंदिर ,थेउर

6. श्री गिरिजात्मज गणेश मंदिर, लेण्याद्री

7. विघ्नेश्वर मंदिर, ओझर

8. रांजणगाव श्री महागणपती

सिद्धिविनायक गणपति मंदिर, Mumbai (अष्टविनायकों से अलग होते हुए भी सिद्धिविनायक गणपति मंदिर, Mumbai महत्ता किसी सिद्ध-पीठ से कम नहीं।)

चिंचवड के मोरया गोसावी गणपति

चिंतामणि मंदिर थेउर




Chintamani Ganpati Theur

थेउर का चिंतामणि मंदिर भगवान गणेश को समर्पित हिन्दू मंदिरों में से एक है। यह मंदिर पुणे से 25 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है। साथ ही भगवान गणेश के अष्टविनायको में सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है, भगवान गणेश के अष्टविनायक भारत के महाराष्ट्र राज्य में पुणे शहर के आस-पास स्थित है।

थेउर को गणपति संप्रदाय के लोगो का तीर्थस्थल माना जाता है और मंदिर की वर्तमान संरचना का निर्माण भी गणपति संप्रदाय संत मोर्य गोसावी और उनके वंशज धर्माधर ने करवाया था। लेकिन मंदिर के निर्माण की पुख्ता जानकारी किसी के पास उपलब्ध नही है।

अपने निवास स्थान चिंचवड और मोरगांव जाते समय मोर्य गोसावी अक्सर इस मंदिर के दर्शन के लिए आते थे। पूर्ण चन्द्रमा वाली रात के हर चौथे दिन मोर्य थेउर मंदिर के दर्शन के लिए आया करते थे।

कहानी के अनुसार, गुरु के आदेशो पर ही मोर्य ने थेउर में 42 दिनों का कड़ा उपवास कर तपस्या की थी। कहा जाता है की इस समय उनके शरीर का संबंध दिव्य रहस्योद्घाटन से हो चूका था।

माना जाता है की भगवान गणेश उनके सामने शेर के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने मोर्य को सिद्धि प्रदान की।

थेउर मंदिर के साथ-साथ पुणे के आस-पास के दुसरे गणपति मंदिरो को भी ब्राह्मण पेशवा शासको से 18 वी शताब्दी में शाही संरक्षण मिला है। जो पेशवा कुलदेवता के रूप में भगवान गणेश की पूजा करते थे, वाही मंदिरों के निर्माण के लिए आर्थिक सहायता और जमीन भी दान करते थे।

विशेषतः थेउर और मोरगांव के मंदिरों को ब्राह्मण पेशवाओ ने निखारा है। थेउर मंदिर पेशवा शासक माधवराव प्रथम का तो साहित्यिक चुम्बक हुआ करता था।

माधवराव ने मंदिर की अवस्था को सुधारा था और किसी भी युद्ध से पहले वे एक बार इस मंदिर के दर्शन अवश्य करते थे, ताकि उन्हें युद्ध में सफलता मिल सके।
माधवराव ने अंतिम दिन मंदिर की सीमओं पर ही व्यतीत किये थे। गंभीर बीमारी होने के बावजूद अपने अंतिम दिनों में माधवराव भगवान को खुश करने की कोशिश करने लगे। गणेशजी को खुश करने के लिए वे रोज दूध का अभिषेक करते थे।

पेशवा बाजीराव प्रथम के भाई और मिलिट्री कमांडर चिमाजी अप्पा ने मंदिर को एक विशाल यूरोपियन घंटी भेट स्वरुप दी थी।

मंदिर के त्यौहार:


मंदिर में तीन मुख्य उत्सव मनाए जाते है। गणेश प्रकटोत्सव, जो गणेश चतुर्थी के समय मनाया जाता है। यह उत्सव हिन्दू माह भाद्रपद के पहले दिन से सांतवे दिन तक मनाया जाता है, जिनमें से चौथे दिन गणेश चतुर्थी आती है।

इस उत्सव पर मेले का भी आयोजन किया जाता है। इसके बाद भगवान गणेश के जन्मदिन को समर्पित माघोत्सव (गणेश जयंती) समाया जाता है, जो हिंदी माघ महीने के चौथे दिन मनाया जाता है।

इस उत्सव को महीने के पहले से आंठवे दिन तक मनाया जाता है। इस उत्सव पर पर मेले का आयोजन किया जाता है।

इसके बाद मंदिर के प्रसिद्ध संरक्षक माधवराव और उनकी पत्नी रमाबाई को समर्पित कार्तिक महीने में रमा-माधव पुण्योत्सव मनाया जाता है। इन उत्सवो का लाभ लाखो श्रद्धालु लेते है।

अष्टविनायक मंत्र

List of Ashtavinayak Temples


1. मयूरेश्वर (मोरेश्वर) गणपति, मोरगाँव

2.सिद्धिविनायक मंदिर, सिद्धटेक

3. बल्लालेश्वर गणपति मंदिर, पाली 

4. वरदविनायक मंदिर ,महड

5, चिंतामणि गणपति मंदिर ,थेउर

6. श्री गिरिजात्मज गणेश मंदिर, लेण्याद्री

7. विघ्नेश्वर मंदिर, ओझर

8. रांजणगाव श्री महागणपती

सिद्धिविनायक गणपति मंदिर, Mumbai (अष्टविनायकों से अलग होते हुए भी सिद्धिविनायक गणपति मंदिर, Mumbai महत्ता किसी सिद्ध-पीठ से कम नहीं।)

चिंचवड के मोरया गोसावी गणपति

वरदविनायक मंदिर महड



Varad Vinayak Mahad Ganpati

वरदविनायक मंदिर हिन्दू दैवत गणेश के अष्टविनायको में से एक है। यह मंदिर भारत में महाराष्ट्र राज्य के रायगढ़ जिले के कर्जत और खोपोली के पास खालापुर तालुका के महड गाँव में स्थित है। इस मंदिर में स्थापित भगवान गणेश की मूर्ति को स्वयंभू कहा जाता है।

कहा जाता है की इस वरदविनायक मंदिर का निर्माण 1725 में सूबेदार रामजी महादेव बिवलकर ने करवाया था। मंदिर का परिसर सुंदर तालाब के एक तरफ बना हुआ है। 1892 से महड वरदविनायक मंदिर का लैंप लगातार जल रहा है।

पूर्वी मुख में बना यह अष्टविनायक मंदिर काफी प्रसिद्ध है और यहाँ पर हमें रिद्धि और सिद्धि की मूर्तियाँ भी देखने मिलती है।

मंदिर के चारो तरह हांथी की प्रतिमाओ को उकेरा गया है। मंदिर का डोम भीस्वर्ण शिखर के साथ 25 फीट ऊँचा है। मंदिर के उत्तरी भाग पर गौमुख देखने मिलता है, जो पवित्र नदी के बहाव के साथ बहता है। मंदिर के पश्चिमी भाग में एक पवित्र तालाब बना हुआ है।

इस मंदिर में मुशिका, नवग्रह देवता और शिवलिंग की भी मूर्तियाँ है।

इस अष्टविनायक मंदिर में श्रद्धालु गर्भगृह में भी आ सकते है और वहा वे शांति से भगवान को श्रद्धा अर्पण करते है और उनकी भक्ति में तल्लीन हो जाते है।

साल भर हजारो श्रद्धालु वरदविनायक मंदिर में भगवान के दर्शन के लिए आते है। माघ चतुर्थी जैसे पर्वो के दिन मंदिर में लाखो लोग हमें दिखाई देते है।

मंदिर से जुड़ी कहानी


पौराणिक कथाआें के अनुसार प्राचीन काल में एक संतानहीन राजा था। अपने दुख के निवारण के लिए वो ऋषि विश्वामित्र की शरण में गया आैर सलाह मांगी। ऋषि ने उसे श्री गणेश के एकाक्षरी मंत्र का जाप करने के लिए कहा। राजा ने एेसा ही किया आैर भक्ति भाव गजानन की पूजा करते हुए उनके मंत्र का जाप किया। मंत्र के प्रभाव आैर गणपति के आर्शिवाद से उसका रुक्मांगद नाम का सुंदर पुत्र हुआ जो अत्यंत धर्मनिष्ठ भी था। युवा होने पर एक बार शिकार के दौरान जंगल में घूमते हुए रुक्मांगद, ऋषि वाचक्नवी के आश्रम में पहुंचा। यहां ऋषि की पत्नी मुकुंदा राजकुमार के पुरुषोचित सौंदर्य को देख कर उस पर मोहित हो गर्इ आैर उससे प्रणय याचना की। धर्म के मार्ग पर चलने वाले रुक्मांगद ने इसे अस्वीकार कर दिया आैर तुरंत आश्रम से चला गया। दूसरी आेर ऋषि पत्नी उसके प्रेम में पागल जैसी हो गर्इ। उसकी अवस्था के बारे में जान कर देवराज इंद्र ने इसका लाभ उठाने के लिए रुक्मांगद का भेष धारण कर मुकुंदा से प्रेम संबंध बनाये, जिससे वो गर्भवती हो गर्इ। कुछ समय बाद उसने ग्रिसमाद नामक पुत्र को जन्म दिया। युवा होने पर अपने जन्म की कहानी जान कर इस पुत्र ने मुकुंदा को श्राप दिया कि वो कांटेदार जंगली बेर की झाड़ी बन जाये। इस पर मुकुंदा ने भी अपने बेटे को श्राप दिया कि वो एक क्रूर राक्षस का पिता बनेगा। उसी समय एक आकाशवाणी से पता चला कि मुंकुदा की संतान का पिता वास्तव में इंद्र है। दोनों माता आैर पुत्र अत्यंत लज्जित हुए आैर मुकुंदा एक कांटेदार झाड़ी में बदल गर्इ जबकि उसका पुत्र पुष्पक वन में जाकर श्री गणेश की तपस्या करने लगा। बाद में प्रसन्न हो गणेश जी ने उसे त्रिलोकविजयी संतान का पिता बनने आैर एक वर मांगने का आर्शिवाद दिया। तब ग्रिसमाद ने कहा कि वे स्वयं यहां विराजमान हों आैर प्रत्येक भक्त की मनोकामना पूर्ण करें। इसके बाद उसने भद्रका नाम से प्रसिद्घ स्थान पर मंदिर का निर्माण किया आैर श्री गणेश यहां वरदविनायक के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

अष्टविनायक मंत्र

List of Ashtavinayak Temples


1. मयूरेश्वर (मोरेश्वर) गणपति, मोरगाँव

2.सिद्धिविनायक मंदिर, सिद्धटेक

3. बल्लालेश्वर गणपति मंदिर, पाली 

4. वरदविनायक मंदिर ,महड

5, चिंतामणि गणपति मंदिर ,थेउर

6. श्री गिरिजात्मज गणेश मंदिर, लेण्याद्री

7. विघ्नेश्वर मंदिर, ओझर

8. रांजणगाव श्री महागणपती

सिद्धिविनायक गणपति मंदिर, Mumbai (अष्टविनायकों से अलग होते हुए भी सिद्धिविनायक गणपति मंदिर, Mumbai महत्ता किसी सिद्ध-पीठ से कम नहीं।)

चिंचवड के मोरया गोसावी गणपति

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