शुक्रवार, 30 अगस्त 2019

गौरी गणपति उत्सव



Gauri Ganpati Festival Information गौरी पूजन एक बहुत ही प्रसिद्द त्यौहार है जिसकी अपनी अनूठी विशेषताएं हैं| भगवान गणेश की मां देवी पार्वती को माता गौरी भी कहा जाता है।गौरी पुजन या गिरिजा पूजा में, हम देवी पार्वती यानि की गौरी की पूजा करते हैं। सिर्फ महाराष्ट्र नहीं बल्कि महाराष्ट्र के पास कुछ अन्य स्थानों में गौरी पूजन मनाया जाता है। इसके अलावा, गौरी पूजन की महाराष्ट्रीयन महिलाओं के लिए एक ख़ास त्यौहार की है। महाराष्ट्र में गौरी पूजा को ‘मंगला गौरी’ भी कहा जाता है। महोत्सव महाराष्ट्र महिलाओं द्वारा महान भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है। वे गौरी पूजन के दिन पूरी रात जागकर माँ की अर्चना करती हैं और झिम्मा और फुगड़ी जैसे पारंपरिक खेलों में खुद को शामिल करते हैं। यह महिलाओं के साथ अपने दोस्तों के साथ आनंद लेने का अवसर है।


गौरी पूजन में महिलाएं माता पार्वती की आराधना करती हैं. यह त्योहार महाराष्ट्र में मनाया जाता है. गौरी पूजन हर साल गणेश चतुर्थी के चौथें वा पांचवें दिन पड़ती है. इस दिन देवी का आवाहन किया जाता है. उनकी प्रतिष्ठा की जाती है. दूसरे दिन मां की मुख्य पूजा होती है और तीसरे दिन देवी की विदाई होती है.


गिरिजा पूजा मंत्र: गौरी पूजन दोनों विवाहित व अविवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। विवाहित महिलाएं अपने पतियों की दीर्घ आयु और कल्याण के लिए प्रार्थना करती हैं, वहीं अविवाहित महिलाएं अपने लिए आदर्श पति पाने के लिए गौरी पूजन करती हैं। ऐसा कहा जाता है कि सीता माता ने भगवान राम को अपने पति के रूप में पाने के लिए गौरी पूजन किया था।


मंत्र :- सर्वमंगल मांगल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके. शरणनेताम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते..
श्री मंगला गौरी मंत्र :- अस्य स्वयंवरकलामंत्रस्य ब्रम्हा ऋषि, अतिजगति छन्द:, देवीगिरिपुत्रीस्वयंवरादेवतात्मनो अभीष्ट सिद्धये



क्यों करते हैं गौरी पूजन- Gauri Ganpati Festival Information


गौरी पूजन आम तौर पर सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है. देवी को प्रसन्न करने से घर में खुशहाली आती है व धन-धान्य बढ़ाता है. ये पति-पत्नी के रिश्तों को बेहतर बनाता है. इसके अलावा इससे शादी में आने वाली बाधाएं दूर होती है, मनचाहा एवं योगय जीवनसाथी मिलता है.


ऐसा माना जाता हैं की जैसे एक ब्याही लड़की अपने मायके आती हैं वैसे है गौरी अपने पुत्र गणेश के साथ तीन दिनों के लिए अपने मायके आती हैं। और तीन दिन उनकी बड़ी लाड प्यार से पूजा होती हैं।
कुछ क्षेत्रो में माँ गौरी की प्रतिमा को हल्दी पाउडर से बनाया जाता है और पूजा के दौरान उस प्रतिमा को भगवान गणेश की मूर्ति के साथ रखा जाता है। कुछ भागो में प्रतिमा को विविध सामग्री का उपयोग कर बनाया जाता है और फिर उसे भगवान गणेश की मूर्ति के साथ रखा जाता है। आज हम यहाँ गणेश चतुर्थी के समय मनाई जाने वाली गौरी पूजा के कुछ पारंपरिक रीती-रिवाजो के बारे में जानेंगे।



गणेश चतुर्थी के समय मनाई जाने वाली गौरी पूजा से जुडी पौराणिक कथा:story of Gauri


गौरी, माँ पार्वती का ही एक नाम है, जो भगवान शिव की पत्नी और भगवान गणेश की माँ थी। एक बार माँ गौरी स्नान करने के लिए गयी। प्रथाओ के अनुसार माँ गौरी स्नान करने समय अपने शरीर पर हल्दी लगाती थी। इसके बाद उनके शरीर के मैल से उन्होंने एक छोटे बालक को जन्म दिया। और जब माँ पार्वती स्नान कर रही थी तो उन्होंने उस बालक को द्वार की रखवाली करने को कहा और साथ ही आदेश दिया की वह किसी को भी भीतर न आने दे।


जब भगवान शिव माँ पार्वती से मिलने आए तो उस बालक ने भगवान शिव को भीतर जाने से रोका भी। छोटे बालक को रोता हुआ देख भगवान शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल से बालक का सिर काट दिया। इसके बाद जब माँ पार्वती ने भगवान शिव को बालक के बारे में विस्तृत बताया तो भगवान शिव को अपनी गलती का एहसास हो चूका था। इसके बाद माँ पार्वती को खुश करने के लिए उन्होंने बालक को नया जीवन देने के लिए उसपर गजमुख लगाया। और इस प्रकार भगवान गणेश की उत्पत्ति हुई।


नया जीवन देने के साथ-साथ भगवान शिव ने उन्हें अपनी सेना का प्रजापति भी घोषित किया। कहा जाता है की उसी दिन से उस दिन को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। चूँकि माँ पार्वती (गौरी) ने ही भगवान गणेश को जन्म दिया है, इसीलिए गणेश चतुर्थी के समय गौरी पूजा का विशेष महत्त्व होता है। साथ ही हल्दी से मा गौरी की प्रतिमा बनाए जाने का भी यही एक कारण है।


गणेश उत्सव एकमात्र ऐसा त्यौहार है जब माँ और पुत्र दोनों को एकसाथ पूजा जाता है।


माँ पार्वती को भारत के कुछ भागो में भगवान गणेश की माँ जबकि पुणे में देवी गौरी को भगवान गणेश की बहन माना जाता है, लेकिन गणेश चतुर्थी के समय लोग श्रद्धा और अपार भक्ति के साथ देवी गौरी की पूजा करते है।


भक्तो का ऐसा मानना है की घर में माँ गौरी के आने से घर में सुख-शांति, समृद्धि और खुशियाँ बनी रहती है।


देवी गौरी को तीन दिनों तक पूजा जाता है- पहले दिन उनकी स्थापना की जाती है, दुसरे दिन सत्यनारायण पूजा और तीसरे दिन देवी गौरी का विसर्जन किया जाता है।


गौरी पूजा की तैयारियां गणपति उत्सव के साथ ही शुरू हो जाती है, रंगोली की सहायता से महिलाये घर के मुख्य द्वार पर देवी के पदचिन्ह भी बनाती है और फिर देवी गौरी की प्रतिमा (मूर्ति) को भी घर लाती है।


फिर मुहूर्त देखकर देवी को नैवेद्य चढ़ाया जाता है और परंपराओ के अनुसार पर आरती की जाती है और लोग देवी गौरी से प्रार्थना करने लगते है।



गणेश चतुर्थी के समय मनाई जाने वाली गौरी पूजा के बारे में कुछ रोचक बाते: Gauri Ganpati Festival Information


• गणेश चतुर्थी के समय महाराष्ट्र राज्य के बहुत से घरो में गौरी गणेश की पूजा की जाती है। हर साल गौरी स्थापना अगस्त – सितम्बर के बिच में होती हैं की और स्थापना के पाँच दिन बाद गणपति विसर्जन किया जाता है।
• गौरी को माँ पार्वती का अवतार माना जाता है, जो भगवान गणेश की माँ थी। जबकि महाराष्ट्र में ऐसा माना जाता है की गौरी भगवान गणेश की बहन है जो उनसे मिलने के लिए आती है। घर में माँ गौरी का आना घर की सुख, शांति, स्वास्थ, समृद्धि और खुशियों को दर्शाता है। जबकि गौरी की स्थापना भी माँ गौरी की दो प्रतिमाओ के साथ की जाती है।
• गणेश चतुर्थी के समय माँ गौरी की प्रतिमाओ को गणेश उत्सव के दो दिन बाद घर पर लाया जाता है। वह दिन दिनों तक घर में रहती है। इसके दुसरे दिन सत्यनारायण पूजा का आयोजन किया जाता है और तीसरे दिन उन्हें पानी में बहा दिया जाता है।
• किंवदंतियों के अनुसार दो बहनों के रूप में माँ गौरी हर साल गणेशजी के घर पर आती है। भारत के कुछ राज्यों में माँ गौरी को माँ लक्ष्मी की उपासना भी समझा जाता है।
• कर्नाटक में गौरी को भगवान गणेश की माँ समझा जाता है और गौरी पूजा का आयोजन गणेश चतुर्थी के एक दिन पहले ही किया जाता है।
• पश्चिम बंगाल में माँ सरस्वती और माँ लक्ष्मी को भगवान गणेश की बहन माना जाता है और इन सभी को माँ दुर्गा की संतान माना जाता है।


पढ़िए यहाँ और रोचक जानकारी

Gauri ganesh puja mantra Gauri Ganpati Festival Information


भगवान् गणेश का ध्यान


गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारूभक्षणम्।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम् ।।


भगवती गौरी का ध्यान


नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम: ।
नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता:प्रणता:स्म ताम् ।।
श्रीगणेशाम्बिकाभ्यां नम:, ध्यानं समर्पयामि ।

गुरुवार, 29 अगस्त 2019

गणेश चतुर्थी की पूरी जानकारी



गणेश चतुर्थी की पूरी जानकारी


गणेश चतुर्थी की पूरी जानकारी: शिवजी और पार्वती के पुत्र हैं। उनका वाहन डिंक नामक मूषक है। गणों के स्वामी होने के कारण उनका एक नाम गणपति भी है। ज्योतिष में इनको केतु का देवता माना जाता है और जो भी संसार के साधन हैं, उनके स्वामी श्री गणेशजी हैं। हाथी जैसा सिर होने के कारण उन्हें गजानन भी कहते हैं। गणेश जी का नाम हिन्दू शास्त्रो के अनुसार किसी भी कार्य के लिये पहले पूज्य है। इसलिए इन्हें प्रथमपूज्य भी कहते है। गणेश कि उपसना करने वाला सम्प्रदाय गाणपत्य कहलाता है।


”वक्र तुंड महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभ:। निर्विघ्नं कुरु मे देव शुभ कार्येषु सर्वदा”

शारिरिक संरचना


गणपति आदिदेव हैं जिन्होंने हर युग में अलग अवतार लिया। उनकी शारीरिक संरचना में भी विशिष्ट व गहरा अर्थ निहित है। शिवमानस पूजा में श्री गणेश को प्रणव (ॐ) कहा गया है। इस एकाक्षर ब्रह्म में ऊपर वाला भाग गणेश का मस्तक, नीचे का भाग उदर, चंद्रबिंदु लड्डू और मात्रा सूँड है।


चारों दिशाओं में सर्वव्यापकता की प्रतीक उनकी चार भुजाएँ हैं। वे लंबोदर हैं क्योंकि समस्त चराचर सृष्टि उनके उदर में विचरती है। बड़े कान अधिक ग्राह्यशक्ति व छोटी-पैनी आँखें सूक्ष्म-तीक्ष्ण दृष्टि की सूचक हैं। उनकी लंबी नाक (सूंड) महाबुद्धित्व का प्रतीक है।



गणपति जी के 12 नाम और उनके अर्थ – Lord Ganesha Names with Meaning


गणपति बप्पा को अलग-अलग राज्यों में 12 अलग-अलग नामों से जाना जाता है । नारद पुराण में भगवान गणेश जी के 12 नामों का उल्लेख किया गया है जो कि इस प्रकार है –


समुख – सुंदर मुख वाले
एकदंत – एक दंत वाले
कपिल – कपिल वर्ण वाले
गजकर्ण – हाथी के कान वाले
लंबोदर- लंबे पेट वाले
विकट – विपत्ति का नाश करने वाले
विनायक – न्याय करने वाले
धूम्रकेतू- धुंए के रंग वाले पताका वाले
गणाध्यक्ष- गुणों और देवताओं के अध्यक्ष
भालचंद्र – सर पर चंद्रमा धारण करने वाले
गजानन – हाथी के मुख वाले
विघ्नाशक- विघ्न को खत्म करने वाले


पिता- भगवान शंकर
माता- भगवती पार्वती
भाई- श्री कार्तिकेय (बड़े भाई)
बहन- -अशोकसुन्दरी
पत्नी- दो (१) ऋद्धि (२) सिद्धि (दक्षिण भारतीय संस्कृति में गणेशजी ब्रह्मचारी रूप में दर्शाये गये हैं)
पुत्र- दो 1. शुभ 2. लाभ
प्रिय भोग (मिष्ठान्न)- मोदक, लड्डू
प्रिय पुष्प- लाल रंग के
प्रिय वस्तु- दुर्वा (दूब), शमी-पत्र
अधिपति- जल तत्व के
प्रमुख अस्त्र- पाश, अंकुश
वाहन - मूषक


गणेश चतुर्थी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है। यह त्यौहार भारत के विभिन्न भागों में मनाया जाता है किन्तु महाराष्ट्र में बडी़ धूमधाम से मनाया जाता है। पुराणों के अनुसार इसी दिन गणेश का जन्म हुआ था।गणेश चतुर्थी पर हिन्दू भगवान गणेशजी की पूजा की जाती है। कई प्रमुख जगहों पर भगवान गणेश की बड़ी प्रतिमा स्थापित की जाती है। इस प्रतिमा का नो दिन तक पूजन किया जाता है। बड़ी संख्या में आस पास के लोग दर्शन करने पहुँचते है। नो दिन बाद गाजे बाजे से श्री गणेश प्रतिमा को किसी तालाब इत्यादि जल में विसर्जित किया जाता है।


शिवपुराण में भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को मंगलमूर्ति गणेश की अवतरण-तिथि बताया गया है जबकि गणेशपुराण के मत से यह गणेशावतार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुआ था। गण + पति = गणपति। संस्कृतकोशानुसार ‘गण’ अर्थात पवित्रक। ‘पति’ अर्थात स्वामी, ‘गणपति’ अर्थात पवित्रकों के स्वामी।



श्री गणेश चतुर्थी कब मनाई जाती है ? – When is Ganesh Chaturthi Celebrated in India


भारत में हिन्दूओं का मुख्य त्यौहार गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास ( अगस्त या सितंबर ) की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। गणपत गणेश के जन्मोत्सव के रूप में गणेश चतुर्थी का त्योहार पूरे देश में हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है।


गणेश चतुर्थी में गणेश महोत्सव का आयोजन किया जाता है। जगह-जगह मिट्टी से बनी गणेश जी की सुंदर प्रतिमा की प्रतिष्ठा की जाती है। ये महोत्सव 11 दिन तक या फिर अनंत चतुदर्शी के दिन तक चलता है। कुछ लोग अपने घरों में भी गणेश जी की प्रतिमा रखते हैं और 11 वें दिन गणेश प्रतिमा का धूमधाम से विर्सजन करते हैं।


महाराष्ट्र में गणेश उत्सव बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। गणेश पूजा के दौरान कपूर, लाल चंदन, लाल फूल, नारियल, गुड़, मोदक और दुरवा घास चढ़ाने की प्रथा है। गणेश भगवान माता पार्वती और भगवान शिव के पुत्र हैं। ये बुद्धि और समृद्धि के भगवान माने जाते हैं।


गणेश चतुर्थी के दिन लोग सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और साफ कपड़े पहनकर गणपत गणेश की पूजा-अर्चना करते हैं साथ ही गणपति बप्पा को उनका प्रिय मोदक का भोग लगाते हैं।


भगवान गणेश जी के लिए स्वादिष्ट व्यंजन बनाते हैं और मंत्रोच्चारण कर, गणेश जी की पूजा-अर्चना आरती गाकर करते हैं। हिन्दू धर्म के लोग अपनी रीति-रिवाजों के अनुसार भक्ति गीत भी गाते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।


गजानन के पूजन से भक्तों की सभी बाधाएं दूर हो जाती है और कष्टों का निवारण होता है साथ ही जो लोग विनायक जी की आराधना करते हैं उनका जीवन खुशियां से भर जाता है। गणपति बाप्पा को विघ्नहारी भी कहा जाता है क्योंकि गणपति बाप्पा विघ्नहारी और मंगलकारी हैं। उनकी पूजा मातृ से ही भक्तों के सारे विघ्न दूर हो जाते हैं।



गणेश उत्सव को लेकर खास तैयारी –


गणेश चतुर्थी का त्योहार आने के कई दिन से पहले से ही बाजारों में इसकी रौनक दिखने लगती है। बाजारों में दुकानें सुंदर-सुंदर गणेश प्रतिमाएं से सज जाती हैं। बड़ी संख्या में लोग खासकर महाराष्ट्र में अपने घरों में मूर्ति की स्थापना करते हैं और फिर अनंत चतुर्दशी वाले दिन गणेश प्रतिमा का विर्सजन करते हैं।


गणेश उत्सव की तैयारियों में लोग कई दिन पहले से ही जुट जाते हैं। जगह-जगह भव्य गणेश पंडालों का आयोजन किया जाता है, जिसमें पूरा विधि-विधान के साथ गणेश प्रतिमा स्थापित की जाती हैं।


इन दिनों भंडारों का भी आयोजन करवाए जाते हैं। और खास तरह की साज-सजावट भी होती है इस त्योहार में मानो पूरा माहौल भक्तिमय हो जाता है। गणेश विसर्जन के दौरान भक्ति का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। भक्त गण अपने गणपति जी को समुंदर और नदी में विर्सजित करते हैं इस दौरान


”गणपति बप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया”


के जयकारों के साथ अपने बप्पा को विदाई देते हैं। इस तरह अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश पूजा का समापन होता है।


गणेश पूजन और उपवास रखने से मिलता है 101 गुना फल और सुख-समृद्धि


गणपति बप्पा का जनमोत्सव गणेश चतुर्थी को विनायक चतर्थी के नाम से भी जाना जाता है। जबकि भविष्य पुराण के मुताबिक शिवा, संज्ञा और सुधा यह तीन चतुर्थी होती है इनमें भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को संज्ञा कहते हैं।


ऐसी भी मान्यता है कि इसमें स्नान और उपवास करने से 101 गुना फल मिलता है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मध्यान्ह में भगवान गणेश का जन्म हुआ था इसी कारण यह तिथि महक नाम से भी जानी जाती है। इस दिन भगवान गणपति की पूजा, उपासना व्रत, कीर्तन और जागरण करने से भक्तों को मनवांछित फल की प्राप्ति होती है।


गणेश चतुर्थी की पूरी जानकारी

पौराणिक कथा Mythology Behind Shri Ganesha Chaturthi


एक बार महादेवजी स्नान करने के लिए भोगावती गए। उनके जाने के पश्चात पार्वती ने अपने तन के मैल से एक पुतला बनाया और उसका नाम 'गणेश' रखा। पार्वती ने उससे कहा- हे पुत्र! तुम एक मुगदल लेकर द्वार पर बैठ जाओ। मैं भीतर जाकर स्नान कर रही हूँ। जब तक मैं स्नान न कर लूं, तब तक तुम किसी भी पुरुष को भीतर मत आने देना।


भोगावती में स्नान करने के बाद जब भगवान शिवजी आए तो गणेशजी ने उन्हें द्वार पर रोक लिया। इसे शिवजी ने अपना अपमान समझा और क्रोधित होकर उनका सिर धड़ से अलग करके भीतर चले गए। पार्वती ने उन्हें नाराज देखकर समझा कि भोजन में विलंब होने के कारण महादेवजी नाराज हैं। इसलिए उन्होंने तत्काल दो थालियों में भोजन परोसकर शिवजी को बुलाया।


तब दूसरा थाल देखकर तनिक आश्चर्यचकित होकर शिवजी ने पूछा- यह दूसरा थाल किसके लिए हैं? पार्वती जी बोलीं- पुत्र गणेश के लिए हैं, जो बाहर द्वार पर पहरा दे रहा है।


यह सुनकर शिवजी और अधिक आश्चर्यचकित हुए। तुम्हारा पुत्र पहरा दे रहा है? हाँ नाथ! क्या आपने उसे देखा नहीं? देखा तो था, किन्तु मैंने तो अपने रोके जाने पर उसे कोई उद्दण्ड बालक समझकर उसका सिर काट दिया। यह सुनकर पार्वती जी बहुत दुःखी हुईं। वे विलाप करने लगीं। तब पार्वती जी को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया। पार्वती जी इस प्रकार पुत्र गणेश को पाकर बहुत प्रसन्न हुई। उन्होंने पति तथा पुत्र को प्रीतिपूर्वक भोजन कराकर बाद में स्वयं भोजन किया।


यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुई थी। इसीलिए यह तिथि पुण्य पर्व के रूप में मनाई जाती है।



कथा


शिवपुराणके अन्तर्गत रुद्रसंहिताके चतुर्थ (कुमार) खण्ड में यह वर्णन है कि माता पार्वती ने स्नान करने से पूर्व अपनी मैल से एक बालक को उत्पन्न करके उसे अपना द्वारपालबना दिया। शिवजी ने जब प्रवेश करना चाहा तब बालक ने उन्हें रोक दिया। इस पर शिवगणोंने बालक से भयंकर युद्ध किया परंतु संग्राम में उसे कोई पराजित नहीं कर सका। अन्ततोगत्वा भगवान शंकर ने क्रोधित होकर अपने त्रिशूल से उस बालक का सर काट दिया। इससे भगवती शिवा क्रुद्ध हो उठीं और उन्होंने प्रलय करने की ठान ली। भयभीत देवताओं ने देवर्षिनारद की सलाह पर जगदम्बा की स्तुति करके उन्हें शांत किया। शिवजी के निर्देश पर विष्णुजीउत्तर दिशा में सबसे पहले मिले जीव (हाथी) का सिर काटकर ले आए। मृत्युंजय रुद्र ने गज के उस मस्तक को बालक के धड पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। माता पार्वती ने हर्षातिरेक से उस गजमुखबालक को अपने हृदय से लगा लिया और देवताओं में अग्रणी होने का आशीर्वाद दिया। ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित करके अग्रपूज्यहोने का वरदान दिया। भगवान शंकर ने बालक से कहा-गिरिजानन्दन! विघ्न नाश करने में तेरा नाम सर्वोपरि होगा। तू सबका पूज्य बनकर मेरे समस्त गणों का अध्यक्ष हो जा। गणेश्वर!तू भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को चंद्रमा के उदित होने पर उत्पन्न हुआ है। इस तिथि में व्रत करने वाले के सभी विघ्नों का नाश हो जाएगा और उसे सब सिद्धियां प्राप्त होंगी। कृष्णपक्ष की चतुर्थी की रात्रि में चंद्रोदय के समय गणेश तुम्हारी पूजा करने के पश्चात् व्रती चंद्रमा को अ‌र्घ्यदेकर ब्राह्मण को मिष्ठान खिलाए। तदोपरांत स्वयं भी मीठा भोजन करे। वर्षपर्यन्तश्रीगणेश चतुर्थी का व्रत करने वाले की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है।



गणेश जी की पूजा कुछ भी शुरू करने से पहले क्यों की जाती है?


शिवजी ने साथ ही गणेश जी को आशीर्वाद देते हुए कहा की जहाँ भी पृथ्वी पर कुछ नया और अच्छे की शुरुवात की जाएगी वहां गणेश का नाम लिए जायेगा और गणेश की आराधना करने वाले व्यक्ति का सभी दुःख दूर होगा। इसीलिए हम भारतीय कुछ भी अच्छा और नया शुरू करने जैसे विवाह, कोई नया व्यापार शुरू करने से पहले, नया घर प्रवेश, या जब कोई शिशु प्रथम बार स्कूल जाने से पूर्व गणेश जी की पूजा करते हैं और उनसे सुख-शांति की कामना करते हैं।



चंद्र दर्शन दोष से बचाव


प्रत्येक शुक्ल पक्ष चतुर्थी को चन्द्रदर्शन के पश्चात्‌ व्रती को आहार लेने का निर्देश है, इसके पूर्व नहीं। किंतु भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को रात्रि में चन्द्र-दर्शन (चन्द्रमा देखने को) निषिद्ध किया गया है।


जो व्यक्ति इस रात्रि को चन्द्रमा को देखते हैं उन्हें झूठा-कलंक प्राप्त होता है। ऐसा शास्त्रों का निर्देश है। यह अनुभूत भी है। इस गणेश चतुर्थी को चन्द्र-दर्शन करने वाले व्यक्तियों को उक्त परिणाम अनुभूत हुए, इसमें संशय नहीं है। यदि जाने-अनजाने में चन्द्रमा दिख भी जाए तो निम्न मंत्र का पाठ अवश्य कर लेना चाहिए-



भगवान गणेश जी की पूजन- विधि – Ganesh Pooja Vidhi


गणेश जी का पूजन अगर सही विधि से किया जाए तो भक्तों को मन चाहे फल की प्राप्ति होती है। भगवान गणपति की पूजा आराधना की विधि नीचे लिखी गई है –


सबसे पहले स्नान कर लाल वस्त्र पहने क्योंकी लाल कपड़ा भगवान गणेश जी का सबसे ज्यादा प्रिय है।
गणेश चतुर्थी की पूजा के लिए एक चौकी पर लाल दुपट्टा बिछा कर उस पर सिंदूर या रोली सज्जित कर आसन बनायें और उसके बीच में गणपति की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें, और गाय के घी से युक्त दीपक जलाएं। पूजा के दौरान गणेश जी का मुख उत्तर या पूर्व दिशा में ही रखें।
ओम देवताभ्यो नमः मंत्र के साथ दीपक का पूजन करें। इसके बाद हाथ जोड़कर भगवान गणेश की प्रतिमा के सम्मुख आवाहन मुद्रा में खड़े हो कर उनका आवाहन करें। और फिर भगवान गणेश जी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा करें। आवाहन एवं प्रतिष्ठापन के बाद भगवान गणेश के आसन के सम्मुख पांच पुष्प अञ्जलि में लेकर छोड़े।
अब गणेश जी का पंचामृत से अभिषेक करें।
पंचामृत में आप सबसे पहले भगवान गणेश जी का अभिषेक पहले दूध से करें, फिर दही से करें, फिर घी से करें और फिर गंगा जल से या शुद्ध जल से करें । इस तरह पंचामृत से गणपति बाप्पा का अभिषेक करें।
अभिषेक करने के बाद गजानन को रोली और कलावा चढ़ाए।
सिंदूर गणेश जी को बेहद प्रिय है इसलिए गणपति बप्पा को सिंदूर अवश्य चढ़ाएं।
भगवान गणेश जी की दो पत्नियां रिद्धि और सिद्धि हैं इसलिए रिद्दि-सिद्धि के रूप में उन्हें दो सुपारी और पान चढ़ाएं।
फल, फूल और हरी घास अथवा दूवा चढ़ाए और फूल में गणेश जी को पीला कनेर बेहद प्रिय है, पीला कनेर चढ़ाएं और दूब चढ़ाएं।
इसके बाद गणेश जी के सबसे प्रिय मिठाई मोदक (लड्डू ) का भोग लगाएं।
इसके बाद सभी परिवारजनों के साथ मिलकर गणेश जी की आरती गाएं।
श्री गणेश जी का मंत्रोच्चारण करें और उन्हें 12 नामों का भी उच्चारण करें।
भगवान गणपति जी के जयकारे लगाएं।


श्री गणेश मंत्र:
ॐ गं गणपतये नम:


ऋद्धि मंत्र:
ॐ हेमवर्णायै ऋद्धये नम:


सिद्धि मंत्र:
ॐ सर्वज्ञानभूषितायै नम:


लाभ मंत्र:
ॐ सौभाग्य प्रदाय धन-धान्ययुक्ताय लाभाय नम:


शुभ मंत्र:
ॐ पूर्णाय पूर्णमदाय शुभाय नम:



गणेश मंत्र GANESH MANTRA


ॐ गंगणपतये नमो नम:
श्री सिध्धीविनायक नमो नम:
अष्टविनायक नमो नम:
गणपती बाप्पा मोरया
ॐ गंगणपतये नमो नम:
श्री सिध्धीविनायक नमो नम:
अष्टविनायक नमो नम:
गणपती बाप्पा मोरया
ॐ गंगणपतये नमो नम:
श्री सिध्धीविनायक नमो नम:
अष्टविनायक नमो नम:
गणपती बाप्पा मोरया
ॐ गंगणपतये नमो नम:
श्री सिध्धीविनायक नमो नम:
अष्टविनायक नमो नम:
गणपती बाप्पा मोरया
ॐ गंगणपतये नमो नम:
श्री सिध्धीविनायक नमो
अष्टविनायक नमो नम:
गणपती बाप्पा मोरया
ॐ गंगणपतये नमो नम:
श्री सिध्धीविनायक नमो
अष्टविनायक नमो नम:
गणपती बाप्पा मोरया
ॐ गंगणपतये नमो नम:
श्री सिध्धीविनायक नमो नम:
अष्टविनायक नमो नम:
गणपती बाप्पा मोरया
ॐ गं गणपतये नमो नम:
श्री सिध्धीविनायक नमो
अष्टविनायक नमो नम:
गणपती बाप्पा मोरया
ॐ गंगणपतये नमो नम:
श्री सिध्धीविनायक नमो
अष्टविनायक नमो नम:
गणपती बाप्पा मोरया
ॐ गंगणपतये नमो नम:
श्री सिध्धीविनायक नमो नम:
अष्टविनायक नमो नम:
गणपती बाप्पा मोरया
ॐ गंगणपतये नमो नम:
श्री सिध्धीविनायक नमो नम:
अष्टविनायक नमो नम:
गणपती बाप्पा मोरया
ॐ गंगणपतये नमो नम:
श्री सिध्धीविनायक नमो नम:
अष्टविनायक नमो नम:
गणपती बाप्पा मोरया

गणेश चतुर्थी की पूरी जानकारी

अनंत चतुर्दशी


इस दिन अनन्त भगवान की पूजा करके संकटों से रक्षा करने वाला अनन्तसूत्रबांधा जाता है। कहा जाता है कि जब पाण्डव जुएमें अपना सारा राज-पाट हारकर वन में कष्ट भोग रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अनन्तचतुर्दशीका व्रत करने की सलाह दी थी। धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों तथा द्रौपदीके साथ पूरे विधि-विधान से यह व्रत किया तथा अनन्तसूत्रधारण किया। अनन्तचतुर्दशी-व्रतके प्रभाव से पाण्डव सब संकटों से मुक्त हो गए।

विधि


व्रत-विधान-व्रतकर्ता प्रात:स्नान करके व्रत का संकल्प करें। शास्त्रों में यद्यपि व्रत का संकल्प एवं पूजन किसी पवित्र नदी या सरोवर के तट पर करने का विधान है, तथापि ऐसा संभव न हो सकने की स्थिति में घर में पूजागृह की स्वच्छ भूमि पर कलश स्थापित करें। कलश पर शेषनाग की शैय्यापर लेटे भगवान विष्णु की मूíत अथवा चित्र को रखें। उनके समक्ष चौदह ग्रंथियों (गांठों) से युक्त अनन्तसूत्र (डोरा) रखें। इसके बाद ॐ अनन्तायनम: मंत्र से भगवान विष्णु तथा अनंतसूत्रकी षोडशोपचार-विधिसे पूजा करें। पूजनोपरांतअनन्तसूत्रको मंत्र पढकर पुरुष अपने दाहिने हाथ और स्त्री बाएं हाथ में बांध लें-

अनंन्तसागरमहासमुद्रेमग्नान्समभ्युद्धरवासुदेव।

अनंतरूपेविनियोजितात्माह्यनन्तरूपायनमोनमस्ते॥

अनंतसूत्रबांध लेने के पश्चात किसी ब्राह्मण को नैवेद्य (भोग) में निवेदित पकवान देकर स्वयं सपरिवार प्रसाद ग्रहण करें। पूजा के बाद व्रत-कथा को पढें या सुनें। कथा का सार-संक्षेप यह है- सत्ययुग में सुमन्तुनाम के एक मुनि थे। उनकी पुत्री शीला अपने नाम के अनुरूप अत्यंत सुशील थी। सुमन्तु मुनि ने उस कन्या का विवाह कौण्डिन्यमुनि से किया। कौण्डिन्यमुनि अपनी पत्नी शीला को लेकर जब ससुराल से घर वापस लौट रहे थे, तब रास्ते में नदी के किनारे कुछ स्त्रियां अनन्त भगवान की पूजा करते दिखाई पडीं। शीला ने अनन्त-व्रत का माहात्म्य जानकर उन स्त्रियों के साथ अनंत भगवान का पूजन करके अनन्तसूत्रबांध लिया। इसके फलस्वरूप थोडे ही दिनों में उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया।

गणेश चतुर्थी की पूरी जानकारी

कथा


एक दिन कौण्डिन्य मुनि की दृष्टि अपनी पत्नी के बाएं हाथ में बंधे अनन्तसूत्रपर पडी, जिसे देखकर वह भ्रमित हो गए और उन्होंने पूछा-क्या तुमने मुझे वश में करने के लिए यह सूत्र बांधा है? शीला ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया-जी नहीं, यह अनंत भगवान का पवित्र सूत्र है। परंतु ऐश्वर्य के मद में अंधे हो चुके कौण्डिन्यने अपनी पत्नी की सही बात को भी गलत समझा और अनन्तसूत्रको जादू-मंतर वाला वशीकरण करने का डोरा समझकर तोड दिया तथा उसे आग में डालकर जला दिया। इस जघन्य कर्म का परिणाम भी शीघ्र ही सामने आ गया। उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई। दीन-हीन स्थिति में जीवन-यापन करने में विवश हो जाने पर कौण्डिन्यऋषि ने अपने अपराध का प्रायश्चित करने का निर्णय लिया। वे अनन्त भगवान से क्षमा मांगने हेतु वन में चले गए। उन्हें रास्ते में जो मिलता वे उससे अनन्तदेवका पता पूछते जाते थे। बहुत खोजने पर भी कौण्डिन्यमुनि को जब अनन्त भगवान का साक्षात्कार नहीं हुआ, तब वे निराश होकर प्राण त्यागने को उद्यत हुए। तभी एक वृद्ध ब्राह्मण ने आकर उन्हें आत्महत्या करने से रोक दिया और एक गुफामें ले जाकर चतुर्भुजअनन्तदेवका दर्शन कराया।

भगवान ने मुनि से कहा-तुमने जो अनन्तसूत्रका तिरस्कार किया है, यह सब उसी का फल है। इसके प्रायश्चित हेतु तुम चौदह वर्ष तक निरंतर अनन्त-व्रत का पालन करो। इस व्रत का अनुष्ठान पूरा हो जाने पर तुम्हारी नष्ट हुई सम्पत्ति तुम्हें पुन:प्राप्त हो जाएगी और तुम पूर्ववत् सुखी-समृद्ध हो जाओगे। कौण्डिन्यमुनिने इस आज्ञा को सहर्ष स्वीकार कर लिया। भगवान ने आगे कहा-जीव अपने पूर्ववत् दुष्कर्मोका फल ही दुर्गति के रूप में भोगता है। मनुष्य जन्म-जन्मांतर के पातकों के कारण अनेक कष्ट पाता है। अनन्त-व्रत के सविधि पालन से पाप नष्ट होते हैं तथा सुख-शांति प्राप्त होती है। कौण्डिन्यमुनि ने चौदह वर्ष तक अनन्त-व्रत का नियमपूर्वक पालन करके खोई हुई समृद्धि को पुन:प्राप्त कर लिया।

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गणपतिजी का बीज मंत्र 'गं' है। इनसे युक्त मंत्र- 'ॐ गं गणपतये नमः' का जप करने से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। षडाक्षर मंत्र का जप आर्थिक प्रगति व समृद्धि प्रदायक है।

- ॐ वक्रतुंडाय हुम्‌
किसी के द्वारा नेष्ट के लिए की गई क्रिया को नष्ट करने के लिए, विविध कामनाओं की पूर्ति के लिए उच्छिष्ट गणपति की साधना करना चाहिए। इनका जप करते समय मुंह में गुड़, लौंग, इलायची, पताशा, ताम्बुल, सुपारी होना चाहिए। यह साधना अक्षय भंडार प्रदान करने वाली है। इसमें पवित्रता-अपवित्रता का विशेष बंधन नहीं है।

उच्छिष्ट गणपति का मंत्र

- ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा
आलस्य, निराशा, कलह, विघ्न दूर करने के लिए विघ्नराज रूप की आराधना का यह मंत्र जपें -
- गं क्षिप्रप्रसादनाय नम:

विघ्न को दूर करके धन व आत्मबल की प्राप्ति के लिए हेरम्ब गणपति का मंत्र जपें -

- 'ॐ गं नमः'

रोजगार की प्राप्ति व आर्थिक वृद्धि के लिए लक्ष्मी विनायक मंत्र का जप करें-

- ॐ श्रीं गं सौभ्याय गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।
विवाह में आने वाले दोषों को दूर करने वालों को त्रैलोक्य मोहन गणेश मंत्र का जप करने से शीघ्र विवाह व अनुकूल जीवनसाथी की प्राप्ति होती है-

- ॐ वक्रतुण्डैक दंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं गणपते वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।

इन मंत्रों के अतिरिक्त गणपति अथर्वशीर्ष, संकटनाशन गणेश स्तोत्र, गणेशकवच, संतान गणपति स्तोत्र, ऋणहर्ता गणपति स्तोत्र, मयूरेश स्तोत्र, गणेश चालीसा का पाठ करने से गणेशजी की कृपा प्राप्त होती है।

गणेश चतुर्थी की पूरी जानकारी

श्री गणपति आरती Ganapati Aarti: Sukhkarta Dukhharta


।। श्री गणेशाय नमः ।।

सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची |
नुरवी पूर्वी प्रेम कृपा जयाची |
सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची |
कंठी झळके माळ मुक्ताफळाची || १ ||

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती |
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ||
रत्नखचित फरा तूज गौरीकुमरा |
चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा |
हिरे जडित मुकुट शोभतो बरा |
रुणझुणती नुपुरे चरणी घागरिया || 2 ||

लंबोदर पितांबर फनी वरवंदना |
सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना |
दास रामाचा वाट पाहे सदना |
संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवंदना |
जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती |
दर्शनमात्रे मनकामना पुरती || ३ ||

कुमकुमार्चन पूजा की पूरी जानकारी 

बुधवार, 28 अगस्त 2019

आप सभी को पता होगा की  किस तरह रानू मंडल रातो रात स्टार बन गयी। हाल ही में पश्चिम बंगाल के राणाघाट रेलवे स्टेशन पर रानू मंडल 'एक प्यार का नगमा है' गाना गाकर रातों रात सुपरस्टार बन गई।  बॉलीवुड सिंगर हिमेश रेशमिया ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर रानू मंडल का एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें रानू मंडल उनकी फिल्म 'हैप्पी हार्डी एंड हीर' का गाना 'तेरी मेरी कहानी' गाते हुए नजर आयीं। अब लोगों के बीच इस बात की चर्चा है कि रेलवे स्टेशन पर गाना गाकर अपना गुजारा करनेवाली रानू मंडल ने फिल्म 'हैप्पी हार्डी एंड हीर' में गाना गाने के लिए हिमेश रेशमिया से कितनी फीस ली होगी!


खबरों की मानें, तो हिमेश ने रानू मंडल को 'हैप्पी हार्डी एंड हीर' का गाना 'तेरी मेरी कहानी' गाने के लिए लगभग 6-7 लाख रुपये ऑफर किये. लेकिन रानू ने ये पैसे लेने के लिए इनकार कर दिया. बताया जाता है कि इसके बाद हिमेश ने रानू काे जबरदस्ती पैसे दिये और कहा कि बॉलीवुड में तुम्हें सुपरस्टार बनने से कोई नहीं रोक सकता है.

 

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मंगलवार, 27 अगस्त 2019

हरतालिका पूजा


हरतालिका पूजा की पूरी जानकारी


हरतालिका पूजा की पूरी जानकारी : हरतालिका व्रत को हरतालिका तीज या तीजा भी कहते हैं। यह व्रत श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हस्त नक्षत्र के दिन होता है। इस दिन कुमारी और सौभाग्यवती स्त्रियाँ गौरी-शंकर की पूजा करती हैं।


सौभाग्यवती स्त्रियां अपने सुहाग को अखण्ड बनाए रखने और अविवाहित युवतियां मन मुताबिक वर पाने के लिए हरितालिका तीज का व्रत करती हैं। सर्वप्रथम इस व्रत को माता पार्वती ने भगवान शिव शंकर के लिए रखा था। इस दिन विशेष रूप से गौरी−शंकर का ही पूजन किया जाता है। इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ही उठ जाती हैं और नहा धोकर पूरा श्रृंगार करती हैं। पूजन के लिए केले के पत्तों से मंडप बनाकर गौरी−शंकर की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके साथ पार्वती जी को सुहाग का सारा सामान चढ़ाया जाता है। रात में भजन, कीर्तन करते हुए जागरण कर तीन बार आरती की जाती है और शिव पार्वती विवाह की कथा सुनी जाती है।



हरितालिका नाम पड़ने के पीछे का कारण


हरतालिका दो शब्दों से बना है, हरित और तालिका. हरित का अर्थ है हरण करना और तालिका अर्थात सखी. यह पर्व भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है, जिस कारण इसे तीज कहते है. इस व्रत को हरितालिका इसलिए कहा जाता है, क्योकि पार्वती की सखी (मित्र) उन्हें पिता के घर से हरण कर जंगल में ले गई थी.


पूर्वकाल में जब दक्ष कन्या सती पिता के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव की उपेक्षा होने पर भी पहुंच गई, तब उन्हें बड़ा अपमान सहना पड़ा। जिसके कारण वह इतनी दुखी हुई कि खुद को योगाग्रि से भस्म कर दिया। जो बाद में आदिशक्ति मैना और हिमालय की तपस्या से खुश होकर उनके घर में उनक् घर में पुत्री के रुप में जन्म लिया। जिनका नाम पार्वती रखा गया।


माना जाता है कि उनके पुर्नजन्म की स्मृति उनके दिमाग में बनी रही। बाल्यावस्था में ही पार्वती भगवान शंकर की आराधना करने लगी और उन्हें पति रूप में पाने के लिए घोर तप करने लगीं। यह देखकर उनके पिता हिमालय बहुत दु:खी हुए। हिमालय ने पार्वती का विवाह भगवान विष्णु से करना चाहा, लेकिन पार्वती भगवान शंकर से विवाह करना चाहती थी।
पार्वती ने यह बात अपनी सखी को बताई। वह सखी पार्वती को एक घने जंगल में ले गई। पार्वती ने जंगल में मिट्टी का शिवलिंग बनाकर कठोर तप किया, जिससे भगवान शंकर प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रकट होकर पार्वती से वरदान मांगने को कहा। पार्वती ने भगवान शंकर से अपनी धर्मपत्नी बनाने का वरदान मांगा, जिसे भगवान शंकर ने स्वीकार किया। इस तरह माता पार्वती को भगवान शंकर पति के रूप में प्राप्त हुए।


इसी तरह इसका नाम हरितालिका तीज पड़ा। जिसके कारण इस दिन कुवांरी कन्याएं पार्वती मां की तरह पूजा-पाठ कर अच्छ वर की कामना करती हैं।


हरतालिका पूजा की पूरी जानकारी

व्रत की अनिवार्यता


इस व्रत की पात्र कुमारी कन्यायें या सुहागिन महिलाएं दोनों ही हैं परन्तु एक बार व्रत रखने बाद जीवन पर्यन्त इस व्रत को रखना पड़ता है। यदि व्रती महिला गंभीर रोगी हालात में हो तो उसके वदले में दूसरी महिला या उसका पति भी इस व्रत को रख सकने का विधान है।ज्यादातर यह व्रत उत्तरप्रदेश और बिहार के लोग मनातें हैं. महाराष्ट्र में भी इस व्रत का पालन किया जाता है क्योंकि अगले दिन ही गणेश चतुर्थी के दिन गणेश स्थापना की जाती है



हरतालिका तीज पूजा विधि


हरतालिका तीज पर सुबह और शाम दोनों समय की पूजा को शुभ माना जाता है. हरतालिका पर पूजा करने से पहले भक्त स्नान आदि करने के बाद नए वस्त्र पहन ले. फिर मिट्टी से बनी शिव जी औ मां पार्वती की मूर्ति का पूजन करें. अगर ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो दोनों का एक फोटो रखकर भी पूजा कर सकते हैं. पूजा के लिए एक नया कपड़ा बिछाकर उसपर मूर्ति का फोटो रखें और पूजन शुरू करें. सबसे पहले पूजा का संकल्प लें जिसके बाद मां पार्वती और शिव जी को चंदन अर्पित करें. साथ ही धूप, दीप, फूल, मिठाई और बेलपत्र आदि अर्पित करें. जिसके बाद हरतालिका तीज की व्रत कथा सुने या पढ़े.



हरतालिका तीज की पूजन सामग्री :-


हरतालिका पूजन के लिए - गीली काली मिट्टी या बालू रेत। बेलपत्र, शमी पत्र, केले का पत्ता, धतूरे का फल एवं फूल, अकांव का फूल, तुलसी, मंजरी, जनैव, नाडा, वस्त्र, सभी प्रकार के फल एवं फूल पत्ते, फुलहरा (प्राकृतिक फूलों से सजा)।


पार्वती मां के लिए सुहाग सामग्री- मेहंदी, चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, माहौर, बाजार में उपलब्ध सुहाग पुड़ा आदि। श्रीफल, कलश, अबीर, चन्दन, घी-तेल, कपूर, कुमकुम, दीपक, घी, दही, शक्कर, दूध, शहद पंचामृत के लिए।


इस पर्व को पर्यावरण से जोड़कर भी देखा जाता है, क्योंकि इस दिन महिलाएं सावन के बाद आई नई 16 तरह की पत्तियों को शिवजी को चढ़ाकर अपने घर में हर प्रकार की वृद्धि का वर मांगती हैं।



जानिए, कौन सी पत्तियां चढ़ाएं, हर पत्ती से जुड़ा है विशेष आशीर्वाद


बिल्वपत्र : सौभाग्य
तुलसी : चरित्र
जातीपत्र : संतान
सेवंतिका :
दांपत्य सुख
बांस : वंश वृद्धि
देवदार पत्र : ऐश्वर्य
चंपा : सौंदर्य और सेहत
कनेर : यश और सुख


अगस्त्य : वैभव
भृंगराज : पराक्रम


धतूरा : मोक्ष प्राप्ति
आम के पत्ते : मंगल कार्य
अशोक के पत्ते : शांति प्रिय जीवन
पान के पत्ते :
परस्पर प्रेम में वृद्धि
केले के पत्ते : सफलता
शमी के पत्ते धन और समृद्धि


इस प्रकार 16 प्रकार की पत्तियां से षोडश उपचार पूजा करनी चाहिए।



हरतालिका तीज पर क्या करें


निराहार रहकर व्रत करें।
रात्रि जागरण कर भजन करें।
बालू के शिवलिंग की पूजा करें।
सखियों सहित शंकर-पार्वती की पूजा रात्रि में करें।
पत्ते उलटे चढ़ाना चाहिए तथा फूल व फल सीधे चढ़ाना चाहिए।
हरतालिका तीज की कथा गाना अथवा श्रवण करें।


हरतालिका पूजा की पूरी जानकारी

हरतालिका तीज व्रत कथा


पौराणिक कथा के अनुसार, मां पार्वती कई जन्मों से शिव जी को पति के रूप में पाना चाहती थी. इसके लिए मां पार्वती ने हिमालय पर्वत के गंगा तट पर बाल अवस्था में अधोमुखी होकर तपस्या भी की. मां पार्वती ने इस तपस्या के दौरान अन्न और जल ग्रहण नहीं किया. इस दौरान उन्होंने सिर्फ सूखे पत्ते चबाकर ही पूरा तप किया. माता को इस अवस्था में देखकर उनके परिजन बहुत दुखी थे.


एक दिन नारद मुनि विष्णु जी की ओर से पार्वती माता के विवाह का प्रस्ताव लेकर उनके पिता के पास गए. उनके पिता तुंरत मान गए लेकिन जब मां पार्वती को यह ज्ञात हुआ तो उनका मन काफी दुखी हुआ और वे रोने लगीं. मां पार्वती को इस पीड़ा से गुजरता देख एक सखी ने उनकी माता से कारण पूछा. देवी पार्वती की माता ने बताया कि पार्वती शिव जी को पाने के लिए तप कर रही है लेकिन उनके पिता विवाह विष्णु जी से करना चाहते हैं. पूरी बात जानने के बाद सखी ने मां पार्वती को एक वन में जाने की सलाह दी.


मां पार्वती ने सखी की सलाह मानते हुए वन में जाकर शिव जी तपस्या में लीन हो गईं. भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की तृतीया को माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग बनाया और शिव स्तुति करने लगी. मां पार्वती ने रात भर शिव जी का जागरण किया. काफी कठोर तपस्या के बाद शिव जी ने मां पार्वती को दर्शन देकर उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया.


हरतालिका पूजा की पूरी जानकारी

हरतालिका आरती-Hartalika Aarti


जय देवी हरतालिके| सखी पार्वती अबिके|
आरती ओवळीतें| ज्ञानदीपकळिके||
हर अर्धंगी वससी| जासी यज्ञा माहेरासी|
तेथें अपमान पावसी| यज्ञकुंडींत गुप्त होसी||
जय देवी हरतालिके| सखी पार्वती अबिके|
रिघसी हिमाद्रीच्या पोटी| कन्या होसी तू गोमटी|
उग्र तपक्ष्चर्या मोठी| आचरसी उठाउठी||
जय देवी हरतालिके| सखी पार्वती अबिके|
तापपंचाग्रिसाधनें| धूम्रपानें अधोवदनें|
केली बहु उपोषणें| शंभु भ्रताराकारणें||
जय देवी हरतालिके| सखी पार्वती अबिके|
लीला दाखविसी दृष्टी| हें व्रत करिसी लोकांसाठी|
पुन्हा वरिसी धूर्जटी| मज रक्षावें संकटीं||
जय देवी हरतालिके| सखी पार्वती अबिके|
काय वर्ण तव गुण| अल्पमति नारायण|
मातें दाखवीं चरण| चुकवावें जन्म मरण||
जय देवी हरतालिके| सखी पार्वती अबिके|
जय देवी हरतालिके| सखी पार्वती अबिके|
आरती ओवळीतें| ज्ञानदीपकळिके||


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शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

गणपति अथर्वशीर्ष



गणपति अथर्वशीर्ष


Ganapati Atharvashirsha in Hindi

भगवान गणेश बुद्धि, धन, ज्ञान, यश, सम्मान, पद और तमाम भौतिक सुखों को देने वाले देवता के रूप में पूजनीय हैं। भगवान गणेश की प्रसन्नता के लिए शास्त्रों में अनेक जप, मंत्र, पूजा व आरती का महत्व बताया गया है।
इनमें सबसे ज्यादा अहमियत श्रीगणपति अथर्वशीर्ष की मानी जाती है। यह मूलत: भगवान गणेश की वैदिक स्तुति है, जिसमें भगवान गणेश के आवाहन से लेकर ध्यान, नाम से मिलने वाले शुभ फल आदि शामिल है। इस गणपति स्त्रोत का पाठ धार्मिक दृष्टि से सभी दोष से मुक्त करता है, वहीं व्यावहारिक जीवन के कष्टो, दु:खों और बाधाओं से भी रक्षा करता है।
चूंकि यह वेद और संस्कृत भाषा में लिखा गणपति उपासना है। इसलिए अगर संस्कृत भाषा की जानकारी न होने या पढऩे में कठिनाई होने पर आप इसके हिन्दी अनुवाद का पाठ करने पर वहीं शुभ फल पाएंगे, जो आप मूल संस्कृत पाठ से पाते हैं। मंगल की कामना से इसका नियमित पाठ संभव न हो तो बुधवार और चतुर्थी को पाठ जरूर करें। खासतौर पर वर्तमान में जारी गणेश जन्मोत्सव के 10 दिनों में तो एक बार भी श्रीगणपति अथर्वशीर्ष या यहां बताए जा रहे इसके हिन्दी अर्थ को पढ़ना भी भाग्य संवारने वाला माना गया है।


गणपति अथर्वशीर्ष

आठ ब्राह्मणों को सम्यक रीति से ग्राह कराने पर सूर्य के समान तेजस्वी होता है। सूर्य ग्रहण में महानदी में या प्रतिमा के समीप जपने से मंत्र सिद्धि होती है। वह महाविघ्न से मुक्त हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है, वह सर्वज्ञ हो जाता है वह सर्वज्ञ हो जाता है।

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः । भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥


स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः । व्यशेम देवहितं यदायुः ॥


ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः । स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥


स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः । स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥


ॐ तन्मामवतु तद् वक्तारमवतु अवतु माम् अवतु वक्तारम्


ॐ शांतिः । शांतिः ॥ शांतिः॥।



अथ श्री गणपत्यथर्वशीर्ष


ॐ नमस्ते गणपतये।


त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि


त्वमेव केवलं कर्ताऽसि


त्वमेव केवलं धर्ताऽसि


त्वमेव केवलं हर्ताऽसि


त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि


त्व साक्षादात्माऽसि नित्यम्।1।


अर्थ- ॐकाराकृति भगवान गणपति को नमस्कार है। तुम प्रत्यक्ष तत्व हो। तुम्हीं केवल कर्ता हो। तुम्हीं केवल धर्ता हो। तुम्हीं केवल हर्ता हो। निश्चयपूर्वक तुम्हीं इन सब रूपों में विराजमान ब्रह्म हो। तुम साक्षात नित्य आत्मस्वरूप हो।


ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि।2।


मैं ऋत न्याययुक्त बात कहता हूँ। सत्य कहता हूँ।


अव त्व मां। अव वक्तारं।


अव श्रोतारं। अव दातारं।


अव धातारं। अवानूचानमव शिष्यं।


अव पश्चातात। अव पुरस्तात।


अवोत्तरात्तात। अव दक्षिणात्तात्।


अवचोर्ध्वात्तात्।। अवाधरात्तात्।।


सर्वतो माँ पाहि-पाहि समंतात्।3।


अर्थ- तुम मेरी (मुझ शिष्य की) रक्षा करो। वक्ता (आचार्य) की रक्षा करो। श्रोता की रक्षा करो। दाता की रक्षा करो। धाता की रक्षा करो। व्याख्या करने वाले आचार्य की रक्षा करो। शिष्य की रक्षा करो। पश्चिम से रक्षा। पूर्व से रक्षा करो। उत्तर से रक्षा करो। दक्षिण से रक्षा करो। ऊपर से रक्षा करो। नीचे से रक्षा करो। सब ओर से मेरी रक्षा करो। चारों ओर से मेरी रक्षा करो।


त्वं वाङ्‍मयस्त्वं चिन्मय:।


त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममय:।


त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽषि।


त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्माषि।


त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽषि।4।


तुम वाङ्‍मय हो, चिन्मय हो। तुम आनंदमय हो। तुम ब्रह्ममय हो। तुम सच्चिदानंद अद्वितीय हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। तुम दानमय विज्ञानमय हो।


सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।


सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।


सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।


सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।


त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ:।


त्वं चत्वारिकाकूपदानि।।5।।


यह जगत तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत तुममें लय को प्राप्त होगा। इस सारे जगत की तुममें प्रतीति हो रही है। तुम भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश हो। परा, पश्चंती, बैखरी और मध्यमा वाणी के ये चार विभाग तुम्हीं हो।


त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।


त्वं देहत्रयातीत:।


त्वं कालत्रयातीत:।


त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यं।


त्वं शक्तित्रयात्मक:।


त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।


त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वंरूद्रस्त्वं


इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं


वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं


चंद्रमास्त्वंब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्।।6।।


तुम सत्व, रज और तम तीनों गुणों से परे हो। तुम जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं से परे हो। तुम स्थूल, सूक्ष्म औ वर्तमान तीनों देहों से परे हो। तुम भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों से परे हो। तुम मूलाधार चक्र में नित्य स्थित रहते हो। इच्छा, क्रिया और ज्ञान तीन प्रकार की शक्तियाँ तुम्हीं हो। तुम्हारा योगीजन नित्य ध्यान करते हैं। तुम ब्रह्मा हो, तुम विष्णु हो, तुम रुद्र हो, तुम इन्द्र हो, तुम अग्नि हो, तुम वायु हो, तुम सूर्य हो, तुम चंद्रमा हो, तुम ब्रह्म हो, भू:, र्भूव:, स्व: ये तीनों लोक तथा ॐकार वाच्य पर ब्रह्म भी तुम हो।


गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।


अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं।


तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्वरूपं।


गकार: पूर्वरूपं। अकारो मध्यमरूपं।


अनुस्वारश्चान्त्यरूपं। बिन्दुरूत्तररूपं।


नाद: संधानं। सँ हितासंधि:सैषा गणेश विद्या।


गणकऋषि:निचृद्गायत्रीच्छंद:।


गणपतिर्देवता।ॐ गं गणपतये नम:।7।


गण के आदि अर्थात 'ग्' कर पहले उच्चारण करें। उसके बाद वर्णों के आदि अर्थात 'अ' उच्चारण करें। उसके बाद अनुस्वार उच्चारित होता है। इस प्रकार अर्धचंद्र से सुशोभित 'गं' ॐकार से अवरुद्ध होने पर तुम्हारे बीज मंत्र का स्वरूप (ॐ गं) है। गकार इसका पूर्वरूप है।बिन्दु उत्तर रूप है। नाद संधान है। संहिता संविध है। ऐसी यह गणेश विद्या है। इस महामंत्र के गणक ऋषि हैं। निचृंग्दाय छंद है श्री मद्महागणपति देवता हैं। वह महामंत्र है-


ॐ गं गणपतये नम:।


एकदंताय विद्‍महे।


वक्रतुण्डाय धीमहि।


तन्नो दंती प्रचोदयात।8।


एक दंत को हम जानते हैं। वक्रतुण्ड का हम ध्यान करते हैं। वह दन्ती (गजानन) हमें प्रेरणा प्रदान करें। यह गणेश गायत्री है।


एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।


रदं च वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम्।


रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।


रक्तगंधाऽनुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।।


भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।


आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृ‍ते पुरुषात्परम्।


एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:।9।


एकदंत चतुर्भज चारों हाथों में पाक्ष, अंकुश, अभय और वरदान की मुद्रा धारण किए तथा मूषक चिह्न की ध्वजा लिए हुए, रक्तवर्ण लंबोदर वाले सूप जैसे बड़े-बड़े कानों वाले रक्त वस्त्रधारी शरीर प रक्त चंदन का लेप किए हुए रक्तपुष्पों से भलिभाँति पूजित। भक्त पर अनुकम्पा करने वाले देवता, जगत के कारण अच्युत, सृष्टि के आदि में आविर्भूत प्रकृति और पुरुष से परे श्रीगणेशजी का जो नित्य ध्यान करता है, वह योगी सब योगियों में श्रेष्ठ है।


नमो व्रातपतये।


नमो गणपतये।


नम: प्रमथपतये।


नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय।


विघ्ननाशिने शिवसुताय।


श्रीवरदमूर्तये नमो नम:।10।


व्रात (देव समूह) के नायक को नमस्कार। गणपति को नमस्कार। प्रथमपति (शिवजी के गणों के अधिनायक) के लिए नमस्कार। लंबोदर को, एकदंत को, शिवजी के पुत्र को तथा श्रीवरदमूर्ति को नमस्कार-नमस्कार ।10।


एतदथर्वशीर्ष योऽधीते।


स ब्रह्मभूयाय कल्पते।


स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते।


स सर्वत: सुखमेधते।


स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते।11।


यह अथर्वशीर्ष (अथर्ववेद का उप‍‍‍निषद) है। इसका पाठ जो करता है, ब्रह्म को प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है। सब प्रकार के विघ्न उसके लिए बाधक नहीं होते। वह सब जगह सुख पाता है। वह पाँचों प्रकार के महान पातकों तथा उप पातकों से मुक्त हो जाता है।


सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।
सायंप्रात: प्रयुंजानोऽपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति।12।


सायंकाल पाठ करने वाला दिन के पापों का नाश करता है। प्रात:काल पाठ करने वाला रात्रि के पापों का नाश करता है, जो प्रात:- सायं दोनों समय इस पाठ का प्रयोग करता है वह निष्पाप हो जाता है। वह सर्वत्र विघ्नों का नाश करता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करता है।


इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।


यो यदि मोहाद्‍दास्यति स पापीयान् भवति।


सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्।13।


इस अथर्वशीर्ष को जो शिष्य न हो उसे नहीं देना चाहिए। जो मोह के कारण देता है वह पातकी हो जाता है। सहस्र (हजार) बार पाठ करने से जिन-जिन कामों-कामनाओं का उच्चारण करता है, उनकी सिद्धि इसके द्वारा ही मनुष्य कर सकता है।


अनेन गणपतिमभिषिंचति


स वाग्मी भवतिचतुर्थ्यामनश्र्नन जपति


स विद्यावान भवति।


इत्यथर्वणवाक्यं।


ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्न बिभेति कदाचनेति।14।


इसके द्वारा जो गणपति को स्नान कराता है, वह वक्ता बन जाता है। जो चतुर्थी तिथि को उपवास करके जपता है वह विद्यावान हो जाता है, यह अथर्व वाक्य है जो इस मं‍त्र के द्वारा तपश्चरण करना जानता है वह कदापि भय को प्राप्त नहीं होता।


यो दूर्वांकुरैंर्यजति


स वैश्रवणोपमो भवति।


यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति


स मेधावान भवति।


यो मोदकसहस्रेण यजति


स वाञ्छित फलमवाप्रोति।


य: साज्यसमिद्भिर्यजति


स सर्वं लभते स सर्वं लभते।15।


जो दूर्वांकुर के द्वारा भगवान गणपति का यजन करता है वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजो (धानी-लाई) के द्वारा यजन करता है वह यशस्वी होता है, मेधावी होता है। जो सहस्र (हजार) लड्डुओं (मोदकों) द्वारा यजन करता है, वह वांछित फल को प्राप्त करता है। जो घृत के सहित समिधा से यजन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है।


अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा


सूर्यवर्चस्वी भवति।


सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ


वा जप्त्वा सिद्धमंत्रों भवति।


महाविघ्नात्प्रमुच्यते।


महादोषात्प्रमुच्यते।


महापापात् प्रमुच्यते।


स सर्वविद्भवति से सर्वविद्भवति।


य एवं वेद इत्युपनिषद्‍।16।


आठ ब्राह्मणों को सम्यक रीति से ग्राह कराने पर सूर्य के समान तेजस्वी होता है। सूर्य ग्रहण में महानदी में या प्रतिमा के समीप जपने से मंत्र सिद्धि होती है। वह महाविघ्न से मुक्त हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है, वह सर्वज्ञ हो जाता है वह सर्वज्ञ हो जाता है।


गणपति अथर्वशीर्ष

गणेश अथर्वशीर्ष पाठ के अनन्य लाभ


जब किसी जातक की जन्मकुंडली में बुध ग्रह ठीक न हो, जैसे अशुभ भावो का स्वामी हो.....अशुभ ग्रहों से द्वारा द्रष्ट हो......या शुभ भाव में होकर भी निर्बल हो........क्रूर ग्रहों के साथ युति हो रही हो.....जिसके प्रभाव से उसके जीवन में धनाभाव (आर्थिक समस्या) स्वास्थ्य की समस्या, व्यापार में निरंतर हानि जैसे परिणाम मिल रहे हो तो शास्त्र में बुधग्रह के जाप, दान व पूजा, श्री गणेश जी की पूजा, बुधवार व गणेश चतुर्थी के साथ व्रत का नियम है | प्रत्येक माह की कृष्ण पक्ष की चंद्रोदयव्यापिनी चतुर्थी तिथि को भगवान श्रीगणेश के लिए जो व्रत किया जाता है उसे गणेश चतुर्थी व्रत कहते हैं। भगवान गणेश बुद्धि, धन, ज्ञान, यश, सम्मान, पद और तमाम भौतिक सुखों को देने वाले देवता तथा सभी पाप व क्रूर ग्रहों के दोष को दूर करेने वाले देवता विघ्नहर्ता के रूप में पूजनीय हैं। भगवान गणेश की प्रसन्नता के लिए शास्त्रों में अनेक जप, मंत्र, पूजा व आरती का महत्व बताया गया है। यहाँ हम आपको आपके लाभ व सुविधा हेतु गणेश आराधना व गणेश अथर्वशीर्ष के पाठ के लाभ के साथ साथ उसके नियम व विधि भी बता रहे है |


गणेश अथर्वशीर्ष के लाभ श्री महागणपति पूजन में सबसे ज्यादाप्रमुखता, विशेषता श्रीगणपति अथर्वशीर्ष की मानी जाती है। यह मूलत: भगवान गणेश की वैदिक स्तुति है, इसका पाठ करने वाला किसी प्रकार के विघ्न से बाधित न होता हुआ महापातकों से मुक्त हो जाता है। जिसमें भगवान गणेश के आवाहन से लेकर ध्यान, नाम से मिलने वाले शुभ फल आदि सम्मिलित है। इस गणपति स्त्रोत का पाठ धार्मिक दृष्टि से सभी दोष से मुक्त करता है, वहीं व्यावहारिक जीवन के कष्टो, दु:खों और बाधाओं से भी रक्षा करता है। ईश्वर आपका मंगल करे।



।। गणपति अथर्वशीर्ष।।


ॐ नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि । त्वमेव केवलं कर्ता सि। त्वमेव केवलं धर्तासि। त्वमेव केवलं हर्तासि । त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि। त्व साक्षादात्मासि नित्यम्। ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि। अव त्व मांम्। अव वक्तारम्। अव श्रोतारम्। अव दातारम्। अव धातारम्। अवा नूचानमव शिष्यम्।अव पश्चातात्।अव पुरस्तात्। अवोत्तरात्तात्। अव दक्षिणात्तात्।


अव चोर्ध्वात्तात्। अवाधरात्तात्। सर्वतो माँ पाहि-पाहि समंतात्। त्वं वाङ्‍मय स्त्वं चिन्मयः। त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममयः। त्वं सच्चिदानंदात् द्वितीयोसि। त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोसि। सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते। सर्वं जगदिदं त्वत्त स्तिष्ठति। सर्वं जगदिदं त्वयि वयमेष्यति। सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति। त्वं भूमिरापोनलो निलो नभः। त्वं चत्वारि वाकूपदानि। त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीतः। त्वं देहत्रयातीतः। त्वं कालत्रयातीतः। त्वं मूलाधार स्थितोसि नित्यं। त्वं शक्ति त्रयात्मकः। त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं। त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रूद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्।


गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरम्। अनुस्वार: परतरः। अर्धेन्दुलसितम्। तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्व रूपम्। गकार: पूर्वरूपम्। अकारो मध्यमरूपम्। अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्। बिन्दुरूत्तररूपम्। नाद: संधानम्। सँ हितासंधि: सैषा गणेश विद्या। गणकऋषि: निचृद्गायत्रीच्छंदः। गणपतिर्देवता। ॐ गं गणपतये नमः।एकदंताय विद्‍महे। वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दंती प्रचोदयात्। एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुश धारिणम्। रदं च वरदं हस्तै र्विभ्राणं मूषकध्वजम्। रक्तं लंबोदरं शूर्प कर्णकं रक्तवाससम्। रक्तगंधानु लिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्। भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारण मच्युतम्। आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृ‍ते पुरुषात्परम्। एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः।


नमो व्रातपतये। नमो गणपतये। नम: प्रमथपतये। नमस्ते अस्तु लंबोदरायै एकदंताय। विघ्ननाशिने शिवसुताय। श्रीवरदमूर्तये नमो नमः। एतदथर्व शीर्ष योधीते। स ब्रह्म भूयाय कल्पते। स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते। स सर्वत: सुखमेधते। स पच्चमहापापात्प्रमुच्यते। सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति। प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति। सायं प्रात: प्रयुंजानो अपापो भवति। सर्वत्राधीयानो ड पविघ्नो भवति। धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति। इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्। यो यदि मोहात् दास्यति स पापीयान् भवति। सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तंतमनेन साधयेत्। अनेन गणपति मभिषिंचति स वाग्मी भवति । चतुर्थ्यामनश्र्नन जपति स विद्यावान भवति। इत्यथर्वण वाक्यम्। ब्रह्माद्यावरणं विद्यात् न बिभेति कदाचनेति। यो दूर्वांकुरैंर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति। यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति स मेधावान भवति। यो मोदक सहस्रेण यजति स वांछित फल मवाप्रोति। य: साज्यसमिद्भि र्यजति स सर्वं लभते स सर्वं लभते। अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्य वर्चस्वी भवति। सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमा संनिधौ वा जप्त्वा सिद्धमंत्रों भवति। महाविघ्नात् प्रमुच्यते। महादोषात् प्रमुच्यते। महापापात् प्रमुच्यते। स सर्वविद्‍ भवति से सर्वविद्‍ भवति । य एवं वेद इत्युपनिषद्‍।


क्यों चढ़ाई जाती है गणेश को दूर्वा

गुरुवार, 22 अगस्त 2019


श्री कृष्ण जन्माष्टमी





श्री कृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण का जनमोत्स्व है। योगेश्वर कृष्ण के भगवद गीता के उपदेश अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं। जन्माष्टमी भारत में हीं नहीं बल्कि विदेशों में बसे भारतीय भी इसे पूरी आस्था व उल्लास से मनाते हैं। श्रीकृष्ण ने अपना अवतार भाद्र माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में लिया। चूंकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे अत: इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से सराबोर हो उठती है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन मौके पर भगवान कान्हा की मोहक छवि देखने के लिए दूर दूर से श्रद्धालु आज के दिन मथुरा पहुंचते हैं। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर मथुरा कृष्णमय हो जाता है। मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है। ज्न्माष्टमी में स्त्री-पुरुष बारह बजे तक व्रत रखते हैं। इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती है और भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है। और रासलीला का आयोजन होता है।

कृष्णा जन्माष्टमी या गोकुलष्टमी भगवान कृष्ण के जन्मदिन का जश्न मनाने के लिए मनाया जाता है। जो भगवान के 8 वें अवतार थे। श्रवण कृष्ण के जन्म में कृष्णा पक्ष का यह 8 वाँ दिन था जब भगवान कृष्ण ने जन्म लिया था। इसलिए इसी दिन हिंदू कैलेंडर के अनुसार जन्माष्टमी भी मनाया जाता हैं।
भगवान कृष्ण या कान्हा हिंदुओं का पसंदीदा देवता माना जाता है। कान्हा के न केवल भारत में बल्कि देश के बाहर भी बहुत भक्त हैं। इसलिए कृष्णाष्टमी दुनिया भर में बड़े पैमाने पर मनाया जाता हैं।
भगवान कृष्ण के भक्त उन्हें अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। प्रत्येक नाम अपने भक्तों के प्यार और सम्मान को दर्शाता है और कृष्ण के जीवन के विभिन्न चरणों का प्रतिनिधित्व करता हैं।

भगवान कृष्ण के कुल 108 नाम है जैसे बाल गोपाल, कान्हा, मोहन, गोविंदा, केशव, श्याम, वासुदेव, कृष्णा, देवकीनंदन, देवेश और कई अन्य। बालगोपाल उस चरण का प्रतिनिधित्व करता है जब वह एक कुख्यात बच्चा था और कान्हा उस चरण का प्रतिनिधित्व करता है जब वह गोपी के साथ खेलता था।

भगवान कृष्ण या कान्हा का जिक्र करने के लिए एक बॉलीवुड गाने में यह कहा जाता है गोविंदा या कान्हा मक्खन और दही खाने और बांसुरी बजाना पसंद करते थे। कृष्ण एक आज्ञाकारी बेटा, बुद्धिमान छात्र, एक रोमांटिक प्रेमी और देखभाल करने वाले पति का आदर्श उदाहरण हैं।

मनुष्यों को भगवान कृष्ण के जीवन से विभिन्न पहलुओं से जीवन का सही आचरण सीखना चाहिए। इस दिन कान्हा के सभी पहलुओं की भक्तों द्वारा पूजा की जाती हैं।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी क्यों मनाई जाती है


भगवान कृष्ण या गोविंदा को भगवान विष्णु का सबसे शक्तिशाली अवतार माना जाता है। उन्होनें धरती पर से राक्षसों के साम्राज्य को खत्म करने के लिए जन्म लिया था। भगवान कृष्ण देवकी और वासुदेव का आठवाँ बच्चा था।

देवकी एक क्रूर राजा, कंस की बहन थी। कंस को अपनी ताकत का घमंड था, उसकी सोच थी की लोगों को भगवान की जगह उसकी पूजा करनी चाहिए। उन्होंने निर्दोष लोगों को बेरहमी से मारना शुरू कर दिया जो उसका सम्मान करने से इंकार करते थे। उसका अत्याचार दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था।

एक दिन एक भविष्यवाणी हुई की कंस देवकी और वासुदेव के 8 वें बच्चे द्वारा मारा जाएगा। इसे रोकने के लिए कंस ने अपनी बहन को अपने पति के साथ कालकोठरी में बंद करवा दिया। जब भी देवकी बच्चे को जन्म देती, कंस उस बच्चे को मार देता था।

जब देवकी और वासुदेव के 8 वें बच्चे का जन्म हुआ तो भगवान विष्णु ने वासुदेव से उन्हें गोकुल ले जाने के लिए कहा जहाँ नंद और यशोदा रहते थे। वासुदेव ने बच्चे को गोकुल पहुँचाने के लिए यमुना नदी पार की।

गोकुल पहुंचकर वासुदेव ने अपने बेटे को यशोदा की बेटी से बदल लिया और वापस जेल लौट आया। कंस ने सोचा की वह देवकी और वासुदेव का 8 वां बच्चा हैं इसलिए उसने उसे पत्थर पर फेंक दिया।

हैरानी की बात है की वह बच्ची माँ योगमाया में प्ररिवर्तित हो गई और कंस को उनकी मृत्यु के बारे में चेतावनी दी। देवकी और वासुदेव का आठवा बच्चा भगवान कृष्ण गोकुल में बड़ा हुआ। उन्होंने वहां कई राक्षसों को मार डाला और कंस को मारने के लिए मथुरा लौट आया।
तब से, जन्माष्टमी या कृष्णाष्टमी भगवान् कृष्ण या गोविंदा के जन्मदिन के रूप मनाया जाता हैं।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी जन्माष्टमी का उत्सव


इस दिन लोग जन्माष्टमी कि पूर्व संध्या पर उपवास करते है जिसे सप्तमी कहा जाता है। कृष्ण भक्त रात भर जागते रहते है और भगवान कृष्ण का सम्मान करने के लिए गाने गाते हैं।

मध्यरात्रि 12 बजे, दूध से मूर्ति को नहलाते है और सुंदर कपड़े, गहने पहनाते है फिर पूजा के लिए पालना में रखा जाता हैं। देवताओं को मिठाई भेंट की जाती है और फिर भक्तों के बीच बांटी जाती हैं।

भगवान् कृष्ण के भक्त कृष्ण भजनों के साथ नृत्य करते हैं साथ ही वे कृष्ण झांकी का एक अति उत्कृष्ट प्रदर्शन आयोजित करते है जो रस लीला को एक विशाल तरीके से दर्शाता हैं। जन्माष्टमी की सबसे लोकप्रिय गतिविधि दही हांड़ी का रिवाज हैं। इस परंपरा को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।

मथुरा, वृंदावन और गोकुल में श्री कृष्ण जन्माष्टमी


मथुरा भगवान् कृष्ण का जन्मस्थान है। वृंदावन और गोकुल वो जगहें है जहाँ कृष्ण ने अपना बचपन बिताया था। आज भी मथुरा, वृंदावन और गोकुल की सड़कों पर भगवान कृष्ण का नाम लिखा हुआ।

भगवान कृष्ण का जन्मस्थान होने के नाते मथुरा जन्माष्टमी का एक भव्य उत्सव है। मथुरा का ये उत्सव पूरे देश से पर्यटकों को आकर्षित करता हैं। युवा लड़के, लड़कियां रासलीला का अभिनय करते हैं। रासलीला राधा और गोपी के साथ भगवान कृष्ण के रोमांटिक और प्रेमपूर्ण पक्ष को दर्शाती हैं।

जन्माष्टमी मनाने के लिए मथुरा की पूरी जगहों को फूलों और रौशनी से सजाया जाता हैं। मथुरा का मुख्य मंदिर द्वारकाधीश मंदिर हैं। वृंदावन भगवान् कृष्ण की गतिविधियों से भी जुड़ा हुआ है। वृंदावन में भगवान कृष्ण और उसके प्रिय राधा के उपाख्यानों को कहीं भी सुना जा सकता हैं।

वृंदावन में भगवान कृष्णा के मंदिर भी हैं जैसे मदन मोहन मंदिर, गोविंद देव मंदिर, राधारमण मंदिर, राधा दामोदर मंदिर, राधा वल्लभ मंदिर और जुगल किशोर मंदिर कई अन्य। गोकुल वह जगह जहाँ भगवान कृष्ण ने अपने बचपन के दिन बिताये थे।

यह वह जगह है जहाँ नंदा और यशोदा रहते थे, जहाँ कान्हा को उसके पिता वासुदेव ने जन्म के बाद एक सुरक्षित हिरासत में छोड़ दिया था। गोकुल में भी भगवान कृष्ण के कुछ प्रसिद्ध मंदिर है।

जन्माष्टमी के त्यौहार के दौरान मथुरा, वृन्दावन और गोकुल का पूरा वातावरण उनके नाम से गूंजता हैं। ऐसा लगता है जैसे भगवान कृष्ण खुद उस्तव का हिस्सा बनने के लिए वहां आते हैं।

उत्तर भारत के अन्य स्थानों जैसे हरियाणा, दिल्ली और पंजाब में भी जन्माष्टमी को पूरे उत्साह के मनाया जाता हैं। लोग पूरे दिन उपवास करते है कृष्ण की भक्ति में प्रार्थना करते हैं।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी का महत्व


जन्माष्टमी का अपना महत्व है। भगवन विष्णु ने भगवत गीता नामक प्राचीन काल की एक पवित्र पुस्तक में कहा है की जब समाज में बुराई का प्रभाव बढ़ेगा और धर्म की गिरावट होगी तो मैं इस दुनिया में पुनर्जन्म दूंगा और बुराई को खत्म करने और अच्छाई का साथ देने के लिए भी पुनर्जन्म दूंगा।

इस त्यौहार का मुख्य महत्व नेक नियत को प्रोत्साहित करने और बुरी इच्छा को हतोत्साहित करने में निहित हैं। एकता के लिए भी कृष्ण जन्माष्टमी मनाया जाता हैं। यह पवित्र त्यौहार लोगों के बीच भाईचारे को बढ़ावा देता है इसलिए जन्माष्टमी को एकता का प्रतीक माना जाता हैं।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी उपवास के बारे में


अष्टमी दो प्रकार की है- पहली जन्माष्टमी और दूसरी जयंती। इसमें केवल पहली अष्टमी है।

स्कन्द पुराण के मतानुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता, वह मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होता है। ब्रह्मपुराण का कथन है कि कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी में अट्ठाइसवें युग में देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए थे। यदि दिन या रात में कलामात्र भी रोहिणी न हो तो विशेषकर चंद्रमा से मिली हुई रात्रि में इस व्रत को करें। भविष्य पुराण का वचन है- भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को जो मनुष्य नहीं करता, वह क्रूर राक्षस होता है। केवल अष्टमी तिथि में ही उपवास करना कहा गया है। यदि वही तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो 'जयंती' नाम से संबोधित की जाएगी। वह्निपुराण का वचन है कि कृष्णपक्ष की जन्माष्टमी में यदि एक कला भी रोहिणी नक्षत्र हो तो उसको जयंती नाम से ही संबोधित किया जाएगा। अतः उसमें प्रयत्न से उपवास करना चाहिए।

विष्णुरहस्यादि वचन से- कृष्णपक्ष की अष्टमी रोहिणी नक्षत्र से युक्त भाद्रपद मास में हो तो वह जयंती नामवाली ही कही जाएगी। वसिष्ठ संहिता का मत है- यदि अष्टमी तथा रोहिणी इन दोनों का योग अहोरात्र में असम्पूर्ण भी हो तो मुहूर्त मात्र में भी अहोरात्र के योग में उपवास करना चाहिए।मदन रत्न में स्कन्द पुराण का वचन है कि जो उत्तम पुरुष है। वे निश्चित रूप से जन्माष्टमी व्रत को इस लोक में करते हैं। उनके पास सदैव स्थिर लक्ष्मी होती है। इस व्रत के करने के प्रभाव से उनके समस्त कार्य सिद्ध होते हैं। विष्णु धर्म के अनुसार आधी रात के समय रोहिणी में जब कृष्णाष्टमी हो तो उसमें कृष्ण का अर्चन और पूजन करने से तीन जन्मों के पापों का नाश होता है। भृगु ने कहा है- जन्माष्टमी, रोहिणी और शिवरात्रि ये पूर्वविद्धा ही करनी चाहिए तथा तिथि एवं नक्षत्र के अन्त में पारणा करें। इसमें केवल रोहिणी उपवास भी सिद्ध है। अन्त्य की दोनों में परा ही लें।

मोहरात्रि


श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है। इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान, नाम अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से आसक्तिहटती है। जन्माष्टमी का व्रत व्रतराज है। इसके सविधि पालन से आज आप अनेक व्रतों से प्राप्त होने वाली महान पुण्यराशिप्राप्त कर लेंगे।

व्रजमण्डलमें श्रीकृष्णाष्टमीके दूसरे दिन भाद्रपद-कृष्ण-नवमी में नंद-महोत्सव अर्थात् दधिकांदौ श्रीकृष्ण के जन्म लेने के उपलक्षमें बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भगवान के श्रीविग्रहपर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढाकर ब्रजवासीउसका परस्पर लेपन और छिडकाव करते हैं। वाद्ययंत्रोंसे मंगलध्वनिबजाई जाती है। भक्तजन मिठाई बांटते हैं। जगद्गुरु श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव नि:संदेह सम्पूर्ण विश्व के लिए आनंद-मंगल का संदेश देता है।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर पकवान


बाल गोपाल मक्खन, दही और दूध से बनी चीजों को खाना पसंद करते थे इसलिए बाल गोपाल का स्वागत करने के लिए विभिन्न मीठे व्यंजन बनाये जाते है। इन पकवानों को उन्हें भोग के रूप में प्रस्तुत किया जाता हैं। उसके बाद परिवार द्वारा प्रसाद के रूप में खाया जाता हैं। इन पकवानों को बाल गोपाल या गोविंदा के पसंदीदा माना जाता हैं।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा


इंद्र ने कहा है- हे ब्रह्मपुत्र, हे मुनियों में श्रेष्ठ, सभी शास्त्रों के ज्ञाता, हे देव, व्रतों में उत्तम उस व्रत को बताएँ, जिस व्रत से मनुष्यों को मुक्ति, लाभ प्राप्त हो तथा हे ब्रह्मन्‌! उस व्रत से प्राणियों को भोग व मोक्ष भी प्राप्त हो जाए। इंद्र की बातों को सुनकर नारदजी ने कहा- त्रेतायुग के अन्त में और द्वापर युग के प्रारंभ समय में निन्दितकर्म को करने वाला कंस नाम का एक अत्यंत पापी दैत्य हुआ। उस दुष्ट व नीच कर्मी दुराचारी कंस की देवकी नाम की एक सुंदर बहन थी। देवकी के गर्भ से उत्पन्न आठवाँ पुत्र कंस का वध करेगा।

नारदजी की बातें सुनकर इंद्र ने कहा- हे महामते! उस दुराचारी कंस की कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए। क्या यह संभव है कि देवकी के गर्भ से उत्पन्न आठवाँ पुत्र अपने मामा कंस की हत्या करेगा। इंद्र की सन्देहभरी बातों को सुनकर नारदजी ने कहा-हे अदितिपुत्र इंद्र! एक समय की बात है। उस दुष्ट कंस ने एक ज्योतिषी से पूछा कि ब्राह्मणों में श्रेष्ठ ज्योतिर्विद! मेरी मृत्यु किस प्रकार और किसके द्वारा होगी। ज्योतिषी बोले-हे दानवों में श्रेष्ठ कंस! वसुदेव की धर्मपत्नी देवकी जो वाक्‌पटु है और आपकी बहन भी है। उसी के गर्भ से उत्पन्न उसका आठवां पुत्र जो कि शत्रुओं को भी पराजित कर इस संसार में 'कृष्ण' के नाम से विख्यात होगा, वही एक समय सूर्योदयकाल में आपका वध करेगा।

ज्योतिषी की बातें सुनकर कंस ने कहा- हे दैवज, बुद्धिमानों में अग्रण्य अब आप यह बताएं कि देवकी का आठवां पुत्र किस मास में किस दिन मेरा वध करेगा। ज्योतिषी बोले- हे महाराज! माघ मास की शुक्ल पक्ष की तिथि को सोलह कलाओं से पूर्ण श्रीकृष्ण से आपका युद्ध होगा। उसी युद्ध में वे आपका वध करेंगे। इसलिए हे महाराज! आप अपनी रक्षा यत्नपूर्वक करें। इतना बताने के पश्चात नारदजी ने इंद्र से कहा- ज्योतिषी द्वारा बताए गए समय पर हीकंस की मृत्युकृष्ण के हाथ निःसंदेह होगी। तब इंद्र ने कहा- हे मुनि! उस दुराचारी कंस की कथा का वर्णनकीजिए और बताइए कि कृष्ण का जन्म कैसे होगा तथा कंस की मृत्यु कृष्ण द्वारा किस प्रकार होगी।

इंद्र की बातों को सुनकर नारदजी ने पुनः कहना प्रारंभ किया- उस दुराचारी कंस ने अपने एक द्वारपाल से कहा- मेरी इस प्राणों से प्रिय बहन की पूर्ण सुरक्षा करना। द्वारपाल ने कहा- ऐसा ही होगा। कंस के जाने के पश्चात उसकी छोटी बहन दुःखित होते हुए जल लेने के बहाने घड़ा लेकर तालाब पर गई। उस तालाब के किनारे एक घनघोर वृक्ष के नीचे बैठकर देवकी रोने लगी। उसी समय एक सुंदर स्त्री जिसका नाम यशोदा था, उसने आकर देवकी से प्रिय वाणी में कहा- हे कान्ते! इस प्रकार तुम क्यों विलाप कर रही हो। अपने रोने का कारण मुझसे बताओ। तब दुःखित देवकी ने यशोदा से कहा- हे बहन! नीच कर्मों में आसक्त दुराचारी मेरा ज्येष्ठ भ्राता कंस है। उस दुष्ट भ्राता ने मेरे कई पुत्रों का वध कर दिया। इस समय मेरे गर्भ में आठवाँ पुत्र है। वह इसका भी वध कर डालेगा। इस बात में किसी प्रकार का संशय या संदेह नहीं है, क्योंकि मेरे ज्येष्ठ भ्राता को यह भय है कि मेरे अष्टम पुत्र से उसकी मृत्यु अवश्य होगी।

देवकी की बातें सुनकर यशोदा ने कहा- हे बहन! विलाप मत करो। मैं भी गर्भवती हूँ। यदि मुझे कन्या हुई तो तुम अपने पुत्र के बदले उस कन्या को ले लेना। इस प्रकार तुम्हारा पुत्र कंस के हाथों मारा नहीं जाएगा।

तदनन्तर कंस ने अपने द्वारपाल से पूछा- देवकी कहाँ है? इस समय वह दिखाई नहीं दे रही है। तब द्वारपाल ने कंस से नम्रवाणी में कहा- हे महाराज! आपकी बहन जल लेने तालाब पर गई हुई हैं। यह सुनते ही कंस क्रोधित हो उठा और उसने द्वारपाल को उसी स्थान पर जाने को कहा जहां वह गई हुई है। द्वारपाल की दृष्टि तालाब के पास देवकी पर पड़ी। तब उसने कहा कि आप किस कारण से यहां आई हैं। उसकी बातें सुनकर देवकी ने कहा कि मेरे गृह में जल नहीं था, जिसे लेने मैं जलाशय पर आई हूँ। इसके पश्चात देवकी अपने गृह की ओर चली गई।

कंस ने पुनः द्वारपाल से कहा कि इस गृह में मेरी बहन की तुम पूर्णतः रक्षा करो। अब कंस को इतना भय लगने लगा कि गृह के भीतर दरवाजों में विशाल ताले बंद करवा दिए और दरवाजे के बाहर दैत्यों और राक्षसों को पहरेदारी के लिए नियुक्त कर दिया। कंस हर प्रकार से अपने प्राणों को बचाने के प्रयास कर रहा था। एक समय सिंह राशि के सूर्य में आकाश मंडल में जलाधारी मेघों ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया। भादौ मास की कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को घनघोर अर्द्धरात्रि थी। उस समय चंद्रमा भी वृष राशि में था, रोहिणी नक्षत्र बुधवार के दिन सौभाग्ययोग से संयुक्त चंद्रमा के आधी रात में उदय होने पर आधी रात के उत्तर एक घड़ी जब हो जाए तो श्रुति-स्मृति पुराणोक्त फल निःसंदेह प्राप्त होता है।

इस प्रकार बताते हुए नारदजी ने इंद्र से कहा- ऐसे विजय नामक शुभ मुहूर्त में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ और श्रीकृष्ण के प्रभाव से ही उसी क्षण बन्दीगृह के दरवाजे स्वयं खुल गए। द्वार पर पहरा देने वाले पहरेदार राक्षस सभी मूर्च्छित हो गए। देवकी ने उसी क्षण अपने पति वसुदेव से कहा- हे स्वामी! आप निद्रा का त्याग करें और मेरे इस अष्टम पुत्र को गोकुल में ले जाएँ, वहाँ इस पुत्र को नंद गोप की धर्मपत्नी यशोदा को दे दें। उस समय यमुनाजी पूर्णरूपसे बाढ़ग्रस्त थीं, किन्तु जब वसुदेवजी बालक कृष्ण को सूप में लेकर यमुनाजी को पार करने के लिए उतरे उसी क्षण बालक के चरणों का स्पर्श होते ही यमुनाजी अपने पूर्व स्थिर रूप में आ गईं। किसी प्रकार वसुदेवजी गोकुल पहुँचे और नंद के गृह में प्रवेश कर उन्होंने अपना पुत्र तत्काल उन्हें दे दिया और उसके बदले में उनकी कन्या ले ली। वे तत्क्षण वहां से वापस आकर कंस के बंदी गृह में पहुँच गए।

प्रातःकाल जब सभी राक्षस पहरेदार निद्रा से जागे तो कंस ने द्वारपाल से पूछा कि अब देवकी के गर्भ से क्या हुआ? इस बात का पता लगाकर मुझे बताओ। द्वारपालों ने महाराज की आज्ञा को मानते हुए कारागार में जाकर देखा तो वहाँ देवकी की गोद में एक कन्या थी। जिसे देखकर द्वारपालों ने कंस को सूचित किया, किन्तु कंस को तो उस कन्या से भय होने लगा। अतः वह स्वयं कारागार में गया और उसने देवकी की गोद से कन्या को झपट लिया और उसे एक पत्थर की चट्टान पर पटक दिया किन्तु वह कन्या विष्णु की माया से आकाश की ओर चली गई और अंतरिक्ष में जाकर विद्युत के रूप में परिणित हो गई।

उसने कंस से कहा कि हे दुष्ट! तुझे मारने वाला गोकुल में नंद के गृह में उत्पन्न हो चुका है और उसी से तेरी मृत्यु सुनिश्चित है। मेरा नाम तो वैष्णवी है, मैं संसार के कर्ता भगवान विष्णु की माया से उत्पन्न हुई हूँ, इतना कहकर वह स्वर्ग की ओर चली गई। उस आकाशवाणी को सुनकर कंस क्रोधित हो उठा। उसने नंदजी के गृह में पूतना राक्षसी को कृष्ण का वध करने के लिए भेजा किन्तु जब वह राक्षसी कृष्ण को स्तनपान कराने लगी तो कृष्ण ने उसके स्तन से उसके प्राणों को खींच लिया और वह राक्षसी कृष्ण-कृष्ण कहते हुए मृत्यु को प्राप्त हुई।

जब कंस को पूतना की मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ तो उसने कृष्ण का वध करने के लिए क्रमशः केशी नामक दैत्य को अश्व के रूप में उसके पश्चात अरिष्ठ नामक दैत्य को बैल के रूप में भेजा, किन्तु ये दोनों भी कृष्ण के हाथों मृत्यु को प्राप्त हुए। इसके पश्चात कंस ने काल्याख्य नामक दैत्य को कौवे के रूप में भेजा, किन्तु वह भी कृष्ण के हाथों मारा गया। अपने बलवान राक्षसों की मृत्यु के आघात से कंस अत्यधिक भयभीत हो गया। उसने द्वारपालों को आज्ञा दी कि नंद को तत्काल मेरे समक्ष उपस्थित करो। द्वारपाल नंद को लेकर जब उपस्थित हुए तब कंस ने नंदजी से कहा कि यदि तुम्हें अपने प्राणों को बचाना है तो पारिजात के पुष्प ले लाओ। यदि तुम नहीं ला पाए तो तुम्हारा वध निश्चित है।

कंस की बातों को सुनकर नंद ने 'ऐसा हीहोगा' कहा और अपने गृह की ओर चले गए। घर आकर उन्होंने संपूर्ण वृत्तांत अपनी पत्नी यशोदा को सुनाया, जिसे श्रीकृष्ण भी सुन रहे थे। एक दिन श्रीकृष्ण अपने मित्रों के साथ यमुना नदी के किनारे गेंद खेल रहे थे और अचानक स्वयं ने ही गेंद को यमुना में फेंक दिया। यमुना में गेंद फेंकने का मुख्य उद्देश्य यही था कि वे किसी प्रकार पारिजात पुष्पों को ले आएँ। अतः वे कदम्ब के वृक्ष पर चढ़कर यमुना में कूद पड़े।

कृष्ण के यमुना में कूदने का समाचार श्रीधर नामक गोपाल ने यशोदा को सुनाया। यह सुनकर यशोदा भागती हुई यमुना नदी के किनारे आ पहुँचीं और उसने यमुना नदी की प्रार्थना करते हुए कहा- हे यमुना! यदि मैं बालक को देखूँगी तो भाद्रपद मास की रोहिणी युक्त अष्टमी का व्रत अवश्य करूंगी क्योंकि दया, दान, सज्जन प्राणी, ब्राह्मण कुल में जन्म, रोहिणियुक्त अष्टमी, गंगाजल, एकादशी, गया श्राद्ध और रोहिणी व्रत ये सभी दुर्लभ हैं।

हजारों अश्वमेध यज्ञ, सहस्रों राजसूय यज्ञ, दान तीर्थ और व्रत करने से जो फल प्राप्त होता है, वह सब कृष्णाष्टमी के व्रत को करने से प्राप्त हो जाता है। यह बात नारद ऋषि ने इंद्र से कही। इंद्र ने कहा- हे मुनियों में श्रेष्ठ नारद! यमुना नदी में कूदने के बाद उस बालरूपी कृष्ण ने पाताल में जाकर क्या किया? यह संपूर्ण वृत्तांत भी बताएँ। नारद ने कहा- हे इंद्र! पाताल में उस बालक से नागराज की पत्नी ने कहा कि तुम यहाँ क्या कर रहे हो, कहाँ से आए हो और यहाँ आने का क्या प्रयोजन है?

नागपत्नी बोलीं- हे कृष्ण! क्या तूने द्यूतक्रीड़ा की है, जिसमें अपना समस्त धन हार गया है। यदि यह बात ठीक है तो कंकड़, मुकुट और मणियों का हार लेकर अपने गृह में चले जाओ क्योंकि इस समय मेरे स्वामी शयन कर रहे हैं। यदि वे उठ गए तो वे तुम्हारा भक्षण कर जाएँगे। नागपत्नी की बातें सुनकर कृष्ण ने कहा- 'हे कान्ते! मैं किस प्रयोजन से यहाँ आया हूँ, वह वृत्तांत मैं तुम्हें बताता हूँ। समझ लो मैं कालियानाग के मस्तक को कंस के साथ द्यूत में हार चुका हूं और वही लेने मैं यहाँ आया हूँ। बालक कृष्ण की इस बात को सुनकर नागपत्नी अत्यंत क्रोधित हो उठीं और अपने सोए हुए पति को उठाते हुए उसने कहा- हे स्वामी! आपके घर यह शत्रु आया है। अतः आप इसका हनन कीजिए।

अपनी स्वामिनी की बातों को सुनकर कालियानाग निन्द्रावस्था से जाग पड़ा और बालक कृष्ण से युद्ध करने लगा। इस युद्ध में कृष्ण को मूर्च्छा आ गई, उसी मूर्छा को दूर करने के लिए उन्होंने गरुड़ का स्मरण किया। स्मरण होते ही गरुड़ वहाँ आ गए। श्रीकृष्ण अब गरुड़ पर चढ़कर कालियानाग से युद्ध करने लगे और उन्होंने कालियनाग को युद्ध में पराजित कर दिया।

अब कलियानाग ने भलीभांति जान लिया था कि मैं जिनसे युद्ध कर रहा हूँ, वे भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण ही हैं। अतः उन्होंने कृष्ण के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और पारिजात से उत्पन्न बहुत से पुष्पों को मुकुट में रखकर कृष्ण को भेंट किया। जब कृष्ण चलने को हुए तब कालियानाग की पत्नी ने कहा हे स्वामी! मैं कृष्ण को नहीं जान पाई। हे जनार्दन मंत्र रहित, क्रिया रहित, भक्तिभाव रहित मेरी रक्षा कीजिए। हे प्रभु! मेरे स्वामी मुझे वापस दे दें। तब श्रीकृष्ण ने कहा- हे सर्पिणी! दैत्यों में जो सबसे बलवान है, उस कंस के सामने मैं तेरे पति को ले जाकर छोड़ दूँगा अन्यथा तुम अपने गृह को चली जाओ। अब श्रीकृष्ण कालियानाग के फन पर नृत्य करते हुए यमुना के ऊपर आ गए।

तदनन्तर कालिया की फुंकार से तीनों लोक कम्पायमान हो गए। अब कृष्ण कंस की मथुरा नगरी को चल दिए। वहां कमलपुष्पों को देखकर यमुनाके मध्य जलाशय में वह कालिया सर्प भी चला गया।

इधर कंस भी विस्मित हो गया तथा कृष्ण प्रसन्नचित्त होकर गोकुल लौट आए। उनके गोकुल आने पर उनकी माता यशोदा ने विभिन्न प्रकार के उत्सव किए। अब इंद्र ने नारदजी से पूछा- हे महामुने! संसार के प्राणी बालक श्रीकृष्ण के आने पर अत्यधिक आनंदित हुए। आखिर श्रीकृष्ण ने क्या-क्या चरित्र किया? वह सभी आप मुझे बताने की कृपा करें। नारद ने इंद्र से कहा- मन को हरने वाला मथुरा नगर यमुना नदी के दक्षिण भाग में स्थित है। वहां कंस का महाबलशायी भाई चाणूर रहता था। उस चाणूर से श्रीकृष्ण के मल्लयुद्ध की घोषणा की गई। हे इंद्र!

कृष्ण एवं चाणूर का मल्लयुद्ध अत्यंत आश्चर्यजनक था। चाणूर की अपेक्षा कृष्ण बालरूप में थे। भेरी शंख और मृदंग के शब्दों के साथ कंस और केशी इस युद्ध को मथुरा की जनसभा के मध्य में देख रहे थे। श्रीकृष्ण ने अपने पैरों को चाणूर के गले में फँसाकर उसका वध कर दिया। चाणूर की मृत्यु के पश्चात उनका मल्लयुद्ध केशी के साथ हुआ। अंत में केशी भी युद्ध में कृष्ण के द्वारा मारा गया। केशी के मृत्युपरांत मल्लयुद्ध देख रहे सभी प्राणी श्रीकृष्ण की जय-जयकार करने लगे। बालक कृष्ण द्वारा चाणूर और केशी का वध होना कंस के लिए अत्यंत हृदय विदारक था। अतः उसने सैनिकों को बुलाकर उन्हें आज्ञा दी कि तुम सभी अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर कृष्ण से युद्ध करो।

हे इंद्र! उसी क्षण श्रीकृष्ण ने गरुड़, बलराम तथा सुदर्शन चक्र का ध्यान किया, जिसके परिणामस्वरूप बलदेवजी सुदर्शन चक्र लेकर गरुड़ पर आरूढ़ होकर आए। उन्हें आता देख बालक कृष्ण ने सुदर्शन चक्र को उनसे लेकर स्वयं गरुड़ की पीठ पर बैठकर न जाने कितने ही राक्षसों और दैत्यों का वध कर दिया, कितनों के शरीर अंग-भंग कर दिए। इस युद्ध में श्रीकृष्ण और बलदेव ने असंख्य दैत्यों का वध किया। बलरामजी ने अपने आयुध शस्त्र हल से और कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से माघ मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को विशाल दैत्यों के समूह का सर्वनाश किया।

जब अन्त में केवल दुराचारी कंस ही बच गया तो कृष्ण ने कहा- हे दुष्ट, अधर्मी, दुराचारी अब मैं इस महायुद्ध स्थल पर तुझसे युद्ध कर तथा तेरा वध कर इस संसार को तुझसे मुक्त कराऊँगा। यह कहते हुए श्रीकृष्ण ने उसके केशों को पकड़ लिया और कंस को घुमाकर पृथ्वी पर पटक दिया, जिससे वह मृत्यु को प्राप्त हुआ। कंस के मरने पर देवताओं ने शंखघोष व पुष्पवृष्टि की। वहां उपस्थित समुदाय श्रीकृष्ण की जय-जयकार कर रहा था। कंस की मृत्यु पर नंद, देवकी, वसुदेव, यशोदा और इस संसार के सभी प्राणियों ने हर्ष पर्व मनाया।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी विधि


इस कथा को सुनने के पश्चात इंद्र ने नारदजी से कहा- हे ऋषि इस कृष्ण जन्माष्टमी का पूर्ण विधान बताएं एवं इसके करने से क्या पुण्य प्राप्त होता है, इसके करने की क्या विधि है?

नारदजी ने कहा- हे इंद्र! भाद्रपद मास की कृष्णजन्माष्टमी को इस व्रत को करना चाहिए। उस दिन ब्रह्मचर्य आदि नियमों का पालन करते हुए श्रीकृष्ण का स्थापन करना चाहिए। सर्वप्रथम श्रीकृष्ण की मूर्ति स्वर्ण कलश के ऊपर स्थापित कर चंदन, धूप, पुष्प, कमलपुष्प आदि से श्रीकृष्ण प्रतिमा को वस्त्र से वेष्टित कर विधिपूर्वक अर्चन करें। गुरुचि, छोटी पीतल और सौंठ को श्रीकृष्ण के आगे अलग-अलग रखें। इसके पश्चात भगवान विष्णु के दस रूपों को देवकी सहित स्थापित करें।

हरि के सान्निध्य में भगवान विष्णु के दस अवतारों, गोपिका, यशोदा, वसुदेव, नंद, बलदेव, देवकी, गायों, वत्स, कालिया, यमुना नदी, गोपगण और गोपपुत्रों का पूजन करें। इसके पश्चात आठवें वर्ष की समाप्ति पर इस महत्वपूर्ण व्रत का उद्यापन कर्म भी करें।

यथाशक्ति विधान द्वारा श्रीकृष्ण की स्वर्ण प्रतिमा बनाएँ। इसके पश्चात 'मत्स्य कूर्म' इस मंत्र द्वारा अर्चनादि करें। आचार्य ब्रह्मा तथा आठ ऋत्विजों का वैदिक रीति से वरण करें। प्रतिदिन ब्राह्मण को दक्षिणा और भोजन देकर प्रसन्न करें।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पूर्ण विधि


उपवास की पूर्व रात्रि को हल्का भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। उपवास के दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएँ। पश्चात सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्‌पति, भूमि, आकाश, खेचर, अमर और ब्रह्मादि को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर मुख बैठें। इसके बाद जल, फल, कुश और गंध लेकर संकल्प करें-

ममाखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये॥

अब मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकीजी के लिए 'सूतिकागृह' नियत करें। तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। मूर्ति में बालक श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और लक्ष्मीजी उनके चरण स्पर्श किए हों अथवा ऐसे भाव हो। इसके बाद विधि-विधान से पूजन करें। पूजन में देवकी, वसुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी इन सबका नाम क्रमशः निर्दिष्ट करना चाहिए।

फिर निम्न मंत्र से पुष्पांजलि अर्पण करें- 'प्रणमे देव जननी त्वया जातस्तु वामनः।
वसुदेवात तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमो नमः।
सुपुत्रार्घ्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तु ते।'

अंत में प्रसाद वितरण कर भजन-कीर्तन करते हुए रात्रि जागरण करें।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी उद्देश्य


जो व्यक्ति जन्माष्टमी के व्रत को करता है, वह ऐश्वर्य और मुक्ति को प्राप्त करता है। आयु, कीर्ति, यश, लाभ, पुत्र व पौत्र को प्राप्त कर इसी जन्म में सभी प्रकार के सुखों को भोग कर अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है। जो मनुष्य भक्तिभाव से श्रीकृष्ण की कथा को सुनते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। वे उत्तम गति को प्राप्त करते हैं।


श्री कृष्ण जन्माष्टमी 'दही-हांडी' उत्‍सव


 

श्रीकृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी के अवसर पर महाराष्‍ट्र समेत पूरे देश में 'दही-हांडी' का उत्‍सव मनाया जाता है. दही-हांडी उत्‍सव के बहाने ही लोग भगवान कृष्‍ण और उनकी बाल-लीलाओं को याद करते हैं.

श्री कृष्ण जन्माष्टमी क्या है परंपरा?


दही-हांडी उत्‍सव के दौरान सार्वजनिक स्‍थलों पर हांडी को रस्‍सी के सहारे काफी ऊंचाई पर लटका दिया जाता है. दही से भरे मटके को लोग समूहों में एकजुट होकर फोड़ने का प्रयास करते हैं. हांडी को फोड़ने के प्रयास में लोग एक-दूसरे के ऊपर व्‍यवस्थित तरीके से चढ़कर पिरामिड जैसा आकार बनाते हैं. इससे लोग काफी ऊंचाई पर बंधे मटके तक पहुंच जाते हैं. इस प्रयास में चूंकि एकजुटता की काफी जरूरत पड़ती है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि दही-हांडी उत्‍सव से सामूहिकता को बढ़ावा मिलता है.

देखने लायक होता है दही-हांडी का नजारा


दही की हांडी को फोड़ने के प्रयास में लोग कई बार गिरते-फिसलते हैं. हांडी फोड़ने के प्रयास में लगे युवकों और बच्‍चों को 'गोविंदा' कहा जाता है, जो कि 'गोविंद' का ही दूसरा नाम है. इन गोविंदाओं के ऊपर कई बार पानी की बौछारें भी की जाती हैं. काफी प्रयास के बाद जब गोविंदाओं को कामयाबी हासिल होती है, तो देखने वालों को भी काफी आनंद आता है. हांडी फोड़ने वाले तो फूले नहीं समाते हैं. भक्‍त इस पूरे खेल में भगवान को याद करते हैं.

उत्‍सव की पौराणिक मान्‍यता


पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान कृष्ण अपने साथियों के ऊपर चढ़कर पास-पड़ोस के घरों में मटकी में रखा दही और माखन चुराया करते थे. कान्‍हा के इसी रूप के कारण बड़े प्‍यार से उन्‍हें 'माखनचोर' कहा जाता है.

पानी फेंकना


दही हांडी फोड़ने वाले लड़कों पर आस-पास के लोग पानी डालकर रोकते हैं और इस तरह से माना जाता है कि वो गोकुलवासी हैं, जिनकी मटकियां भगवान श्रीकृष्ण तोड़ा करते थे।

मेहनत की जीत


दही-हांडी प्रतियोगिता आसान नहीं है, इस दौरान अगर इंसान गिरे तो काफी चोट लगती है, लेकिन ये खेल ये दर्शाने की कोशिश की है अगर आपका लक्ष्य निश्चित हो और आप मेहनत और हिम्मत दिखायें तो हर मुश्किल आसान हो जाती है। यही उपदेश भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था।

जो जीता वो ही सिकंदर


गोविंदा वो ही होता है जो अंत तक हार नहीं मानता, इसलिए ये खेल होता है, ताकि लोग ये समझें कि किसी भी चीज को पाने के लिए निरंतर मेहनत करनी होती है जो मौके का लाभ उठाता है और प्रयत्न करता है वो ही जीतता है

बुधवार, 21 अगस्त 2019

 

क्यों चढ़ाई जाती है श्री गणेश को दूर्वा



दूर्वा यानि दूब यह एक तरह की घास होती है जो गणेश पूजन में प्रयोग होती है। एक मात्र गणेश ही ऐसे देव है जिनको यह चढ़ाई जाती है। दूर्वा गणेशजी को अतिशय प्रिय है। इक्कीस दूर्वा को इक्कठी कर एक गांठ बनाई जाती है तथा कुल 21 गांठ गणेशजी को मस्तक पर चढ़ाई जाती है।

गणपति को विघ्नहर्ता और ऋद्धि-सिद्धी का स्वामी कहा जाता है। इनका स्मरण, ध्यान, जप, आराधना से कामनाओं की पूर्ति होती है व विघ्नों का विनाश होता है। वे शीघ्र प्रसन्न होने वाले बुद्धि के अधिष्ठाता और साक्षात् प्रणवरूप है। गणेश का मतलब है गणों का स्वामी। किसी पूजा, आराधना, अनुष्ठान व कार्य में गणेश जी के गण कोई विघ्न-बाधा न पहुंचाएं, इसलिए सर्वप्रथम गणेश-पूजा करके उसकी कृपा प्राप्त की जाती है। गणेश जी को दूर्वा चढानें की मान्यता है माना जाता हौ कि उन्हे दूर्वा चढानें से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है, क्योंकि श्री गणेश को हरियाली बहुत पंसद है। गणेश जी को प्रदान की गई दूर्वा जातक के जीवन में भी हरियाली यानी कि खुशियों को बढ़ाने वाली होती है। गणेश जी को दूर्वा एक खास तरीके से चढ़ाई जाती है। गणेश जी को हमेशा दूर्वा का जोड़ा बनाकर चढ़ाना चाहिए यानि कि 22 दूर्वा को जोड़े से बनाने पर 11 जोड़ा दूर्वा का तैयार हो जाता है। जिसे भगवान गणेश को अर्पित करने से मनोकामना की पूर्ति में सहायक माना गया है। जानिए

श्री गणेश को जोडे में दूर्वा क्यों चढाई जाती है और किस तरह।


जीवन में सुख व समृद्धि की प्राप्ति के लिए श्रीगणेश को दूर्वा ज़रुर अर्पित की जानी चाहिए। दूर्वा एक प्रकार की घास है। जिसे किसी भी बगीचे में आसानी से उगाया जा सकता है। भगवान श्रीगणेश को अर्पित की जाने वाली दूर्वा श्री गणेश को 3 या 5 गांठ वाली दूर्वा अर्पित की जाती है। किसी मंदिर की जमीन में उगी हुई या बगीचे में उगी हुई दूर्वा लेना चाहिए। ऐसी जगह जहां गंदे पानी बहकर जाता हो और दूर्वा उग आयी हो । वहां से दूर्वा का चुनाव नहीं किया जाना चाहिए।

कैसे बनाएं दूर्वा की गांठ?


21 दूर्वा को एकसाथ इकट्‍ठी करके 1 गांठ बनाई जाती है तथा कुल 21 गांठें गणेशजी को मस्तक पर चढ़ाई जाती हैं।

श्री गणेश को दूर्वा चढ़ाने के पवित्र नियम


गणेशजी को तुलसी छोड़कर सभी पत्र-पुष्प प्रिय हैं! गणपतिजी को दूर्वा अधिक प्रिय है। अतः सफेद या हरी दूर्वा चढ़ानी चाहिए। दूः+अवम्‌, इन शब्दों से दूर्वा शब्द बना है। 'दूः' यानी दूरस्थ व 'अवम्‌' यानी वह जो पास लाता है। दूर्वा वह है, जो गणेश के दूरस्थ पवित्रकों को पास लाती है।
गणपति को अर्पित की जाने वाली दूर्वा कोमल होनी चाहिए। ऐसी दूर्वा को बालतृणम्‌ कहते हैं। सूख जाने पर यह आम घास जैसी हो जाती है। दूर्वा की पत्तियां विषम संख्या में (जैसे 3, 5, 7) अर्पित करनी चाहिए। पूर्वकाल में गणपति की मूर्ति की ऊंचाई लगभग एक मीटर होती थी, इसलिए समिधा की लंबाई जितनी लंबी दूर्वा अर्पण करते थे। मूर्ति यदि समिधा जितनी लंबी हो, तो लघु आकार की दूर्वा अर्पण करें, परंतु मूर्ति बहुत बड़ी हो, तो समिधा के आकार की ही दूर्वा चढ़ाएं। जैसे समिधा एकत्र बांधते हैं, उसी प्रकार दूर्वा को भी बांधते हैं। ऐसे बांधने से उनकी सुगंध अधिक समय टिकी रहती है। उसे अधिक समय ताजा रखने के लिए पानी में भिगोकर चढ़ाते हैं। इन दोनों कारणों से गणपति के पवित्रक बहुत समय तक मूर्ति में रहते हैं।

श्री गणेश को दूर्वा चढ़ाने का मंत्र श्री गणेश को 22 दूर्वा इन विशेष मंत्रों के साथ अर्पित की जानी चाहिए।

दूर्वा चढ़ाते वक़्त बोले मन्त्र :


गणेश जी को 21 दूर्वा चढ़ाते वक्त नीचे लिखे 10 मंत्रों को बोलें यानी हर मंत्र के साथ दो दूर्वा चढ़ाएं और आखिरी बची दूर्वा चढ़ाते वक्त सभी मंत्र बोलें।
ॐ गणाधिपाय नमः ,ॐ उमापुत्राय नमः ,ॐ विघ्ननाशनाय नमः ,ॐ विनायकाय नमः
ॐ ईशपुत्राय नमः ,ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नमः ,ॐ एकदन्ताय नमः ,ॐ इभवक्त्राय नमः
ॐ मूषकवाहनाय नमः ,ॐ कुमारगुरवे नमः
श्री मन्महागणाधिपतये नमः

यदि आपको लग रहा कि इन मंत्रों को बोलनें में आपको परेशानी होगी तो इस मंत्र को बोल कर गणेश जी को दूर्वा अर्पण करें।
श्री गणेशाय नमः दूर्वांकुरान् समर्पयामि।

पौराणिक कथा :


कथा के अनुसार प्राचीन काल में अनलासुर नाम का एक दैत्य था। इस दैत्य के कोप से स्वर्ग और धरती पर त्राही-त्राही मची हुई थी। अनलासुर ऋषि-मुनियों और आम लोगों को जिंदा निगल जाता था। दैत्य से त्रस्त होकर देवराज इंद्र सहित सभी देवी-देवता और प्रमुख ऋषि-मुनि महादेव से प्रार्थना करने पहुंचे। सभी ने शिवजी से प्रार्थना की कि वे अनलासुर के आतंक का नाश करें। शिवजी ने सभी देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों की प्रार्थना सुनकर कहा कि अनलासुर का अंत केवल श्रीगणेश ही कर सकते हैं।
जब श्रीगणेश ने अनलासुर को निगला तो उनके पेट में बहुत जलन होने लगी। कई प्रकार के उपाय करने के बाद भी गणेशजी के पेट की जलन शांत नहीं हो रही थी। तब कश्यप ऋषि ने दूर्वा की 21 गांठ बनाकर श्रीगणेश को खाने को दी। जब गणेशजी ने दूर्वा ग्रहण की तो उनके पेट की जलन शांत हो गई। तभी से श्रीगणेश को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई।

औषधि है दूर्वा :


इस कथा द्वारा हमे यह संदेश प्राप्त होता है की पेट की जलन, तथा पेट के रोगों के लिए दूर्वा औषधि का कार्य करती है। मानसिक शांति के लिए यह बहुत लाभप्रद है। यह विभिन्न बीमारियों में एंटिबायोटिक का काम करती है, उसको देखने और छूने से मानसिक शांति मिलती है और जलन शांत होती है। वैज्ञानिको ने अपने शोध में पाया है कि कैंसर रोगियों के लिए भी यह लाभप्रद है।

भगवान गणपति के प्रसिद्ध आठ मंदिर “अष्टविनायक”

गुरुवार, 8 अगस्त 2019

सुषमा स्वराज



सुषमा स्वराज (१४ फरवरी,१९५२- ०६ अगस्त, २०१९) एक भारतीय महिला राजनीतिज्ञ और भारत की पूर्व विदेश मंत्री थीं। वे वर्ष २००९ में भारत की भारतीय जनता पार्टी द्वारा संसद में विपक्ष की नेता चुनी गयी थीं, इस नाते वे भारत की पन्द्रहवीं लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता रही हैं। इसके पहले भी वे केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल में रह चुकी हैं तथा दिल्ली की मुख्यमन्त्री भी रही हैं। वे सन २००९ के लोकसभा चुनावों के लिये भाजपा के १९ सदस्यीय चुनाव-प्रचार-समिति की अध्यक्ष भी रही थीं।


अम्बाला छावनी में जन्मी सुषमा स्वराज ने एस॰डी॰ कालेज अम्बाला छावनी से बी॰ए॰ तथा पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ से कानून की डिग्री ली। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पहले जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। आपातकाल का पुरजोर विरोध करने के बाद वे सक्रिय राजनीति से जुड़ गयीं। वर्ष २०१४ में उन्हें भारत की पहली महिला विदेश मंत्री होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जबकि इसके पहले इंदिरा गांधी दो बार कार्यवाहक विदेश मंत्री रह चुकी थीं। कैबिनेट में उन्हें शामिल करके उनके कद और काबिलियत को स्वीकारा। दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री और देश में किसी राजनीतिक दल की पहली महिला प्रवक्ता बनने की उपलब्धि भी उन्हीं के नाम दर्ज है।



प्रारम्भिक जीवन


सुषमा स्वराज (विवाह पूर्व शर्मा) का जन्म १४ फरवरी १९५२ को हरियाणा (तब पंजाब) राज्य की अम्बाला छावनी में, हरदेव शर्मा तथा लक्ष्मी देवी के घर हुआ था। उनके पिता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख सदस्य रहे थे। स्वराज का परिवार मूल रूप से लाहौर के धरमपुरा क्षेत्र का निवासी था, जो अब पाकिस्तान में है। उन्होंने अम्बाला के सनातन धर्म कॉलेज से संस्कृत तथा राजनीति विज्ञान में स्नातक किया।१९७० में उन्हें अपने कालेज में सर्वश्रेष्ठ छात्रा के सम्मान से सम्मानित किया गया था। वे तीन साल तक लगातार एस॰डी॰ कालेज छावनी की एन सी सी की सर्वश्रेष्ठ कैडेट और तीन साल तक राज्य की श्रेष्ठ वक्ता भी चुनी गईं। इसके बाद उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ से विधि की शिक्षा प्राप्त की। पंजाब विश्वविद्यालय से भी उन्हें १९७३ में सर्वोच्च वक्ता का सम्मान मिला था। १९७३ में ही स्वराज भारतीय सर्वोच्च न्यायलय में अधिवक्ता के पद पर कार्य करने लगी। १३ जुलाई १९७५ को उनका विवाह स्वराज कौशल के साथ हुआ, जो सर्वोच्च न्यायालय में उनके सहकर्मी और साथी अधिवक्ता थे। कौशल बाद में छह साल तक राज्यसभा में सांसद रहे, और इसके अतिरिक्त वे मिजोरम प्रदेश के राज्यपाल भी रह चुके हैं। स्वराज दम्पत्ति की एक पुत्री है, बांसुरी, जो लंदन के इनर टेम्पल में वकालत कर रही हैं।६७ साल की आयु में ६ अगस्त, २०१९ की रात ११.२४ बजे सुषमा स्वराज का दिल्ली में निधन हो गया।



राजनीतिक जीवन


७० के दशक में ही स्वराज एन.सी.सी. से जुड़ गयी थी। उनके पति, स्वराज कौशल, सोशलिस्ट नेता जॉर्ज फ़र्नान्डिस के करीबी थे, और इस कारण ही वे भी १९७५ में फ़र्नान्डिस की विधिक टीम का हिस्सा बन गयी। आपातकाल के समय उन्होंने जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। आपातकाल की समाप्ति के बाद वह जनता पार्टी की सदस्य बन गयी। १९७७ में उन्होंने अम्बाला छावनी विधानसभा क्षेत्र से हरियाणा विधानसभा के लिए विधायक का चुनाव जीता और चौधरी देवी लाल की सरकार में से १९७७ से ७९ के बीच राज्य की श्रम मन्त्री रह कर २५ साल की उम्र में कैबिनेट मन्त्री बनने का रिकार्ड बनाया था। १९७९ में तब २७ वर्ष की स्वराज हरियाणा राज्य में जनता पार्टी की राज्य अध्यक्ष बनी।


८० के दशक में भारतीय जनता पार्टी के गठन पर वह भी इसमें शामिल हो गयी। इसके बाद १९८७ से १९९० तक पुनः वह अम्बाला छावनी से विधायक रही, और भाजपा-लोकदल संयुक्त सरकार में शिक्षा मंत्री रही। अप्रैल १९९० में उन्हें राज्यसभा के सदस्य के रूप में निर्वाचित किया गया, जहाँ वह १९९६ तक रही। १९९६ में उन्होंने दक्षिण दिल्ली संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीता, और १३ दिन की वाजपेयी सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्री रही। मार्च १९९८ में उन्होंने दक्षिण दिल्ली संसदीय क्षेत्र से एक बार फिर चुनाव जीता। इस बार फिर से उन्होंने वाजपेयी सरकार में दूरसंचार मंत्रालय के अतिरिक्त प्रभार के साथ सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में शपथ ली थी। १९ मार्च १९९८ से १२ अक्टूबर १९९८ तक वह इस पद पर रही। इस अवधि के दौरान उनका सबसे उल्लेखनीय निर्णय फिल्म उद्योग को एक उद्योग के रूप में घोषित करना था, जिससे कि भारतीय फिल्म उद्योग को भी बैंक से क़र्ज़ मिल सकता था।


अक्टूबर १९९८ में उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया, और १२ अक्टूबर १९९८ को दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला। हालांकि, ३ दिसंबर १९९८ को उन्होंने अपनी विधानसभा सीट से इस्तीफा दे दिया, और राष्ट्रीय राजनीति में वापस लौट आई। सितंबर १९९९ में उन्होंने कर्नाटक के बेल्लारी निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के विरुद्ध चुनाव लड़ा। अपने चुनाव अभियान के दौरान, उन्होंने स्थानीय कन्नड़ भाषा में ही सार्वजनिक बैठकों को संबोधित किया था। हालांकि वह ७% के मार्जिन से चुनाव हार गयी। अप्रैल २००० में वह उत्तर प्रदेश के राज्यसभा सदस्य के रूप में संसद में वापस लौट आईं। ९ नवंबर २००० को उत्तर प्रदेश के विभाजन पर उन्हें उत्तराखण्ड में स्थानांतरित कर दिया गया। उन्हें केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फिर से सूचना और प्रसारण मंत्री के रूप में शामिल किया गया था, जिस पद पर वह सितंबर २००० से जनवरी २००३ तक रही। २००३ में उन्हें स्वास्थ्य, परिवार कल्याण और संसदीय मामलों में मंत्री बनाया गया, और मई २००४ में राजग की हार तक वह केंद्रीय मंत्री रही।


अप्रैल २००६ में स्वराज को मध्य प्रदेश राज्य से राज्यसभा में तीसरे कार्यकाल के लिए फिर से निर्वाचित किया गया। इसके बाद २००९ में उन्होंने मध्य प्रदेश के विदिशा लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र से ४ लाख से अधिक मतों से जीत हासिल की। २१ दिसंबर २००९ को लालकृष्ण आडवाणी की जगह १५वीं लोकसभा में सुषमा स्वराज विपक्ष की नेता बनी और मई २०१४ में भाजपा की विजय तक वह इसी पद पर आसीन रही। वर्ष २०१४ में वे विदिशा लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र से दोबारा लोकसभा की सांसद निर्वाचित हुई हैं और उन्हें भारत की पहली महिला विदेश मंत्री होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। भाजपा में राष्ट्रीय मन्त्री बनने वाली पहली महिला सुषमा के नाम पर कई रिकार्ड दर्ज़ हैं। वे भाजपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता बनने वाली पहली महिला हैं, वे कैबिनेट मन्त्री बनने वाली भी भाजपा की पहली महिला हैं, वे दिल्ली की पहली महिला मुख्यमन्त्री थीं और भारत की संसद में सर्वश्रेष्ठ सांसद का पुरस्कार पाने वाली पहली महिला भी वे ही हैं। वे दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री और देश में किसी राजनीतिक दल की पहली महिला प्रवक्ता बनने की उपलब्धि भी उन्हीं के नाम दर्ज है।



कीर्तिमान एवं उपलब्धियां


१९७७ में ये देश की प्रथम केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल सदस्या बनीं, वह भी २५ वर्ष की आयु में।
१९७९ में २७ वर्ष की आयु में ये जनता पार्टी, हरियाणा की राज्य अध्यक्षा बनीं।
स्वराज भारत की किसी राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी की प्रथम महिला प्रवक्ता बनीं।
इनके अलावा भी ये भाजपा की प्रथम महिला मुख्य मंत्री, केन्द्रीय मन्त्री, महासचिव, प्रवक्ता, विपक्ष की नेता एवं विदेश मंत्री बनीं।
ये भारतीय संसद की प्रथम एवं एकमात्र ऐसी महिला सदस्या हैं जिन्हें आउटस्टैण्डिंग पार्लिमैण्टेरियन सम्मान मिला है। इन्होंने चार राज्यों से ११ बार सीधे चुनाव लडे।
इनके अलावा ये हरियाणा में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की चार वर्ष तक अध्यक्षा भी रहीं।



सुषमा ने राजनीति और सरकार में हमेशा उच्च मानक स्थापित किये


बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुये आज कहा कि उन्होंने भारतीय जनता पाटीर् (भाजपा) और सरकार में अपनी हर भूमिका का बेहतरीन निर्वहन करते हुये हमेशा उच्च मानक स्थापित किये हैं।


भाजपा के वरिष्ठ नेता श्री मोदी ने यहां कहा, “भारतीय राजनीति की सशक्त नेत्री, प्रखर वक्ता, पूर्व विदेश मंत्री एवं भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज ने पाटीर् और सरकार में अपनी हर भूमिका का बेहतरीन निर्वहन करते हुए हमेशा उच्च मानक स्थापित किये हैं। उनके निधन की खबर से मैं स्तब्ध हूं और सहसा विश्वास ही नहीं हो रहा है कि वे अब हमारे बीच नहीं हैं।”


उप मुख्यमंत्री ने कहा कि पूरे देश और पाटीर् के साथ ही उनका निधन मेरी व्यक्तिगत क्षति है। श्रीमती स्वराज के साथ 4०-42 वषोर्ं का लम्बा सम्पर्क रहा है। जब वर्ष 1977 में वह मात्र 25 वर्ष की थीं तो मुजफ्फरपुर में श्री जॉर्ज फनार्ंडीस की सभा में उन्हें सुनने का सौभाग्य मिला था। उन्होंने कहा कि भाजपा और भारतीय राजनीति में श्रीमती स्वराज का स्थान हमेशा रिक्त रहेगा, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। उनका अचानक हमारे बीच से सदा के लिए चली जाना स्तब्धकारी और अत्यंत दुखदायी है। ईश्वर उनकी दिवंगत आत्मा को असीम शांति प्रदान करें और सबको इस आघात को सहने की शक्ति दें।


स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने कहा कि वह श्रीमती स्वराज के निधन की खबर से स्तब्ध हैं। वह एक सादगीपसंद, कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार और आदर्शवादी नेता थीं। वह भाजपा की वरिष्तम नेताओं में से एक थीं। उनके निधन से भाजपा और देश को अपूरणीय क्षति हुई है, जिसकी भरपाई निकट भविष्य में मुश्किल है। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और संकट की इस घड़ी में परिजनों को कष्ट सहन करने की शक्ति दें।


ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि श्रीमती स्वराज भारतीय राजनीति की एक महान हस्ती थी। उन्होंने विदेश मंत्री के कार्यकाल में अपनी बेहतर कार्यप्रणाली एवं संवाद की श्रेष्ठ शैली से अंतरार्ष्ट्रीय मुद्दों पर भारत की पहचान स्थापित की। वह एक कुशल नेता एवं प्रखर वक्ता थीं। वह एक सफल विदेश मंत्री के रूप में सदैव याद की जाएंगी। ईश्वर उनकी आत्मा को चिर शांति प्रदान करें।



सुषमा स्वराज: कैसे उन्होंने जरूरतमंदों की मदद की


Aug 7, 2019, 11:40 AM IST
भारत के विदेश मंत्री के रूप में सुषमा स्वराज के कार्यकाल को उनके मानवीय पक्ष के लिये ज़्यादा माना जायेगा जो 2014-19 के बीच नरेंद्र मोदी की सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान सामने आया। वह सबसे सुलभ मंत्रियों में से एक थीं और सोशल मीडिया पर बहुत सक्रिय थीं। जरूरतमंद लोग अक्सर ट्विटर पर उनसे विदेशों से मदद के लिए टैग करते हैं और वह उनकी मदद करती थीं। इस वजह से वह सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय थीं। यहाँ कुछ उदाहरण हैं कि कैसे स्वराज ने उनमें से कुछ लोगों की मदद की।



सुषमा स्वराज की Love Story किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं, पिता के सामने यूं कह डाला था अपने दिल का हाल


Sushma Swaraj Love Story: देश की पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज (Sushma Swaraj) का कार्डिक अरेस्ट के कारण निधन हो गया। वह बीजेपी की एक प्रखर नेता के साथ-साथ मजबूत और साहसी राजनेता थीं। उन्होंने राजनीतिक को लेकर कई बड़े फैसले लिए। वहीं दूसरी ओर उनकी निजी जिंदगी के बारे में बात करें तो शायद ही काफी कम लोगों को पता होगा कि उन्होंने भी लव मैरिज की थी। उस दौर में जहां लड़कियों को पर्दे में रखा जाता था। ऐसे में सुषमा को भी अपनी शादी के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ी थी।



ऐसे हुई थी सुषमा स्वराज की शादी


सुषमा स्वराज की शादी जाने-माने वकील कौशल स्वराज से हुई थी। दोनों को इश्क कॉलेज के दिनों में हुआ था। जिसके बाद दोनों ने 13 जुलाई 1975 में शादी की थी। दोनों की मुलाकात चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान हुई थी। शुरुआत में तो दोनों के बीच प्यार की कोई बात नहीं थी। लेकिन दोनों लोग अच्छे दोस्त जरूर बन गए थे। जो आगे चलकर प्यार में तब्दील हो गया। इस बारे में सुषमा ने जब अपने घर पर बताया तो उनके पिता हरदेव शर्मा जो कि RSS से जुड़े हुए थे, काफी नाराज हो गए। हालांकि उनका अपनी बेटी सुषमा से काफी लगाव था, जिसके बाद वह शादी के लिए तैयार हो गए।



कौन है कौशल स्वराज?


स्वराज कौशल मात्र 34 साल की उम्र में देश के सबसे युवा एडवोकेट जनरल बन गए थे। इसके अलावा वह 1999-2004 तक सांसद भी रहे थे और 1990 से 1993 तक मिजोराम के राज्यपाल भी रह चुके थे।



नहीं रहीं सुषमा स्वराज, आखिरी ट्वीट में कश्मीर पर कहा था- 'इसी का इंतजार था'


पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के निधन की खबर सुनकर पूरे देश में शोक की लहर है। बीजेपी ही नहीं, बल्कि विरोधी दलों के नेता भी सुषमा स्वराज के निधन से स्तब्ध हैं। निधन से महज तीन घंटे पहले ही उन्होंने जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाने के लेकर ट्वीट किया था। सुषमा स्वराज ने अपने ट्वीट में कहा था, 'मैं अपने जीवन में इस दिन को देखने की प्रतीक्षा कर रही थी।'
सुषमा स्वराज ने मौत से कुछ घंटे पहले कश्मीर पर मोदी सरकार के फैसले की सराहना की थी
उन्होंने पीएम को धन्यवाद देते हुए ट्वीट किया था, 'इसी दिन की प्रतीक्षा कर रही थी'
पीएम मोदी के पहले कार्यकाल में बतौर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के काम की सराहना विपक्षी दलों ने भी की
सुषमा ने इस बार का लोकसभा चुनाव खराब तबीयत का हवाला देते हुए नहीं लड़ा था



सुषमा स्वराज का निधन, शाम 4 बजे होगा अंतिम संस्कार


भारत की पूर्व विदेश मंत्री और भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज का मंगलवार रात निधन हो गया. बुधवार शाम चार बजे दिल्ली में उनका अंतिम संस्कार होगा.


मंगलवार रात को घर पर हुआ था कार्डिएक अरेस्ट
दिल्ली के एम्स अस्पताल में कराया गया भर्ती
रात से ही घर पर श्रद्धांजलि, नेताओं और क़रीबी लोगों का लगा तांता
बुधवार दोपहर 12 से 3 बजे तक दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर पार्टी मुख्यालय में दी जाएगी श्रद्धांजलि
शाम 4 बजे लोधी रोड शवदाह गृह में होगी अंत्येष्टि
67 साल उम्र में हुआ निधन
दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री
बीजेपी की पहली महिला मुख्यमंत्री
भारत में पहली पूर्णकालिक महिला विदेश मंत्री
सात बार सांसद (6 लोकसभा, 1 राज्यसभा) और तीन बार विधायक
पिछले ही साल सुषमा स्वराज ने ये ऐलान किया था कि वो साल 2019 का चुनाव नहीं लड़ेंगी. इस घोषणा के बाद सुषमा के पति और पूर्व राज्यपाल स्वराज कौशल ने कहा था, ''एक समय के बाद मिल्खा सिंह ने भी दौड़ना बंद कर दिया था. आप तो पिछले 41 साल से चुनाव लड़ रही हैं.''


67 साल की सुषमा राजनीति में 25 बरस की उम्र में आईं थीं. सुषमा के राजनीतिक गुरु लाल कृष्ण आडवाणी रहे थे.
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करके सुषमा स्वराज को श्रद्धांजलि दी है.


अपने ट्वीट्स में उन्होंने लिखा है, ''भारतीय राजनीति का एक महान अध्याय ख़त्म हो गया है. भारत अपने एक असाधारण नेता के निधन का शोक मना रहा है, जिन्होंने लोगों की सेवा और गरीबों की ज़िंदगी बेहतर के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया. सुषमा स्वराज जी अनूठी थीं, जो करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत थीं. सुषमा जी अद्भुत वक्ता और बेहतरीन सांसद थीं. उन्हें सभी पार्टियों से सम्मान मिला. बीजेपी की विचारधारा और हित के मामले में वो कभी समझौता नहीं करती थीं. बीजेपी के विकास में उन्होंने बड़ा योगदान दिया.''

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