शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

गौरी गणपति उत्सव



Gauri Ganpati Festival Information गौरी पूजन एक बहुत ही प्रसिद्द त्यौहार है जिसकी अपनी अनूठी विशेषताएं हैं| भगवान गणेश की मां देवी पार्वती को माता गौरी भी कहा जाता है।गौरी पुजन या गिरिजा पूजा में, हम देवी पार्वती यानि की गौरी की पूजा करते हैं। सिर्फ महाराष्ट्र नहीं बल्कि महाराष्ट्र के पास कुछ अन्य स्थानों में गौरी पूजन मनाया जाता है। इसके अलावा, गौरी पूजन की महाराष्ट्रीयन महिलाओं के लिए एक ख़ास त्यौहार की है। महाराष्ट्र में गौरी पूजा को ‘मंगला गौरी’ भी कहा जाता है। महोत्सव महाराष्ट्र महिलाओं द्वारा महान भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है। वे गौरी पूजन के दिन पूरी रात जागकर माँ की अर्चना करती हैं और झिम्मा और फुगड़ी जैसे पारंपरिक खेलों में खुद को शामिल करते हैं। यह महिलाओं के साथ अपने दोस्तों के साथ आनंद लेने का अवसर है।


गौरी पूजन में महिलाएं माता पार्वती की आराधना करती हैं. यह त्योहार महाराष्ट्र में मनाया जाता है. गौरी पूजन हर साल गणेश चतुर्थी के चौथें वा पांचवें दिन पड़ती है. इस दिन देवी का आवाहन किया जाता है. उनकी प्रतिष्ठा की जाती है. दूसरे दिन मां की मुख्य पूजा होती है और तीसरे दिन देवी की विदाई होती है.


गिरिजा पूजा मंत्र: गौरी पूजन दोनों विवाहित व अविवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। विवाहित महिलाएं अपने पतियों की दीर्घ आयु और कल्याण के लिए प्रार्थना करती हैं, वहीं अविवाहित महिलाएं अपने लिए आदर्श पति पाने के लिए गौरी पूजन करती हैं। ऐसा कहा जाता है कि सीता माता ने भगवान राम को अपने पति के रूप में पाने के लिए गौरी पूजन किया था।


मंत्र :- सर्वमंगल मांगल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके. शरणनेताम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते..
श्री मंगला गौरी मंत्र :- अस्य स्वयंवरकलामंत्रस्य ब्रम्हा ऋषि, अतिजगति छन्द:, देवीगिरिपुत्रीस्वयंवरादेवतात्मनो अभीष्ट सिद्धये



क्यों करते हैं गौरी पूजन- Gauri Ganpati Festival Information


गौरी पूजन आम तौर पर सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है. देवी को प्रसन्न करने से घर में खुशहाली आती है व धन-धान्य बढ़ाता है. ये पति-पत्नी के रिश्तों को बेहतर बनाता है. इसके अलावा इससे शादी में आने वाली बाधाएं दूर होती है, मनचाहा एवं योगय जीवनसाथी मिलता है.


ऐसा माना जाता हैं की जैसे एक ब्याही लड़की अपने मायके आती हैं वैसे है गौरी अपने पुत्र गणेश के साथ तीन दिनों के लिए अपने मायके आती हैं। और तीन दिन उनकी बड़ी लाड प्यार से पूजा होती हैं।
कुछ क्षेत्रो में माँ गौरी की प्रतिमा को हल्दी पाउडर से बनाया जाता है और पूजा के दौरान उस प्रतिमा को भगवान गणेश की मूर्ति के साथ रखा जाता है। कुछ भागो में प्रतिमा को विविध सामग्री का उपयोग कर बनाया जाता है और फिर उसे भगवान गणेश की मूर्ति के साथ रखा जाता है। आज हम यहाँ गणेश चतुर्थी के समय मनाई जाने वाली गौरी पूजा के कुछ पारंपरिक रीती-रिवाजो के बारे में जानेंगे।



गणेश चतुर्थी के समय मनाई जाने वाली गौरी पूजा से जुडी पौराणिक कथा:story of Gauri


गौरी, माँ पार्वती का ही एक नाम है, जो भगवान शिव की पत्नी और भगवान गणेश की माँ थी। एक बार माँ गौरी स्नान करने के लिए गयी। प्रथाओ के अनुसार माँ गौरी स्नान करने समय अपने शरीर पर हल्दी लगाती थी। इसके बाद उनके शरीर के मैल से उन्होंने एक छोटे बालक को जन्म दिया। और जब माँ पार्वती स्नान कर रही थी तो उन्होंने उस बालक को द्वार की रखवाली करने को कहा और साथ ही आदेश दिया की वह किसी को भी भीतर न आने दे।


जब भगवान शिव माँ पार्वती से मिलने आए तो उस बालक ने भगवान शिव को भीतर जाने से रोका भी। छोटे बालक को रोता हुआ देख भगवान शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल से बालक का सिर काट दिया। इसके बाद जब माँ पार्वती ने भगवान शिव को बालक के बारे में विस्तृत बताया तो भगवान शिव को अपनी गलती का एहसास हो चूका था। इसके बाद माँ पार्वती को खुश करने के लिए उन्होंने बालक को नया जीवन देने के लिए उसपर गजमुख लगाया। और इस प्रकार भगवान गणेश की उत्पत्ति हुई।


नया जीवन देने के साथ-साथ भगवान शिव ने उन्हें अपनी सेना का प्रजापति भी घोषित किया। कहा जाता है की उसी दिन से उस दिन को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। चूँकि माँ पार्वती (गौरी) ने ही भगवान गणेश को जन्म दिया है, इसीलिए गणेश चतुर्थी के समय गौरी पूजा का विशेष महत्त्व होता है। साथ ही हल्दी से मा गौरी की प्रतिमा बनाए जाने का भी यही एक कारण है।


गणेश उत्सव एकमात्र ऐसा त्यौहार है जब माँ और पुत्र दोनों को एकसाथ पूजा जाता है।


माँ पार्वती को भारत के कुछ भागो में भगवान गणेश की माँ जबकि पुणे में देवी गौरी को भगवान गणेश की बहन माना जाता है, लेकिन गणेश चतुर्थी के समय लोग श्रद्धा और अपार भक्ति के साथ देवी गौरी की पूजा करते है।


भक्तो का ऐसा मानना है की घर में माँ गौरी के आने से घर में सुख-शांति, समृद्धि और खुशियाँ बनी रहती है।


देवी गौरी को तीन दिनों तक पूजा जाता है- पहले दिन उनकी स्थापना की जाती है, दुसरे दिन सत्यनारायण पूजा और तीसरे दिन देवी गौरी का विसर्जन किया जाता है।


गौरी पूजा की तैयारियां गणपति उत्सव के साथ ही शुरू हो जाती है, रंगोली की सहायता से महिलाये घर के मुख्य द्वार पर देवी के पदचिन्ह भी बनाती है और फिर देवी गौरी की प्रतिमा (मूर्ति) को भी घर लाती है।


फिर मुहूर्त देखकर देवी को नैवेद्य चढ़ाया जाता है और परंपराओ के अनुसार पर आरती की जाती है और लोग देवी गौरी से प्रार्थना करने लगते है।



गणेश चतुर्थी के समय मनाई जाने वाली गौरी पूजा के बारे में कुछ रोचक बाते: Gauri Ganpati Festival Information


• गणेश चतुर्थी के समय महाराष्ट्र राज्य के बहुत से घरो में गौरी गणेश की पूजा की जाती है। हर साल गौरी स्थापना अगस्त – सितम्बर के बिच में होती हैं की और स्थापना के पाँच दिन बाद गणपति विसर्जन किया जाता है।
• गौरी को माँ पार्वती का अवतार माना जाता है, जो भगवान गणेश की माँ थी। जबकि महाराष्ट्र में ऐसा माना जाता है की गौरी भगवान गणेश की बहन है जो उनसे मिलने के लिए आती है। घर में माँ गौरी का आना घर की सुख, शांति, स्वास्थ, समृद्धि और खुशियों को दर्शाता है। जबकि गौरी की स्थापना भी माँ गौरी की दो प्रतिमाओ के साथ की जाती है।
• गणेश चतुर्थी के समय माँ गौरी की प्रतिमाओ को गणेश उत्सव के दो दिन बाद घर पर लाया जाता है। वह दिन दिनों तक घर में रहती है। इसके दुसरे दिन सत्यनारायण पूजा का आयोजन किया जाता है और तीसरे दिन उन्हें पानी में बहा दिया जाता है।
• किंवदंतियों के अनुसार दो बहनों के रूप में माँ गौरी हर साल गणेशजी के घर पर आती है। भारत के कुछ राज्यों में माँ गौरी को माँ लक्ष्मी की उपासना भी समझा जाता है।
• कर्नाटक में गौरी को भगवान गणेश की माँ समझा जाता है और गौरी पूजा का आयोजन गणेश चतुर्थी के एक दिन पहले ही किया जाता है।
• पश्चिम बंगाल में माँ सरस्वती और माँ लक्ष्मी को भगवान गणेश की बहन माना जाता है और इन सभी को माँ दुर्गा की संतान माना जाता है।


पढ़िए यहाँ और रोचक जानकारी

Gauri ganesh puja mantra Gauri Ganpati Festival Information


भगवान् गणेश का ध्यान


गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारूभक्षणम्।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम् ।।


भगवती गौरी का ध्यान


नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम: ।
नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता:प्रणता:स्म ताम् ।।
श्रीगणेशाम्बिकाभ्यां नम:, ध्यानं समर्पयामि ।

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