सोमवार, 14 अक्तूबर 2019

लिथियम ऑयन बैटरी


 


लिथियम ऑयन बैटरी


आज हर हाथ में मोबाइल फोन है और यह फोन आपके हर काम को करने में सक्षम है। आज फोन शानदार कैमरा, ताकतवर प्रोसेसर, बड़ी स्क्रीन, ज्यादा रैम और बड़ी मैमोरी से लैस है। जो आपके हर काम को निबटाने में सक्षम हैं। परंतु यह सभी हार्डवेयर तभी काम कर पाएंगे जब तक की फोन की बैटरी चल रही है। ठेठ शब्दों में कहा जाए तो हार्डवेयर में जान बैटरी की वजह से ही आती है। जानें लिथियम ऑयन बैटरी के बारे में सबकुछ, कैसे बना और किसने बनाई पहली बैटरी

बैटरी पावर


बिजली उत्पादन के कई श्रोतों में से एक बैटरी है। आपके घर में सरकार द्वारा जो बिजली पहुंचाई जाती है उसे ‘एसी’ अर्थात अल्टरनेटिंग करेंट कहते हैं। जबकि बैटरी के माध्यम से डायरेक्ट करेंट ‘डीसी’ का प्रवाह होता है। एसी में उच्च वोल्टेज बीजली सप्लाई मिलती है और यह चक्रनुमा प्रवाह में चलता है। उपर उठता है फिर नीचे गिरता है, फिर उठता है फिर गिरता है। इसी तरह यह चक्र चलता रहता है। वहीं डीसी का उपयोग साधरणतः कम वोल्टेज क्षमता के लिए किया जाता है। इसमें बीजली एक समान प्रवाह में चलती रहती है।

बैटरी तकनीक


बैटरी कई तकनीक और स्वरूप हैं। हर उपकरण के लिए आज एक अलग प्रकार की बैटरी का उपयोग किया जाता है। छोटे डिवायस के लिए छोटी बैटरी जिसका उपयोग टाॅर्च, चार्जर कैमरा और रेडियो सहित कई चीजों के लिए किया जाता है। वहीं बड़े उपकरणों के लिए बड़ी बैटरी होती है। जैसे गाड़ी, और इनवर्टर इत्यदि।

[ads1]

हैंड वॉच और छोटे खिलौनो में भी एक विषेश प्रकार की बैटरी का उपयोग होता है। छोटे से बटम आकार में पेश की गईं ये बैटरियां बहुत ही कम वोल्टेज की होती हैं। यदि हैंड वॉच और छोटे खिलौनो को छोड़ दें तो कुछ वर्ष पहले दो प्रकार की बैटरी का उपयोग होती थी। एक सुखा सेल और दूसरा गीला सेल। दोनों सेल में अम्ल से ही बीजली का उत्पादन होता है लेकिन सुखा सेल उपयोग खत्म होने के बाद कोई काम का नहीं होता है। जबकि पानी सेल को पुनः निर्माण में उपयोग किया जाता है। जहां तक बात मोबाइल है तो इन सब से हटकर एक विशेष तकनीक की बैटरी का उपयोग होता है। मोबाइल और कुछ कैमरों में लीथीयम बैटरी का उपयोग किया जाता है।

बैटरी से पहली रोशनी


बैटरी निर्माण का पहला श्रेय जाता है इटली के भैतिकविद अलेसांड्रो वोल्टा का। वर्ष 1792 में उन्होंने पहली बार इलेक्ट्रोकेमिकल सेल को पेश किया और 1800 ईसवी में उन्होंने पहली बैटरी का निर्माण भी किया। इसी वर्ष उन्होंने 50 वोल्ट के बैटरी पेश कि जिसमें इलेक्ट्रोकैमिकल को सीरीज में पेश किया गया था जिसे पाइल नाम दिया गया था। परंतु ये बैटरी बहुत दिनो तक बीजली उत्पादन में सक्षम नहीं थी।

वर्ष 1836 में जाॅन एफडेनियल ने डेनियल सेल का विकास किया। जिसमें बीजली उत्पादन के लिए जिंक सल्पफेट और काॅपर सेल्पफेट का उपयोग किया गया था। कम वोल्ट में यह बैटरी बहुत दिनों तक चलता था। 1860 में इसके उन्नत संस्करण को पेश किया गया जिसका उपयोग टेलीफोनी के लिए किया गया। 1859 में प्रफांस के वैज्ञानिक गास्टोन प्लानटे ने रिचार्जेबल बैटरी पेश की। 1866 लेकलांनचे कार्बन ने पहली बार सूखा सेल का प्रदर्शन किया और 1881 में कार्ल गसनेर ने व्यवसायीक तौर पर सूखा सेल को पेश कर दिया। 1901 में थाॅमस एल्वा एडिशन ने क्षारविशिष्ट आधारित बैटरी पर प्रयोग शुरू किया। इसके बाद बैटरी तकनीक में नित नए विकास होते रहे।

जहां तक लीथीयम बैटरी की बात है तो यह बहुत दिनों के बाद प्रयोग में आया। इसे आधुनिक बैटरी भी कहा जाता है। लीथीयम बैटरी पर पहली कोशिश एमएस विटिंघम द्वारा देखने को मिली। वर्ष 1970 में उन्होंने बीजली उत्पान के लिए टाइटेनियम सल्पफाइड और लिथियम मैटल का उपयोग किया था। यह पहला सफल प्रयोग कहा जा सकता है। हालांकि इसके बाद पूर्ण तरीके से बैटरी बनने में काफी समय लगा। 1980 में आॅक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के जॉन गूडेनफ और कोईची मिजुशीमा ने रिचार्जेबल ​लीथीयम बैटरी को दिखाया। जॉन गूडेनफ को लीथीयम बैटरी का फादर भी कहा जाता है। इस प्रयोग के बाद काफी प्रगति देखने को मिली। बीजली उत्पादन के लिए लीथीयम का उपयोग कई अन्य रसायन के साथ भी किया गया और अन्नतः 1991 में सोनी और असाही कासई द्वारा पहली लिथियम बैटरी को पेश किया गया। वहीं 1997 पहली बार लिथियम पाॅलिमर बैटरी पेश किए गए। मोबाइल में लिथियम आॅयन और लिथियम पाॅलिमर बैटरी का ही उपयोग होता है।

लिथियम आयन बैटरी


लिथियम आॅयन बैटरी रिचार्जेबल बैटरी श्रृंखला का ही एक कड़ी है। इसमें मुख्सयतः तिन तत्वों का संयोग हेाता है। नेगेटिव इलेक्ट्राॅड, पोजेटिव इलेक्ट्राॅड और इलेक्ट्राॅलाइट। बैटरी में कार्बन नेगेटिव इलेक्ट्राॅड के लिए उपयोग होता है। जबकि आॅक्साइड का उपयोग पोजेटिव इलेक्ट्राॅड के लिए किया जाता है। वहीं लिथियम साॅल्ड इलेक्ट्रोलाइट के लिए होता है। लिथियम बैटरी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वोल्टेज की जरूरत के अनुसार इसके संयोग को बढ़ा और घटा सकते हैं। वहीं इसे एक छोटे से पैकेट में भी बना सकते हैं। यही वजह है कि मोबाइल, लैपटाॅप बौर टैबलेट जैसे इलेक्ट्राॅनिंक्स डिवायस में ध्ड़ल्ले से इसका प्रयोग हो रहा है। बोल चाल की भाषा में इसे ली-आॅन बैटरी कहा जाता है।

लिथियम पाॅलिमर बैटरी


लिथियम पाॅलिमर बैटरी में लिथियम आॅयन के समान तकनीक का ही उपयोग होता है। इसमें लिथियम के साथ ठोस पाॅलिथिन आॅक्साइड या पाॅलिएक्राॅनलियोनिट्रील का उपयोग किया जाता है। लिआॅन बैटरी के समान यह भी छोटे से पैकेज में बनाया जा सकता है और उपयोग में आसान भी होता है। साधरणतः बोल चाल में इसे ली-पो बैटरी नाम से जाना जाता है।

एमएएच


बैटरी लिथियम आयान हो या लिथियम पाॅलिमर। परंतु दोनों तकनीक में एमएएच की प्रयोग जरूर होता है। वास्तव में एमएएच इसके ताकत मापने का पैमाना है। बैटरी चार्ज को एंपियर आवर के माध्यम से मापा जाता है और छोटे डिवायस में चार्ज के लिए मिलि एंपियर आवर को पैमाना बनाया जाता है। एमएएच का आशय होता है- मिलि एंपियर आवर Milliamps Hour। 1मिलिएंपियर आवर एक एंपियर आवर का एक हजारवां भाग है। अर्थात 1एंपियर आवर = 1000 मिलिएंपियर। इस तरह एक बैटरी जितना ज्यादा एमएएच का होगा वह उतना ज्यादा बैटरी बैकअप देने में सक्षम होगा।

पावर बैंक


what is lithium ion battery and battery history
आज स्मार्टफोन के दौर में पावर बैंक का उपयोग काफी बढ़ गया है। इनमें भी ली—आॅन बैटरी का ही प्रयोग होता है लेकिन इन्हें इस तरह से डिजाइन किया गया होता है कि यह आपके फोन को चार्ज कर सकें। इन चार्जर को कंप्यूटर या लैपटाॅप के यूएसबी के माध्यम से चार्ज किया जा सकता है। साधारण बोल चाल की भाषा में इन्हें पावर बैंक कहा जाता है।व

बैटरी सम्बंधी कुछ सावधनियां


charging problems 12 way to fix it
मोबाइल में बैटरी न हो तो कुछ काम ही नहीं हो सकता लेकिन यदि बैटरी का उपयोग सही तरीके से न हो तो आपको आर्थिक या शारीरिक नुकसान दे सकता है। इसलिए जरूरी है कि मोबाइल का उपयोग सुरक्षित तरीके से हो। ये सावधनियां निम्न हैं-

1. मोबाइल को चार्ज करते समय काॅल न करें।
2. चार्जिंग के दौरान यदि बैटरी गर्म हो तो जल्द से जल्द चार्जिंग निकाल दें और सर्विस सेंटर से संपर्क करें।
3. यदि फोन की बैटरी फूल गई हो तो उसे तुरंत निकाल दें।
4. नए फोन की खरीदारी पर उसकी बैटरी को बगैर पूरी तरह से चार्ज हुए न निकालें।
5. ज्यादातर कोशिश करें की पूरी तरह बैटरी खत्म होने पर ही चार्जिंग में लगाएं।

लिथियम ऑयन बैटरी

लिथियम आयन बैटरी के बारे में


ये रिचार्ज करने योग्य बैटरियाँ हैं, जिनका ऊर्जा घनत्व उच्च होता है और इनका उपयोग सामान्यतः उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स में किया जाता है.
इनमें इलेक्ट्रोड के रूप में धात्विक लिथियम के स्थान पर इंटरकैलेटेड (क्रिस्टल जालक की विभिन्न परतों के मध्य व्यवस्थित) लिथियम यौगिक का उपयोग किया जाता है और बैटरी के प्रति किलोग्राम में 150 वाट-घंटे विद्युत् भंडारण करने की क्षमता होती है.
लेड एसिड बैटरी को उसके सम्पूर्ण जीवन काल में केवल 400-500 बार चार्ज किया जा सकता है जबकि लिथियम-आयन बैटरी को उसके सम्पूर्ण जीवनकाल में 5000 या उससे अधिक बार चार्ज किया जा सकता है.

[ads1]

ग्राफीन आधारित सुपरकैपेसिटर के बारे में


CR123A Primary Lithium Battery. 16-year-OEM-manufacturer Primary Lithium Battery.
यह अपशिष्ट/परित्यक्त लिथियम आयन बैटरी द्वारा उत्पादित किया जा रहा है.
लिथियम आयन बैटरी से प्राप्त ग्रफीन ऑक्साइड ने कम विद्युत् धारा पर उच्च विशिष्ट धारिता प्रदर्शित की और यह एक नवीन ऊर्जा भंडारण प्रणाली है जो उच्च ऊर्जा एवं विद्युत् घनत्व को संयोजित करती है.
इस प्रक्रिया में ऑक्सीकरण द्वारा ग्रेफाइट का ग्राफीन ऑक्साइड में रूपांतरण और बाद में अपशल्कन होता है, जिससे यह अपचयित ग्रफीन ऑक्साइड में परिवर्तित किया जाता है.
विंड टरबाइन पिच कंट्रोल, रेल, ऑटोमोबाइल, भारी उद्योग, दूरसंचार प्रणाली और मेमोरी बैकअप में सुपरकैपेसिटर का अत्यधिक उपयोग किया जा रहा है.

लिथियम आयन बैटरी का महत्त्व


ऊर्जा भंडारण प्र्लाली में अनुप्रयोग – इसमें श्रवण सहायक उपकरणों से लेकर कंटेनर आकार की बैटरी द्वारा गाँवों के संकुलों तक विद्युत् वितरण, इलेक्ट्रिक वाहन (2 व्हीलर, 3 व्हीलर, 4 व्हीलर और बस), प्रसंस्करण उद्योग में पावरिंग रोबोट आदि शामिल हैं. लिथियम-आयन बैटरी भौतिक तारों की आवश्यकता के बिना अर्थात् वायरलेस माध्यम से किसी भी विद्युत् अनुप्रयोग को ऊर्जा प्रदान कर सकती है.
इनमें व्यापक पैमाने पर उत्पादन के लिए उचित आपूर्ति शृंखला और विनिर्माण तकनीक के साथ लागत में कमी करने की क्षमता है.
लिथियम आयन बैटरी से सम्बंधित प्रौद्योगिकी नेशनल इलेक्ट्रिक मोबिलिटी मिशन, मेक इन इंडिया और ऊर्जा सृजन के माध्यम से ऊर्जा विकल्पों में स्वच्छ ऊर्जा के अंश को बढ़ाने में सहायता कर सकती है.

Instagram क्या है और कैसे चलाते है

रविवार, 13 अक्तूबर 2019

Instagram क्या है और कैसे चलाते है



Instagram क्या है What is meaning of instagram


इंस्टाग्राम का मतलब क्या होता है दरअसल Instagram को दो शब्दों से जोड़कर बनाया गया है instant+camera=instagram जिसे आप Photo share करना कह सकते हैं instagram को Kevin Systrom और Mike Krieger ने बनाया है


जिसे सबसे पहले 2010 October में iOS operating system यानी apple के लिए लॉन्च किया गया था। फिर इसके दो साल बाद Instagram को android mobile के लिए लॉन्च किया गया था। यह app 33 भाषाओं में उपलब्ध है।



Instagram क्या है Instagram kya hai-what is instagram


Instagram भी Social networking website के Category में ही आता है जैसे Facebook, Twitter ,YouTube आदि हर सोशल नेटवर्क साइट का काम करने का तरीका अलग होता है जैसे YouTube पर हम Video share कर सकते हैं उसी प्रकार इंस्टाग्राम पर भी हम Photo share कर सकते हैं साथ ही इस पर हम 1-2 minutes का video भी share कर सकते है।


Instagram पर किसी के साथ जुड़ने के लिए उसको Follow करना पड़ता है उसके लिए Follow button दिया जाता है और इसको आप अपनी मर्जी अनुसार इसकी setting कर सकते हैं जिसमें आपको कौन फॉलो कर सकता है और कौन नहीं उसकी Privacy private या फिर public कर सकते हैं


Instagram पर भी आप Facebook की तरह अपने friend के साथ Connect हो सकते है और chating कर सकते है परंतु इसमें Facebook की तरह Live video chatting नहीं कर सकते यह दुनिया की सबसे Popular Photo Sharing Website है जिसकी लोकप्रियता दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है



instagram par account kaise banaye


दोस्तों Instagram पर account बनाना बहुत आसान है इसके लिए आपको Google Play Store में जाकर Installs करना पड़ता है इस app को अब तक 1 billions लोगों द्वारा download किया जा चूका है जिसको 4.5 की star rate दी गई है इसके लिए आपको एक फोन नंबर या फिर एक ईमेल ID की आवश्यकता पड़ती है जिस पर one time password (OTP) आता है


instagram app Installs होने के बाद आपको इसमें Simple login करना है उसके लिए आपको एक फोन नंबर या Gmail Account से इसमें लॉगिन करना होता है और उसके बाद एक Unique user name डालकर आपका Instagram account create हो जाता है जैसे ही आपका अकाउंट क्रिएट हो जाता है तो कुछ इस तरह की स्क्रीन खुल जाती है



Instagram क्या है instagram ka use kaise kare


जैसी ही आप instagram में enter करते हैं तो आपको कुछ इस तरह की scree दिखाई देती है इसमें मुख्य रूप से 5 option दिए होते है चलिये जानते है इनके बारे में



1. Home


यहां पर सबसे ऊपर आपकी Profiles की photo के साथ उन लोगों की Profiles दिखाई देती है जिनको आप फॉलो करते हैं साथ ही जो लोग कोई नया फोटो या वीडियो अपलोड करते हैं तो उनका फोटो और वीडियो यहां अपने आप आ जाता है जिस पर आप लाइक कमेंट कर सकते हैं



2. Search


सर्च बटन पर क्लिक करते ही आपको उन लोगों की फोटो और वीडियो दिखाई देती है जो काफी पॉपुलर और सबसे ज्यादा देखी जाने वाली वीडियो होती है



3. +icon


अगर आप कोई video या photo share करना चाहते हैं तो आप Plus icon पर क्लिक करके अपनी Gallery से कोई भी फोटो या वीडियो selsect करके उसे share कर सकते हैं



4. Heart icon


जैसा की आपको ऊपर फोटो में दिखाया गया है जब आप Heart icon पर क्लिक करते हैं तो आपको उन लोगों की लिस्ट दिखाई देती है जो आपको फॉलो करते हैं तथा उनके द्वारा जो activity की जाती है वह दिखाई देती है



5. Profile


नंबर 5 Icon profile का दिया गया है जिस पर क्लिक करके आप अपनी Profiles की information डाल सकते हैं और यहां पर आपको जो लोग follow करते हैं और जिन लोगों को आप follow करते हैं उनकी संख्या देख सकते हैं साथ ही आप कितने फ़ोटो और वीडियो डाल चुके है यह भी दिखाई देता है

शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2019

दीपावली


दीपावली का महत्व दीपावली या दीवाली अर्थात "रोशनी का त्योहार" शरद ऋतु (उत्तरी गोलार्द्ध) में हर वर्ष मनाया जाने वाला एक प्राचीन हिंदू त्योहार है।दीवाली भारत के सबसे बड़े और प्रतिभाशाली त्योहारों में से एक है। यह त्योहार आध्यात्मिक रूप से अंधकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाता है।


भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी त्यौहारों में दीपावली का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात् ‘अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर जाइए’ यह उपनिषदों की आज्ञा है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। जैन धर्म के लोग इसे महावीर के मोक्ष दिवस के रूप में मनाते हैं


माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा राम अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे।अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से प्रफुल्लित हो उठा था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाए। कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं। यह पर्व अधिकतर ग्रिगेरियन कैलन्डर के अनुसार अक्टूबर या नवंबर महीने में पड़ता है। दीपावली दीपों का त्योहार है। भारतीयों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। दीवाली यही चरितार्थ करती है- असतो माऽ सद्गमय, तमसो माऽ ज्योतिर्गमय। दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती हैं। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन, सफ़ेदी आदि का कार्य होने लगता है। लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा कर सजाते हैं। बाज़ारों में गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पहले ही घर-मोहल्ले, बाज़ार सब साफ-सुथरे व सजे-धजे नज़र आते हैं।



शब्द उत्पत्ति


दीपावली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों 'दीप' अर्थात 'दिया' व 'आवली' अर्थात 'लाइन' या 'श्रृंखला' के मिश्रण से हुई है। इसके उत्सव में घरों के द्वारों, घरों व मंदिरों पर लाखों प्रकाशकों को प्रज्वलित किया जाता है। दीपावली जिसे दिवाली भी कहते हैं उसे अन्य भाषाओं में अलग-अलग नामों से पुकार जाता है



आध्यात्मिक महत्त्व


सब बुराई पर अच्छाई, अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और निराशा पर आशा की विजय के दर्शाते हैं।



परंपरा


अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। यह पर्व सामूहिक व व्यक्तिगत दोनों तरह से मनाए जाने वाला ऐसा विशिष्ट पर्व है जो धार्मिक, सांस्कृतिक व सामाजिक विशिष्टता रखता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दीवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है। लोग अपने घरों का कोना-कोना साफ़ करते हैं, नये कपड़े पहनते हैं। मिठाइयों के उपहार एक दूसरे को बाँटते हैं, एक दूसरे से मिलते हैं। घर-घर में सुन्दर रंगोली बनायी जाती है, दिये जलाए जाते हैं और आतिशबाजी की जाती है। बड़े छोटे सभी इस त्योहार में भाग लेते हैं। अंधकार पर प्रकाश की विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाई-चारे व प्रेम का संदेश फैलाता है। हर प्रांत या क्षेत्र में दीवाली मनाने के कारण एवं तरीके अलग हैं पर सभी जगह कई पीढ़ियों से यह त्योहार चला आ रहा है। लोगों में दीवाली की बहुत उमंग होती है।



दिवाली पर निबंध


दीपावली का त्योहार पांच दिनों तक चलने वाला सबसे बड़ा पर्व होता है। दशहरे के बाद से ही घरों में दीपावली की तैयारियां शुरू हो जाती है, जो व्यापक स्तर पर की जाती है। इस दिन भगवान श्रीराम, माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण कर अयोध्या लौटे थे। इसके अलावा दीपावली को लेकर कुछ और भी पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।



दीपावली कब-क्यों मनाई जाती है -


यह त्योहार कार्तिक माह की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। अमावस्या की अंधेरी रात जगमग असंख्य दीपों से जगमगाने लगती है। कहते हैं भगवान राम 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे, इस खुशी में अयोध्यावासियों ने दीये जलाकर उनका स्वागत किया था।


श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध भी इसी दिन किया था। यह दिन भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी है। इन सभी कारणों से हम दीपावली का त्योहार मनाते हैं।



दीपोत्सव मनाने की तैयारियां - दीपावली का महत्व


यह त्योहार लगभग सभी धर्म के लोग मनाते हैं। इस त्योहार के आने के कई दिन पहले से ही घरों की लिपाई-पुताई, सजावट प्रारंभ हो जाती है।
नए कपड़े बनवाए जाते हैं, मिठाइयां बनाई जाती हैं। वर्षा के बाद की गंदगी भव्य आकर्षण, सफाई और स्वच्‍छता में बदल जाती है। लक्ष्मी जी के आगमन में चमक-दमक की जाती है।



उत्सव -


यह त्योहार पांच दिनों तक मनाया जाता है। धनतेरस से भाई दूज तक यह त्योहार चलता है। धनतेरस के दिन व्यापार अपने बहीखाते नए बनाते हैं। अगले दिन नरक चौदस के दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान करना अच्‍छा माना जाता है। अमावस्या के दिन लक्ष्मीजी की पूजा की जाती है।


खील-बताशे का प्रसाद चढ़ाया जाता है। नए कपड़े पहने जाते हैं। फुलझड़ी, पटाखे छोड़े जाते हैं। असंख्य दीपों की रंग-बिरंगी रोशनियां मन को मोह लेती हैं। दुकानों, बाजारों और घरों की सजावट दर्शनीय रहती है।


अगला दिन परस्पर भेंट का दिन होता है। एक-दूसरे के गले लगकर दीपावली की शुभकामनाएं दी जाती हैं। गृहिणियां मेहमानों का स्वागत करती हैं। लोग छोटे-बड़े, अमीर-गरीब का भेद भूलकर आपस में मिल-जुलकर यह त्योहार मनाते हैं।



उपसंहार -


दीपावली का त्योहार सभी के जीवन को खुशी प्रदान करता है। नया जीवन जीने का उत्साह प्रदान करता है। कुछ लोग इस दिन जुआ खेलते हैं, जो घर व समाज के लिए बड़ी बुरी बात है।


हमें इस बुराई से बचना चाहिए। पटाखे सावधानीपूर्वक छोड़ने चाहिए। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हमारे किसी भी कार्य एवं व्यवहार से किसी को भी दुख न पहुंचे, तभी दीपावली का त्योहार मनाना सार्थक होगा।



दीपावली पर्व के पीछे कथा (Story of Deepawali in Hindi) दीपावली का महत्व


अपने प्रिय राजा श्री राम के वनवास समाप्त होने की खुशी में अयोध्यावासियों ने कार्तिक अमावस्या की रात्रि में घी के दिए जलाकर उत्सव मनाया था। तभी से हर वर्ष दीपावली का पर्व मनाया जाता है। इस त्यौहार का वर्णन विष्णु पुराण के साथ-साथ अन्य कई पुराणों में किया गया है।



दीपावली पर लक्ष्मी पूजा (Deepawali Pooja Vidhi Hindi)


अधिकांश घरों में दीपावली के दिन लक्ष्मी-गणेश जी की पूजा (Laxmi Puja on Diwali) की जाती है। हिन्दू मान्यतानुसार अमावस्या की रात्रि में लक्ष्मी जी धरती पर भ्रमण करती हैं और लोगों को वैभव का आशीष देती है। दीपावली के दिन गणेश जी की पूजा का यूं तो कोई उल्लेख नहीं परंतु उनकी पूजा के बिना हर पूजा अधूरी मानी जाती है। इसलिए लक्ष्मी जी के साथ विघ्नहर्ता श्री गणेश जी की भी पूजा की जाती है।



दीपदान (Deepdan in Hindi)


दीपावली के दिन दीपदान का विशेष महत्त्व होता है। नारदपुराण के अनुसार इस दिन मंदिर, घर, नदी, बगीचा, वृक्ष, गौशाला तथा बाजार में दीपदान देना शुभ माना जाता है।
मान्यता है कि इस दिन यदि कोई श्रद्धापूर्वक मां लक्ष्मी की पूजा करता है तो, उसके घर में कभी भी दरिद्रता का वास नहीं होता। इस दिन गायों के सींग आदि को रंगकर उन्हें घास और अन्न देकर प्रदक्षिणा की जाती है।



दिवाली पर वाक्य दीपावली का महत्व


few Lines on Diwali in Hindi –दिवाली पर वाक्य


1. भारत में अनेकों त्यौहार मनाए जाते हैं उन्ही में एक सबसे  ज्यादा मनाया जाने वाला त्यौहार है दिवाली |


2. दिवाली दीपों का त्योहार है बुराई पर अच्छाई की जीत का त्यौहार है|


3. भगवान श्री राम ने रावण का वध कर बुराई पर अच्छाई की जीत का निशान छोड़ा था|


4. 14 साल के वनवास को काट कर राम जी अपने राज्य अयोध्या वापस आए थे और अपनी गद्दी को संभाला था|


5. रामजी के लौटने की ख़ुशी में अयोध्यावासियों ने ख़ुशी ख़ुशी घी के दीयों से पूरी अयोध्या नगरी को रोशन कर दिया था।


6. दिवाली का त्यौहार खुशियों का त्यौहार होता है इस दिन सभी हिंदू धर्म के व्यक्ति दिवाली के त्योहार को मनाने के लिए अपने रिश्तेदारों मित्रों आदि में खुशियां बांटते हैं|


7. दिवाली के दिन दीप जलाए जाते हैं दिवाली का त्यौहार कार्तिक मास में आता है|


8. दिवाली का त्यौहार अमावस्या की रात को मनाया जाता है अमावस्या की अंधेरी रात को खत्म करने के लिए दिये जलाना शुभ माना जाता है|


9. दिवाली से पहले धनतेरस और धनतेरस के बाद छोटी दिवाली आती है छोटी दिवाली के बाद गोवर्धन की पूजा होती है और उसके अगले दिन भैया दूज आता है|


10. दीवाली की रात को लोग माता लक्ष्मी भगवान गणेश की पूजा कर उनसे धन की कामना करते हैं|


11. मिठाई की दुकाने सजने लगती हैं बाज़ारों में पटाखों और फुलझड़ियों की दुकाने सजती हुई दिखाई देती हैं|


12. धन की देवी लक्ष्मी माता का और बुद्धि ज्ञान के देवता श्री गणेश जी की पूजा की जाती है और उन से वरदान मांगा जाता है कि उनका साथ कभी ना छूटे उनका आशीर्वाद हमारे साथ बना रहे|


13. दिवाली के अगले दिन गोवर्धन की पूजा की जाती है और उसके अगले दिन भैया दूज आता है| यह पांचो त्यौहार का एक समूह होता है|



दीवाली की प्रार्थनाएं दीपावली का महत्व


असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
अनुवाद:[72][73]


असत्य से सत्य की ओर।
अंधकार से प्रकाश की ओर।
मृत्यु से अमरता की ओर।(हमें ले जाओ)
ॐ शांति शांति शांति।।

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2019

लाल महल का इतिहास





लाल महल का इतिहास


लाल महल का अर्थ होता है रेड पैलेस। छत्रपति शिवाजी महाराज के पिता शहाजीराजे भोसले ने ये ऐतिहासिक स्मारक पुणे में बनवाया था। लाल महल का महाराष्ट्र और मराठा साम्राज्य के इतिहास में ऐतिहासिक महत्त्व है।


The Lal Mahal of Pune is one of the most famous monuments located in Pune, India. In the year 1630 AD, Shivaji Maharaj's Father Shahaji Bhosale, established the Lal Mahal for his wife Jijabai and son. Shivaji Maharaj stayed here for several years until he captured his first fort.


लाल महल का इतिहास लाल महल (रेड पैलेस) पुणे (भारत) के सबसे प्रसिद्ध स्मारकों में से एक है। इस सुन्दर महल को शहाजीराजे भोसले ने सन 1630 में उनकी पत्नी जिजाबाई और बेटे शिवाजी महाराज के लिए बनवाया था। अपना जन्मस्थान शिवनेरी छोड़ने के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज ने उनके बचपन का ज्यादातर समय इसी महल में बिताया।


1646 में मुग़ल साम्राज्य का तोरणा किला काबिज करने तक शिवाजी महाराज लाल महल में ही रहते थे। शिवाजी महाराज की शादी सईबाई के साथ इसी महल में हुई।


रानी जिजाबाई और शिवाजी महाराज उनके गुरु दादोजी कोंडदेव के साथ पुणे आये थे। पुणे शहर को पुनर्जीवित करने के उद्देश से ही मूल लाल महल का निर्माण किया गया।


सतरावी शताब्दी के अंत तक लाल महल खंडहर बन चूका था क्यु की इस शहर पर कई सारे हमले हो चुके थे। ऐसा कहा जाता है की शनिवारवाडा के निर्माण के समय लाल महल की कुछ मिट्टी और पत्थर भाग्य के तौर पर इस्तेमाल किए गए थे।


मूल लाल महल जिस जगह पर था उस स्थान के केवल एक हिस्से पर ही वर्तमान लाल महल बनवाया गया। जिस तरह पुराना लाल महल बनाया था उस तरह नया लाल महल निर्मित नहीं किया गया और पुराने लाल महल के क्षेत्र और रचना की किसी को ज्यादा जानकारी नहीं है। वर्तमान लाल महल पीएमसी ने बनवाया है। इसका निर्माण लगभग 1984 में शुरू हुआ और 1988 में पूरा हुआ।


ऐतिहासिक दृष्टि से लाल महल शिवाजी और शाहिस्ते खान के बिच में हुई लड़ाई के लिए प्रसिद्ध है। जहा पर शाहिस्ते खान लाल महल की खिड़की से भागकर उसकी जान बचाने की कोशिश कर रहा था तब शिवाजी ने उसकी हातो की उंगलिया काट डाली थी।


यह एक बड़े पैमाने पर मुग़ल के विशाल और घुड़सवार सेना पर किया हुआ गुप्त रूप से गुरिल्ला हमला था क्यु की शाहिस्ते खान की सेना पुणे में कब्ज़ा कर चुकी थी जो शिवाजी महाराज का बचपन का घर था।


संख्या में और शस्त्रों से कम सेना होने के बावजूद हार की लापरवाही की सजा के रूप में मुग़ल सम्राट ने शाहिस्ते खान को बंगाल भेज दिया।


वर्तमान के लाल महल में शिवाजी के जीवन की कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाये बड़ी आयल पेंटिंग्स से बनाई गयी है। इसमें राजमाता की मूर्ति जिसमे शिवाजी राजमाता जिजाबाई के साथ सोने का हल चलाते हुए दीखते है।


फाइबर का मॉडल जिसमे रायगड के साथ एक घुड़सवार दिखाई देता है और शिवाजी के किले दर्शानेवाला महाराष्ट्र का बड़ा मानचित्र। प्रसिद्ध जिजामाता उद्यान अब बच्चों के लिए मनोरंजन का उद्यान बन चूका है।



देखिये पुणे के नजदीक पर्यटन यहाँपे


Pune Lal Mahal google Map

शनिवार, 5 अक्तूबर 2019

महाराष्ट्र के पुणे शहर का शनिवार वाडा




शनिवार वाडा पुणे  Shaniwar Wada – शनिवार वाडा भारत के महाराष्ट्र राज्य के पुणे शहर में बनी एक ऐतिहासिक किलाबंदी है। 18 वी शताब्दी में मराठा साम्राज्य के विस्तार के समय यह किला मराठा साम्राज्य के मुख्य किलो में से एक था।


1828 में अस्पष्टिकृत आग की वजह से किला पूरी तरह से जल गया था, लेकिन आज भी यात्रियों के लिए यह खुला रहता है। आज भी इसका बाहरी और आंतरिक रूप हमें किले में देखने मिलता है।


शनिवार वाडा असल में मराठा साम्राज्य के पेशवा की सात मंजिला कैपिटल बिल्डिंग है। कहा जाता है की उस समय शनिवार वाडा इतिहास की सबसे कलात्मक और आकर्षक रचनाओ में से एक था।


इस किले का निर्माण पहले केवल पत्थरो का उपयोग करके ही किया जा रहा था। लेकिन निचली मंजिल पूरी होने के बाद राजा शिवा ने उन्हें बचा हुआ महल ईंटो से बनाने का आदेश दिया। क्योकि उनके अनुसार केवल एक राजा का ही पूरी तरह से पत्थरो से बना महल हो सकता है।


कहा जाता है की शनिवार वाडा का निर्माण कार्य पूरा होने के बाद इसपर ब्रिटिश सेना ने आक्रमण भी किया था, आक्रमण में शनिवार वाडे की उपरी छः मंजिलो को जलाकर ध्वस्त कर दिया गया और इस वाडे की केवल निचली मंजिल बची हुई है। जिन्हें ब्रिटिश तोपखानो से सजाया गया है।


वर्तमान में शनिवार वाडा का केवल मुख्य बाहरी भाग ही बचा हुआ है जिसे हम आज भी पुणे शहर में जाकर देख सकते है।


जून 1818 में पेशवा बाजीराव द्वितीय ने अपनी गद्दी त्यागकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सर जॉन मल्कोल्म को सौप दी थी और राजनीतिक निर्वासन कर वे कानपूर के पास चले गये, जो वर्तमान भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में आता है।


27 फरवरी 1828 को महल के भीतर भीषण आग लग गयी थी। तक़रीबन 7 दीनो तक यह आग पूरी तरह से शांत नही हुई थी। आग में पूरा महल ध्वस्त हो गया था, इसके बाद केवल महल का मुख्य द्वार, गहरे फाउंटेन और पत्थरो की दीवारे ही महल में बची थी।



निर्माण कार्य:


छत्रपति शाहू के प्रधान मंत्री पेशवा बाजीराव प्रथम ने 10 जनवरी 1730 को शनिवार के दिन इसका उद्घाटन किया था। इसका नाम शनिवार वाडा मराठी शब्द शनिवार (दिन) और वाडा (रहने की जगह) के आधार पर रखा गया।


शनिवार वाडा का निर्माण कार्य 1732 में पूरा हुआ, उस समय इसे बनाने में तक़रीबन 16,110 रुपये लगे थे। उस समय यह रकम करोडो, अरबो से कम नही थी।


इस वाडे का उद्घाटन हिन्दू परंपराओ के अनुसार 22 जनवरी 1732 को किया गया, 22 जनवरी को शनिवार का ही दिन था।


इसके बाद पेशवाओ ने शनिवार वाडा में और भी बहुत सी चीजो का निर्माण किया, जैसे की वाटर फाउंटेन और जलाशय। यह वाडा पुणे के क़स्बा पेठ में मुला-मुठा नदी के पास स्थित है।



प्रसिद्ध संस्कृति:


• 2008 में शनिवार वाडा को दी अमेजिंग रेस एशिया 3 में दिखाया गया था। यह एक प्रकार का खेल शो है, जिसमे हर टीम के एक सहभागी को वाडे के भीतर 50 लोगो द्वारा पहने गये फेटो में से किसी एक सही फेटे को पहचानना होता है।


• शनिवार वाडा को 2015 की ऐतिहासिक ड्रामा फिल्म बाजीराव मस्तानी में भी दिखाया गया है।



शनिवार वाडा की प्रेतवाधित कहानी (डरावनी कहानी):


अमावस की रात को यह किला भुत-प्रेतों की जगह में परिवर्तित हो जाता है। स्थानिक लोगो के अनुसार अक्सर उन्हें रात में यहाँ “काका मला वाचवा” की आवाज सुनाई देती है।


कहा जाता है की यहाँ शासन करने करने वाले अंतिम शासक की जब हत्या की जा रही थी तो यही शब्द उनके मुँह से निकले थे। यही कहानी हमें शनिवार वाडा के बारे में पुणे में सुनने मिलती है।



शनिवार वाडा किले की संरचना (Shaniwar Wada Fort Architecture)


शनिवार वाडा किले में प्रवेश हेतु ५ दरवाजे बने हुए हैं, जिन्हें विभिन्न नाम दिए गए है.



दिल्ली दरवाज़ा (Dilli Darwaza or Delhi Gate) –


यह किले का मुख्य द्वार है. यह उत्तर दिशा में दिल्ली की ओर खुलता है. इस कारण इसे ‘दिल्ली दरवाज़ा’ भी कहा जाता है. उत्तर में दिल्ली की ओर मुख कर यह द्वार बनाने के पीछे पेशवा बाजीराव की मुग़ल साम्राज्य की समाप्ति की महत्वाकांक्षा भी मानी जाती है. यह दरवाज़ा काफ़ी ऊँचा और चौड़ा है. इतना कि पालकी सहित हाथी को यहाँ से निकाला जा सकता है. इस दरवाज़े पर दोनों पलड़ों पर ७२ नुकीले कीलें लगी हुई हैं, जिनकी लंबाई १२ इंच है. यह शत्रु के हाथियों के हमले से रक्षा के लिए दरवाज़े पर लगाई गई हैं. दरवाज़े के दाहिने पलड़े पर सैनिकों के आने-जाने के लिए एक छोटा द्वार बना हुआ है. ये दरवाज़ा काफ़ी छोटा है, जिससे कोई सेना आसानी और जल्दी से इसमें प्रवेश नहीं कर सकती. ऐसा सुरक्षा की दृष्टि से किया गया था.



मस्तानी दरवाज़ा या अलीबहादुर दरवाज़ा (Mastani Darwaza or Mastani Gate or Alibahadur Gate) –


यह दरवाज़ा उत्तर दिशा में खुलता है. पेशवा बाजीराव की दूसरी पत्नि मस्तानी बाहर जाते समय इसी दरवाज़े का इस्तेमाल करती थी. इस कारण इस दरवाज़े का नाम ‘मस्तानी दरवाज़ा’ पड़ा. इसे ‘अलीबहादुर दरवाज़ा’ का नाम भी दिया गया है.



खिड़की दरवाज़ा (Khidki Darwaza or Window Gate) –


यह दरवाज़ा पूर्व दिशा में खुलता है. खिड़की बनी होने के कारण इसका नाम ‘खिड़की दरवाज़ा’ पड़ा.



गणेश दरवाज़ा (Ganesh Darwaza or Ganesh Gate) –


यह दरवाज़ा दक्षिण-पूर्व दिशा में खुलता है. किले परिसर में बने गणेश महल के नज़दीक होने के कारण इसका नाम ‘गणेश दरवाज़ा’ पड़ा. इस दरवाज़े का उपयोग महिलायें ‘क़स्बा गणपति मंदिर’ (Kasba Ganpati Temple) में दर्शन के लिए आते समय करती थी.



जम्भूल दरवाज़ा या नारायण दरवाज़ा (Zambhul Darwaza or narayan Darwaza और Narayan Gate) –


जम्भूल दरवाज़ा दक्षिण दिशा में खुलता है. इसका उपयोग दासियाँ किले में आने-जाने के लिए किया करती थी. इस दरवाज़े का दूसरा नाम ‘नारायणराव दरवाज़ा’ नारायण राव की मृत्यु के उपरांत दिया गया. इसी दरवाज़े से उनका शव किले के बाहर ले जाया गया था.
शनिवार वाडा की मुख्य इमारत के निर्माण के बाद समय-समय पर किले में कई अन्य इमारतों, जलाशय और लोटस फाउंटेन का निर्माण करवाया गया.


किले की मुख्य इमारत ७ मंजिला थी, जिसकी सबसे ऊंची मंजिल पर पेशवाओं का निवास था, जिसे ‘मेघादम्बरी’ (Meghadambari) कहा जाता था. कहा जाता है कि यहाँ से देखने पर १७ किलोमीटर दूर आनंदी में स्थित संत ज्ञानेश्वर मंदिर के शिखर दिखाई पड़ता था. १८२८ में किले में लगी आग में यह इमारत भी नहीं बची. वर्तमान में इसका पत्थर से निर्मित आधार शेष है. इसके अतिरिक्त कुछ छोटी इमारत शेष हैं.


किले की अन्य प्रमुख इमारतों में ३ इमारतें ‘थोरल्या रायांचा दीवानखाना’ (Thorlya Rayancha Diwankhana), ‘नाचचा दीवानखाना’ (Naachacha Diwankhana) और ‘जूना अरसा महल’ (Old Mirror Hall) सम्मिलित थी. ये सभी इमारतें १८२८ में किले में लगी आग में नष्ट हो गई. आज उनके अवशेष मात्र देखे जा सकते हैं.



लोटस फाउंटेन (Lotus Fountain) –


शनिवार वाडा का मुख्य आकर्षण कमल के आकार का फाउंटेन है, जो ‘लोटस फाउंटेन’ या ‘हज़ारी कारंजे’ (Hazari Karanje) के नाम से जाना जाता है. इस फाउंटेन में कमल के फूल का आकार लिए हुए १६ पंखुड़ियाँ बनी हुई है, जो कलात्मकता का बेजोड़ नमूना है. एक समय में यहाँ १०० नर्तक नृत्य करते थे. इसकी एक कोने में संगमरमर की बनी गणपति की प्रतिमा स्थापित थी. फाउंटेन के साथ ही यहाँ फूलों का सुंदर बगीचा था.



शनिवार वाडा  Shaniwar Wada Fort History In Hindi


शनिवार वाडा किले की रहस्यमयी कहानी (Shaniwar Wada Fort Haunted Story)

पेशवा बाजीराव प्रथम के दो पुत्र थेबालाजी बाजीराव, जो नाना साहेब के नाम से भी जाने जाते हैं और रघुनाथ राव. बाजीराव प्रथम की मृत्यु के उपरांत नाना साहेब पेशवा बने.



पेशवा नाना साहेब के तीन पुत्र थे – शनिवार वाडा


१. विशव राव


२. महादेव राव


३. नारायण राव


पानीपत की तीसरे युद्ध में नाना साहेब के प्रथम पुत्र विशव राव की मृत्यु हो गई. जब नाना साहेब पेशवा की मृत्यु हुई, तो उनके द्वितीय पुत्र महादेव राव गद्दी पर बैठे. लेकिन २७ वर्ष की आयु में ही उनकी मृत्यु हो गई. उनकी मृत्यु के बाद पेशवा नाना साहेब के तीसरे पुत्र नारायण राव को गद्दी पर बैठाया गया. जब नारायण राव गद्दी पर बैठे, तब उनकी उम्र मात्र १७ वर्ष थी.


१७ वर्ष के बालक नारायण राव का गद्दी पर बैठना उनके काका (चाचा) रघुनाथ राव और काकी (चाची) आनंदी बाई को खल रहा था. रघुनाथ राव स्वयं पेशवा बनना चाहते थे. वह पहले पेशवा महादेवराव की हत्या का प्रयास कर चुके थे, जिससे नारायणराव वाकिफ थे. इस कारण वे भी अपने काका को पसंद नहीं करते थे और हमेशा शक की दृष्टि से देखते थे.


दोनों के रिश्ते तब और बिगड़ गए जब सलाहकारों के भड़काने पर पेशवा नारायणराव ने रघुनाथ राव को अपने घर पर नज़रबंद कर दिया. उनकी काकी आनंदी बाई इस बात पर उनसे बहुत नाराज़ हो गई.


नज़रबंद होने के बाद रघुनाथ राव ने अपने बचाव के लिए शिकारी कबीलियाई गार्दी (Gardi) के मुखिया सुमेंद्र सिंह गार्दी को एक पत्र भेजा, जिसमें लिखा था – ‘नारायणराव ला धारा’ जिसका अर्थ था – ‘नारायण राव को कैद कर लो’. ये पत्र पहले रघुनाथ राव की पत्नी आनंदी बाई के पास पहुँचा और मौका देखते हुए उसने घिनौनी चाल चलते हुए उस पत्र के शब्द बदल दिए और ‘नारायणराव ला धारा’ को ‘नारायणराव ला मारा’ कर दिया, जिसका अर्थ था –‘नारायणराव को मारो’.


यह पत्र मिलते ही सुमेंद्र सिंह गार्दी के लोगों ने शानिवाडा किले पर हमला कर दिया. जब वे सारी बाधा पार कर पेशवा नारायणराव के कक्ष में पहुँचे, तो नारायण राव उन्हें देखकर अपने काका के कक्ष की ओर ये कहते हुए भागा – ‘काका माला वाचवा’ अर्थात् ‘चाचा मुझे बचाओ’. किंतु उसके अपने काका तक पहुँचने के पहले ही गार्दियों ने उसे पकड़कर मौत के घाट उतार लिया.


इस घटना के संबंध में इतिहासकारों में मतभेद है. कुछ इतिहासकार उपरोक्त घटना को मानते है. कईयों का कहना है कि नारायणराव अपने काका के सामने ही स्वयं को बचाने के लिए याचना करता रहा, किंतु रघुनाथराव ने कुछ नहीं किया और गार्दियों ने उसे मार कर उसकी लाश के टुकड़े-टुकड़े कर नदी में बहा दिये.


लोगों का कहना है कि शनिवार वाडा में नारायणराव की आत्मा भटकती है और उसके द्वारा कहे गए अंतिम शब्द ‘काका माला वाचवा’ आज भी किले में सुनाई पड़ते है. इस कारण इस किले को भुतहा (haunted) माना जाता है.


२७ फ़रवरी १८२३ को शनिवार वाडा किले में आग लग गई. ७ दिनों तक इस आग में काबू नहीं पाया जा सका. इस आग में किले का अधिकांश हिस्सा जल गया. आज इसके अवशेष शेष हैं.



किले का इतिहास – Shaniwar Wada History in Hindi शनिवार वाडा पुणे


शनिवार वाडा असल में मराठा साम्राज्य के पेशवा की सात मंजिला महल है। कहा जाता है की उस समय शनिवार वाडा इतिहास की सबसे कलात्मक और आकर्षक रचनाओ में से एक था। इस किले का निर्माण पहले केवल पत्थरो का उपयोग करके ही किया जा रहा था।


शनिवार वाडा किला का निर्माण राजस्थान के ठेकेदारो ने किया था जिन्हे की काम पूर्ण होने के बाद पेशवा ने नाईक की उपाधि से नवाज़ा था। इस किले में लगी टीक की लकड़ी जुन्नार के जंगलो से, पत्थर चिंचवाड़ की खदानों से तथा चुना जेजुरी की खदानों से लाया गया था।


इसके बाद पेशवाओ ने शनिवार वाडा में और भी बहुत सी चीजो का निर्माण किया, जैसे की वाटर फाउंटेन और जलाशय। यह वाडा पुणे के क़स्बा पेठ में मुला-मुठा नदी के पास स्थित है।


शनिवार वाडा का निर्माण कार्य पूरा होने के बाद इसपर ब्रिटिश सेना ने आक्रमण भी किया था, जिससे महल को बहुत हानि पहुंची थी। वर्तमान में शनिवार वाडा का केवल मुख्य बाहरी भाग ही बचा हुआ है जिसे हम आज भी पुणे शहर में जाकर देख सकते है।

जून 1818 में पेशवा बाजीराव द्वितीय ने अपनी गद्दी त्यागकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सर जॉन मल्कोल्म को सौप दी थी और राजनीतिक निर्वासन कर वे कानपूर के पास चले गये, जो वर्तमान भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में आता है।


इस महल में 27 फ़रवरी 1828 को अज्ञात कारणों से भयंकर आग लगी थी आग को पूरी तरह बुझाने में सात दिन लग गए थे। इस से किले परिसर में बनी कई इमारते पूरी तरह नष्ट हो गई थी। उनके अब केवल अवशेष बचे है। अब यदि हम इस किले की संरचना की बात करे तो किले में प्रवेश करने के लिए पांच दरवाज़े है।



शनिवार वाडा पुणे नारायण राव की हत्या और उनकी आत्मा Shaniwar Wada (Narayan Rao) Story in Hindi


ऐसी मान्यता है क‌ि बाजीराव के बाद इस महल में राजनीत‌िक उथल-पुथल का दौर शुरु हो गया था। इसी राजनीत‌िक दांव-पेंच और सत्ता की लालच में 18 साल की उम्र में नारायण राव की हत्या इस महल में कर दी गई थी। कहते हैं आज भी नारायण राव अपने चाचा राघोबा को पुकारते हैं ‘काका माला बचावा’। नारायण राव की हत्या क्यों और क‌िस कारण से हुई उसकी एक बड़ी दर्दनाक कहानी है।


पेशवा नाना साहेब के तीन पुत्र थे विशव राव, महादेव राव और नारायण राव। अपने दोनों भाईयों की मृत्यु के बाद नारायण राव को पेशवा बनाया गया। नारायण राव को पेशवा तो बना द‌िया गया लेक‌िन उम्र कम होने की वजह से रघुनाथराव यानी राघोबा को उनका संरक्षक बनाया गया और शासन संचालन का अध‌िकार भी राघोबा के हाथों में ही रहा। लेक‌िन इस व्यवस्‍था से राघोबा और उनकी पत्नी आनंदीबाई खुश नहीं थी वह सत्ता पर पूर्ण अध‌िकार चाहते थे।


राघोबा की इस हसरत की भनक नारायण राव को लग गई और दोनों पक्ष के बीच दूरियां बढ़ने लगी। इस तरह दोनों एक दूसरे को शक की नज़र से देखते थे। हालात तब और भी विकट हो गए जब दोनों के सलाहकारों ने दोनों को एक दूसरे के विरुद्ध भड़काया। इसका परिणाम यह हुआ की नारायण राव ने अपने काका को घर में ही नज़रबंद करवा दिया।


इससे आनंदीबाई और भी ज्यादा नाराज़ हो गई। उधर राघोबा ने नारायण राव को काबू में करने का एक उपाय सोचा। उनके साम्राज्य में ही भीलों का एक शिकारी कबीला रहता था जो की गार्दी कहलाते थे। वो बहुत ही मारक लड़ाके थे। नारायण राव के साथ उनके सम्बन्ध खराब थे लेकिन राघोबा को वो पसंद करते थे। इसी का फायदा उठाते हुए राघोबा ने उनके मुखिया सुमेर सिंह गार्दी को एक पत्र भेजा जिसमे उन्होंने लिखा ‘नारायण राव ला धारा’ जिसका मतलब था नारायण राव को बंदी बनाओ। लेकिन आनंदीबाई को यहाँ एक अच्छा मौक़ा नज़र आया और उसने पत्र का एक अक्षर बदल दिया और कर दिया ‘नारायण राव ला मारा’ जिसका मतलब था नारायण राव को मार दो।

पत्र मिलते ही गार्दियों के एक समूह ने रात को घात लगाकर महल पर हमला कर दिया। वो रास्ते की हर बाधा को हटाते हुए नारायण राव के कक्ष की और बढे। जब नारायण राव ने देखा की गार्दी हथियार लेकर खून बहाते हुए उसकी तरफ आ रहे है तो वो अपनी जान बचाने के लिए अपने काका के कक्ष की और “काका माला वचाव” (काका मुझे बचाओ) कहते हुए भागा। लेकिन वह पहुँचने से पहले ही वो पकड़ा गया और उसके टुकड़े टुकड़े कर दिए गए।


हालाँकि इतिहासकारो में थोड़ा सा मतभेद है कुछ उस बात का समर्थन करते है जो की हमने ऊपर लिखी जबकि कुछ का कहना है की नारायण राव अपने काका के सामने अपनी जान बचाने की गुहार करता रहा पर उसके काका ने कुछ नहीं किया और गार्दी ने राघोबा की आँखों के सामने उसके टुकड़े टुकड़े कर दिए। लाश के टुकड़ो को बर्तन में भरकर रात को ही महल से बाहर ले जाकर नदी में बहा दिया गया।


स्थानीय लोग कहते हैं कि अमावस्या की रात अब भी एक दर्द भरी रात आवाज आती है, जो बचाओ-बचाओं पुकारती है। ये आवाज उसी राजकुमार की है, जिसकी हत्या करवाई गई थी।



शनिवार वाडा समय और एंट्री फीस (Shaniwar Wada Fort Timing and Entry Fees)


शनिवार वाडा सुबह ८:०० बजे से शाम ६:३० बजे तक खुला रहता है. भारतीयों (Indian) के लिए प्रवेश शुल्क ५ रूपये प्रति व्यक्ति और विदेशियों (Foreigners) के लिए १२५ रुपये प्रति व्यक्ति है. लाइट और साउंड शो के लिए अलग चार्जेज हैं.



शनिवार वाडा लाइट एंड साउंड शो (Shaniwar Wada Fort Light and Shound show)


शनिवार वाडा किले में प्रतिदिन शाम को लाइट एंड साउंड शो आयोजित होता है. १.२५ करोड़ के खर्च पर यहाँ इस शो का सेट-अप किया गया, ताकि लोगों को मराठाओं के समृद्ध इतिहास की जानकारी दी जा सके. प्रति शाम को ७:१५ से ८:१० तक मराठी में एवं ८:१५ से ९:१० तक अंग्रेजी भाषा में यह शो आयोजित होता है. इसके टिकट की कीमत २५/- प्रति व्यक्ति है, जो शाम ६:३० से लेकर ८:३० बजे तक ख़रीदे जा सकते हैं. इन टिकटों की advance booking नहीं होती. ये spot पर ही ख़रीदे जा सकते हैं.



शनिवार वाडा के पर्यटकों के लिए टिप्स (Tips For The Visitors Of Shaniwar Wada Fort)


शनिवार घूमने के लिए काफ़ी चलना पड़ता है. इसलिए आरामदायक जूते पहनना ज़रूरी है.
जुलाई से लेकर अप्रैल तक का समय मौसम के हिसाब से शनिवार वाडा विजिट करने के लिए बेस्ट है.
खाने-पीने की कोई व्यवस्था किले के भीतर नहीं है. इसलिए अपने साथ खाने-पीने का सामान लेकर चलें.
यह की ऑथोरिटी किले की साफ़-सफ़ाई को लेकर सख्त है. किले के परिसर में गंदगी फ़ैलाने पर जुर्माने का प्रावधान है.



पुणे देखिये पुणे के नजदीक पर्यटन यहाँपे


Shanivar Wada Pune google Map


शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2019

अपनी बॉडी टाइप के हिसाब से चुनें परफेक्ट जींस


 
]

 जींस ख़रीदते वक्त रखें इन बातों का ध्यान how to buy best jeans cloths shopping tips


सही जींस कैसे चुने ? जींस खरीदने से पहले लेबल जरूर जांचना चाहिए ताकि जींस में डेनिम यानी कॉटन की मात्रा पता कर सकें.कई बार खिंचाव बढ़ाने के लिए डेनिम के साथ लाइक्रा भी मिला दिया जाता है. यदि आपकी जींस में डेनिम का प्रतिशत 90 से 100 न हो, तो वो आरामदायक नहीं होगी.
"आमतौर पर 650 रुपए में बनी जींस 1900 रुपए तक में बिकती है. सस्ती और महंगी जींस में डेनिम की क्वॉलिटी और मात्रा का ही अंतर होता है."


जींस का चुनाव अपने शरीर की बनावट के अनुसार ही करना चाहिए. उदाहरण देते हुए कहते हैं, "ओवरसाइज़्ड जींस अफ्रीकी अमरीकी मज़दूरों के लिए बनाई गई थी, जिनका शरीर तंदुरुस्त और कमर बड़ी होती थी. लेकिन जब वही जींस कोई पतला-सा आदमी पहन ले, तो वो झोला पहने हुए आदमी की तरह दिखाई देता है."


स्किनी जींस Skinny Jeans -पतली टांगों वालों पर फबती है, क्योंकि यह जींस शरीर से बिल्कुल चिपकी होती है. ज़्यादा दुबले लोगों को इसे ना पहनने की सलाह देते हैं.


आर्क-शेप्ड-सुडौल शरीर वालों के लिए आर्क-शेप्ड जीन्स या कर्व्ड जीन्स को बेहतरीन विकल्प बताते हैं. कहते हैं कि इसकी बनावट स्ट्रेट-फ़िट के विपरीत होती है और उन लोगों पर जंचती है, जिनकी जांघें और पैर मोटे होते हैं."और आज भी ये पैंट्स आरामदायक और उपयोगी हैं. जेबों में ज़रूरी चीज़ें डाल कर सैर पर निकला सकता है."जिनकी जांघें पैरों की तुलना में काफ़ी मोटी हों, उनके लिए फैशन कन्सल्टेंट नौफिल क़ाज़ी गाजर या टेपर्ड को बेहतर विकल्प बताते हैं.


बूट-कट जींस या बेल बॉटम्स -के बारे में ये जींस बहुत लंबे लोगों के लिए सही है, जो अपना कद छुपाना चाहते हों. लेकिन छोटे क़द के लोगों को इसे न पहनने की हिदायत भी देते हैं. सही जींस कैसे चुने ?


कार्गो जींस -द्वितीय विश्व-युद्ध के दौरान ब्रिटिश सैनिकों के लिए कई जेबों वाली यूनिफॉर्म तैयार क रवाई गई थी, ताकि वो उन जेबों में ज़रूरी सामान जैसे नक्शा, दवाई वग़ैरह रख सकें. टेंपर्ड के उलट ओवरसाइज़्ड जींस या बॉयफ्रेंड जींस होती है."यह शुरू-शुरू में हिप-हॉप स्टाइल की जींस होती थी."


क्रॉप्ड जींस-आज कल तेज़ी से बिक रही क्रॉप्ड जींस ख़ासकर उन लंबे लोगों के लिए सबसे उपयुक्त है, जो अपने पैरों को छोटा दिखाना चाहते हों."जींस की कहानी सिर्फ़ फ़िट्स तक ही नहीं सीमित नहीं है. जींस को एसिड वॉश, स्टोन वॉश, ब्लीच वॉश आदि किया जाता है.जींस यदि मैली हो, तो वो 'मॅड-वॉश जैसी हो जाती है.



सही जींस कैसे चुने ? अपने बॉडी के हिसाब से परफेक्ट जींस खरीदने के लिए समझें ये डेनिम स्टाइल्स


सही जींस कैसे चुने ? जब आपके सामने इस तरह के विकल्प और पहलू आ जाएं:


कलर (Colour)
फिट (Fit)
स्टाइल (Style)
बजट (Budget)
ओकेजन(Occasion)


आप मोटे हो या पतले, काले हो या गोरे, कुछ फर्क नहीं पड़ता। अच्छा दिखना, मैं करूंगा आपके लिए आसान।


बस इन कुछ बातों का रखना होगा ख्याल।



1. जींस फिट के प्रकार


पांच फिटिंग में आती है।



स्किनी फिट (Skinny Fit)


ये पैरों में पूरी तरह फिट बैठता है। ये ठीक आपकी बॉडी में स्किन की तरह चिपका रहता है। इसके साथ ही ये नीचे से उठा रहता है। इस तरह की जींस के जिप (Zip) भी सामान्य से थोड़े छोटे होते हैं।



स्लिम फिट (Slim Fit)


ऐसे जींस ना तो बहुत टाइट होते हैं और ना ही बहुत ढीले-ढाले। इसलिए इसको पहनने के बाद थोड़ा कम्फर्टेबल महसूस होता है। इसका नीचे वाले पार्ट भी स्किनी जींस की तरह ही नैरो होता है। इसको नीचे से फोल्ड करके पहना जाता है। इससे बहुत ही शानदार लुक आता है।



रेगुलर फिट (Regular Fit)


इस प्रकार के जींस हिप से लेकर थाई तक सीधे होते हैं। इसके साथ-साथ घुटनों से लेकर एड़ियों के ऊपर तक सीधे होते हैं। ये भी बहुत टाइट और लूज नहीं होते हैं लेकिन नीचे वाला हिस्सा स्किनी और स्लिम जींस से ज्यादा खुला हुआ होता है।



रिलेक्सड् फिट (Relaxed Fit)


ये कमर के नीचे से थोड़ी लूज होती है। ऐसी जींस बहुत ही आरामदेह होती है। इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि ये आपके बॉडी पार्ट को जकड़ता नहीं है। लेकिन थोड़ा फिट नजर आता है।



लूज फिट (Loose Fit)


ऐसी जींस शरीर को पूरी तरह खुला छोड़ देती है। केवल कमर का हिस्सा ही कसा हुआ रहता है बाकि जींस का कोई भी हिस्सा शरीर को नहीं छूता है। इस तरह की जींस बहुत ही आरामदेह होती है।



2. सही जींस कैसे चुने ? जींस की राइज समझें


जींस के लिए राइज भी बहुत मायने रखती है। इससे आपको तय करना होगा कि आपको जींस कमर से कितने ऊपर, नीचे या कैसे पहननी हैं। इसके भी चार प्रकार होते हैं -



हाई राइज (High Rise)


ऐसे जींस लंबे लोगों के लिए फिट होते हैं। लेकिन आप शर्ट इन करके नहीं पहन सकते हैं। इसे बेली बटन के ऊपर पहना जाता है।



मिड राइज (Mid Rise)


ऐसे लोग जो फॉर्मल ड्रेस पहनते हैं उनके लिए ये परफेक्ट है। ऐसे जींस पर शर्ट को इन करके पहना जा सकता है।



लॉ राइज (Low Rise)


इसको बेली बटन के नीचे पहना जाता है। ये आरामदेह होता है।



लॉ क्रॉच (Low Crotch)


इसको बहुत ही नीचे करके पहना जाता है। ये खासकर स्टायलिस्ट लोगों के लिए है।



3. बॉडी के हिसाब से ऐसे चुने जीन्स


पतली बिल्ड (Thin Build)


पतले लोग ये सोचते हैं कि उन पर जींस परफेक्ट मैच नहीं होगी। इसीलिए वे चाहकर भी जींस नहीं खरीदते हैं जबकि कुछ लोग खरीदने के बाद संतुष्ट नहीं दिखते हैं। इन्हें स्लिम और रेगुलर टाइप के जींस खरीदने चाहिए।



एथलेटिक बिल्ड (Athletic Build)


यदि आपकी बॉडी इस प्रकार की है तो फिर आपके लिए तीन प्रकार की जींस है। स्लिम, रिलेक्सड् और रेगुलर टाइप ऐसे बॉडी पर सटीक लगते हैं।



मस्कुलर बिल्ड (Muscular Build)


अब यदि आप हष्ट-पुष्ट हैं और सोच रहे हैं कि आप पर तो कोई भी जींस चलेगी लेकिन ऐसा नहीं है। ऐसे बॉडी के लिए आपको रिलेक्सड् और रेगुलर टाइप जींस लेनी चाहिए।



वाइड हिप्स (Wide Build)


यदि आपके कमर के नीचे का हिस्सा मोटा है। ऐसे में आपको लूज, रिलेक्सड् और रेगुलर टाइप जींस खरीदनी चाहिए। ये आपकी बॉडी के हिसाब से परफेक्ट आएंगी।



लार्ज वेस्ट (Large Waist)


सामान्य साइज से आपकी कमर चौड़ी है तो आपको रिलेक्सड् और लूज जींस खरीदनी चाहिए।



4. सही जींस कैसे चुने ? अब आती है बारी कलर और ओकेजन समझने की


अब जींस के कलर का सही चुनाव आपकी शर्ट/टी-शर्ट (shirt/t-shirt) के कलर पर निर्भर करता है। साथ ही ये बात भी मायने रखती है कि आपको कौन-सा कलर पसंद या फिर कौन-सी कलर की जींस आपके ड्रेसिंग रूम में नहीं है। आपके पास यदि कोई भी डेनिम कलर होगा तो फ्यूचर में भी शर्ट/टी-शर्ट के कलर के हिसाब से जींस का चुनाव आपके लिए आसान रहेगा।
ऑफिशियल मीटिंग या ओकेजन है तो फॉर्मल जींस का लुक सही रहता है। सेमी-फॉर्मल और कैजुअल मौकों के लिए। आप रिप्ड यानी कि डिस्ट्रेस्ड जींस को पहनकर और स्टाइलिश दिख सकते हैं।


 

देखिये नए फैशन ट्रेंड यहाँ

गुरुवार, 3 अक्तूबर 2019

बालों को घना बनाने के लिए कैसे करें कड़ी पत्‍ते का इस्‍तेमाल


बालों को घना बनाने के लिए कड़ी पत्‍ते का इस्‍तेमाल


कड़ी पत्‍ते का इस्‍तेमाल: करी पत्तों में बहुत मात्रा में प्रोटीन और बीटा कैरोटीन होता है, जो बालों को क्षतिग्रस्‍त होने से रोकने के साथ ही बालों को पतला होने से रोकने में मदद करता है। यह बालों के रोम को नया जीवन प्रदान करता है। हमें इसका उपयोग सब्ज़ियों के साथ करना चाहिए जो की बहुत ही गुणकारी होता है।


ज़रूरत से ज्यादा केमिकल का इस्तेमाल और प्रदूषण की वजह से बालों को काफी नुक्सान होता है। करी पत्ते में वो सारे पोषण तत्व पाये जाते हैं, जो बालों को स्वस्थ रखते हैं। करी पत्तों को पीस कर इसका लेप बना लें फिर इसे सीधे बालों की जड़ों में लगाएं या आप करी पत्ते को खा भी सकते हैं, अगर आपको इसके कड़वे स्वाद से कोई परेशानी नहीं है। इससे आपके बाल काले, लंबे और घने हो जाएंगें साथी ही बालों की जड़ें भी मज़बूत होंगी।


करी पत्ता में विटामिन बी1 बी3 बी9 और सी होता है। इसके अलावा इसमें आयरन, कैल्शियम और फॉस्फोरस होते हैं। इसके रोज़ाना सेवन से आपके बाल काले लंबे और घने होने लगेंगे। यही नहीं यह बालों को डैंड्रफ से भी बचाती है।



करी पत्ते का तेल


करी पत्ते का एक गुच्छा ले कर उसे साफ पानी से धो लें और सूरज की धूप में तब तक सुखा लें, जब तक कि यह सूख कर कड़ा न हो जाए। फिर इसे पाउडर के रूप में पीस लें अब 200 एम एल नारियल के तेल में या फिर जैतून के तेल में लगभग 4 से 5 चम्मच कड़ी पत्ती मिक्स कर के उबाल लें। दो मिनट के बाद आंच बंद कर के तेल को ठंडा होने के लिए रख दें। तेल को छान कर किसी एयर टाइट शीशी में भर कर रख लें।



बालों के लिए बनाएं मास्क


करी पत्ते लें और इसे पीस कर इसका पेस्ट बना लें। अब इसमें थोड़ा दही मिलाएं और इसे अपने बालों पर लगाएं। इस मिश्रण को बालों में 20-25 मिनट के लिए छोड़ दें, फिर शैम्पू से बालों को धो दें। इससे आप के बाल काले और घने हो जाएंगे।


[ads1]

करी पत्ते की चाय बनायें


करी पत्ते को पानी में उबाल लें अब इसमें एक नींबू निचोड़ लें और चीनी मिलाएं। एक हफ्ते तक इसे पीयें। यह आपके बालों लंबा, घना, और सफ़ेद होने से बचाएगा। यही नहीं यह आपके पाचन तंत्र के लिए भी काफी फायदेमंद है।



दही और करी पत्ते का मिश्रण


आधा कप करी पत्तो को दही के साथ पीस ले व उस मिश्रण को अपने बालो पे लगाये, व कुछ मिनिटो बाद धो ले। हमें हमारे रोज के आहार के साथ करी पत्तो का भी सेवन करना चाहिए, यह बहुत ही गुणकारी होता है।



बाल सफेद होने का इलाज


तनाव, शराब पीने, सिगरेट पीने, आयु, आनुवंशिकता के कारण समय से पहले काफी लोगो के बाल सफ़ेद हो जाते है। करी पत्तो में विटामिन ‘बी’ होता है जो बालो की जड़ो को मजबूती व पोषण प्रदान करके बालो का प्राकर्तिक रंग फिर से ले आता है।



कड़ी पत्ता के यह बेहतरीन फायदे


1 अगर आप डाइबिटीज के रोगी हैं, तो कड़ी पत्ता अपने भोजन में शामिल करने पर आप इस समस्या से आसानी से छुटकारा पा सकते हैं। ब्लड शुगर को नियंत्रित करने के लिए यह बेहद फायदेमंद है।


2 कफ होने, कफ सूख जाने या फेफड़ों में जमाव की स्थिति में कड़ी पत्ता आपके लिए बेहद मददगार साबित होगा। इसके लिए कड़ी पत्ते को पीसकर या फिर इसका पाउडर शहद के साथ सेवन करें।


3 आयरन और फॉलिक एसिड के एक बेहतरीन स्त्रोत कड़ी पत्ता आपके शरीर को आयरन सोखने में मदद करता है और एनीमिया जैसी सम्स्याओं से आपको बचाता है। रोजाना खालीपेट कड़ी पत्ता और खजूर खाने से लाभ होगा।


4 किसी भी तरह के त्वचा संबंधी रोग में कड़ी पत्ता फायदेमंद है। लंबे समय से अगर आप मुहांसे या अन्य समस्याओं से परेशान हैं तो प्रतिदिन कड़ी पत्ता खाएं और इसका पेस्ट बनाकर लगाएं।


5 बालों को घना, काला और मजबूत बनाने के लिए आप इसका प्रयोग कर सकते हैं। इसके लिए नारियल तेल में कड़ी पत्ते को उबालकर उस तेल को बालों में लगाएं और अच्छी तरह से मालिश करें।

6 पाचन संबंधी समस्या हो या फिर दस्त लगने पर कड़ी पत्ते को पीसकर छाछ में मिलाकर पिएं। यह पेट की गड़बड़ी को भी शांत करेगा और पेट के सभी दोषों का निवारण करने में सहायक होगा।


बाल झड़ने से रोकने के घरेलू उपाय

मंगलवार, 1 अक्तूबर 2019

गांधीजी के तीन बन्दर की कहानी



गांधीजी के 3 बन्दर यानी बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत कहो, यही गांधीजी के 3 बंदरो के माध्यम से देशवासियों के लिए एक बहुत संदेश था लेकिन जैसे जैसे जमाना बदलता गया गांधीजी के इस विचारधारा को पालन करने वाले बहुत ही कम लोग रह गये है और गांधीजी के द्वारा कही गयी बाते अब सिर्फ किताबी ज्ञान की बाते भर रह गयी है

जरा सोचिये जब हमारा देश आजाद नही था तब गांधीजी का देश में रामराज्य का सपना था यानी समाज का हर तबका खुशहाल और सुखपूर्वक जीवन यापन करे और देश के निर्माण में अपना पूर्णरूप से सहयोग दे लेकिन वर्तमान में महात्मा गांधीजी का यह सपना सपना भर ही रह गया है
ऐसा माना जाता है की जब चीनी प्रतिमंडल महात्मा गांधीजी जी मिलने आया था तब इन्हें भेट स्वरूप 3 बन्दर के खिलौने दिए थे जो की अपने आप में 3 मुद्राए में थे जिससे इनकी मुद्राओ से एक खास संदेश जाता था

1 – बुरा मत देखो


गाँधी का पहला बन्दर जो की अपनी आँखों को हाथो से ढककर बंद किये हुए है उसका यही संदेश जाता है की हमे कभी भी बुरा यानी बुरी चीजे नही देखनी चाहिए

2 – बुरा मत बोलो


गांधीजी के दुसरे बन्दर का अपने मुह पर हाथ रखे हुए यही संदेश जाता है की हमे कभी भी बुरा नही बोलना चाहिए जरा सोचिये आप किसी के प्रति बुरा बोलते है या लड़ते झगड़ते है तो उस समय निश्चित ही आपके शरीर और दिमाग में भी एक बेचैनी और घबराहट सी जरुर होती होगी इसका सीधा सा अर्थ है की हमारा शरीर और दिमाग न तो बुरी बाते सुनना पसंद करता है और न किसी को बुरा कहना पसंद करता है

ऐसे में यदि आप दुसरो से अपने प्रति अच्छा सुनना चाहते है तो हमे खुद दुसरो के लिए मीठा भी बोलना पड़ेगा जैसा की कबीरदास जी ने भी कहा है

“ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।

औरन को सीतल करे, आपहुं सीतल होय”

अर्थात हमे दुसरो के प्रति ऐसी वाणी या बोली बोलनी चाहिए जिससे की हमारा मन भी सुद्ध रहे और हमारी वाणी भी दुसरो को मीठी और प्यारी लगे जिससे सुनने वाले के हृदय में भी आपके लिए सम्मान की भावना बढे

3 – बुरा मत सुनो


गांधीजी के तीसरे बन्दर का संदेश था की हमे कभी भी बुरा भी नही सुनना चाहिए यानी आपके सामने कोई बुराई करता रहे और आप चुपचाप सुनते रहेगे तो यह भी एक तरह पाप ही है यानी बुराई सुनकर चुप रहना भी एक तरह से बुराई को बढ़ावा देना है गांधीजी के तीन बन्दर

तो देखा आपने गांधीजी ने अपने 3 बंदरो के माध्यम से समाज के लोगो को कितना अच्छा संदेश दिया था

तो आज हम सब कह सकते है बुरा मत देखो, बुरा मत बोलो, बुरा मत सुनो, और बुरा मत करो जैसे संदेशो के साथ हमे अपने समाज में आगे बढने की जरूरत है

कब और कहां से आए बापू के 3 बंदर


राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बारे में तो आपने सुना ही होगा। जब भी बापू का जिक्र होगा, उनसे जुड़े तीन बंदरों की भी बात होगी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन तीनों बंदरों का नाम बापू के साथ कैसे जुड़ा? माना जाता है कि ये बंदर चीन से बापू तक पहुंचे। दरअसल, देश- विदेश से लोग अक्सर सलाह लेने के लिए महात्मा गांधी के पास आया करते थे।

मिजारू बंदर :


इसने दोनों हाथों से आंखें बंद कर रखी हैं, यानी जो बुरा नहीं देखता।

किकाजारू बंदर :


इसने दोनों हाथों से कान बंद कर रखे हैं, यानी जो बुरा नहीं सुनता।

इवाजारू बंदर :


इसने दोनों हाथों स मुंह बंद कर रखा है, यानी जो बुरा नहीं कहता। गांधीजी के तीन बन्दर

चीन से आए ये बंदर


एक दिन चीन का एक प्रतिनिधिमंडल उनसे मिलने आया। बातचीत के बाद उन लोगों ने गांधी जी को एक भेंट देते हुए कहा कि यह एक बच्चे के खिलौने से बड़े तो नहीं हैं लेकिन हमारे देश में बहुत ही मशहूर हैं। गांधी जी ने तीन बंदरों के सेट को देखकर बहुत खुश हुए। उन्होंने इसे अपने पास रख लिया और जिंदगी भर संभाल कर रखा। इस तरह ये तीन बंदर उनके नाम के साथ हमेशा के लिए जुड़ गए। माना जाता है कि ये बंदर बुरा न देखो, बुरा न सुनो, बुरा न बोलो के सिद्धांतों को दर्शाते हैं।

जापान से भी नाता


गांधीजी के इन तीन बंदरों को जापानी संस्कृति से भी जोड़ा जाता है। 1617 में जापान के निक्को स्थित तोगोशु की समाधि पर यही तीनों बंदर बने हुए हैं। माना जाता है कि ये बंदर चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस के थे और आठवीं शताब्दी में ये चीन से जापान पहुंचे। उस वक्त जापान में शिंटो संप्रदाय का बोलबाला था। शिंटो संप्रदाय में बंदरों को काफी सम्मान दिया जाता है। जापान में इन्हें 'बुद्धिमान बंदर' माना जाता है और इन्हें यूनेस्को ने अपनी वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में शामिल किया है। वैसे, इन तीन बंदरों के प्यार से नाम भी हैं।

बापू के | कविता


गाँधीजी के बन्दर तीन,
सीख हमें देते अनमोल ।

बुरा दिखे तो दो मत ध्यान,
बुरी बात पर दो मत कान,
कभी न बोलो कड़वे बोल ।

याद रखोगे यदि यह बात ,
कभी नहीं खाओगे मात,
कभी न होगे डाँवाडोल ।

गाँधीजी के बन्दर तीन,
सीख हमें देते अनमोल ।

 

पढ़िए और यहाँ क्या कहते हे प्रसिद्ध हस्तिया

Like Us

लोकप्रिय पोस्ट